भारत में हुआ 99 रामसर साइट, जल्द होगा 100 का आंकड़ा

संजय कुमार/ भारत में जल्द ही रामसर साइट का आंकड़ा 100 छूने वाला है। उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ की शेखा झील बर्ड सेंक्चुरी को भारत का 99 वां अंतरराष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमि, रामसर साइट का दर्जा प्रदान किया गया है। इस घोषणा के साथ ही देश में रामसर साइट्स की कुल संख्या बढ़कर 99 हो…

संजय कुमार भारत में जल्द ही रामसर साइट का आंकड़ा 100 छूने वाला है। उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ की शेखा झील बर्ड सेंक्चुरी को भारत का 99 वां अंतरराष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमि, रामसर साइट का दर्जा प्रदान किया गया है। इस घोषणा के साथ ही देश में रामसर साइट्स की कुल संख्या बढ़कर 99 हो गई है, जबकि उत्तर प्रदेश की यह 12वीं रामसर साइट बन गई है। 99 रामसर साइटों के साथ भारत अब दुनिया में वेटलैंड संरक्षण में अग्रणी देशों में शामिल हो गया है। वैसे, सबसे ज्यादा रामसर साइट वाला राज्य तमिलनाडु है जहाँ कुल 20 रामसर साइट हैं। पांच से अधिक रामसर साइट वाले राज्यों में उत्तर प्रदेश में 12, जबकि पंजाब, ओडिशा, बिहार में छह-छह हैं। 12 मार्च 2026 को अलीगढ़ की शेखा झील बर्ड सेंक्चुरी को अंतरराष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमि, रामसर घोषित होने पर खुशी जताते हुए केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तनमंत्री भूपेंद्र यादव ने एक्स पर कहा कि इससे न केवल वैश्विक जैव विविधता संरक्षण को मजबूती मिलेगी, बल्कि स्थानीय लोगों की आजीविका, जल संरक्षण और जलवायु सुरक्षा को भी बढ़ावा मिलेगा। उन्होंने कहा कि शेखा झील सेंट्रल एशियन फ्लायवे का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है, जहां सर्दियों के दौरान बार-हेडेड गूज, पेंटेड स्टॉर्क और कई प्रजातियों की बतख जैसे प्रवासी पक्षी बड़ी संख्या में आते हैं। यह झील पक्षियों के लिए सुरक्षित और अनुकूल आवास प्रदान करती है। उन्होंने लिखा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में चल रहे भारत के 'पारिस्थितिकी तंत्र बहाली मिशन' के साथ, आर्द्रभूमियों और जानवरों विशेष रूप से पक्षियों के प्राकृतिक आवासों के संरक्षण के प्रति हमारी प्रतिबद्धता को वैश्विक समुदाय से एक बार फिर सराहना मिली है। इससे शेखा झील में पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा और पर्यावरण संरक्षण के प्रयासों को नई दिशा मिलेगी। साथ ही स्थानीय लोगों की आजीविका और वैश्विक जैव विविधता को बढ़ावा मिलेगा, जल और जलवायु सुरक्षा भी सुनिश्चित होगी। शेखा झील 'सेंट्रल एशियन फ्लाईवे' पर एक महत्वपूर्ण पड़ाव का काम करती है। सर्दियों के मौसम में यह 'बार-हेडेड गूज', 'पेंटेड स्टॉर्क' और विभिन्न प्रकार की बत्तखों जैसे प्रवासी पक्षियों के लिए एक अहम ठिकाना बनती है। जहाँ तक रामसर साइट ‘अंतरराष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमि’ का सवाल है तो ईरान के रामसर शहर में 1971 में हुई रामसर कन्वेंशन के तहत संरक्षित किया जाता है। भारत 1 फरवरी 1982 को इसका सदस्य बना था। इन साइटों का मकसद जैव-विविधता, जल-चक्र, प्रवासी पक्षियों और स्थानीय आजीविका को बचाना है। भारत में फरवरी 2026 तक कुल 98 रामसर साइट थी। 2014 में ये संख्या 26 थी, यानी 276% की बढ़ोतरी हुई है। ये साइटें मिलकर लगभग 13,85,000 हेक्टेयर क्षेत्र कवर करती हैं। रामसर साइट्स यानी 'अंतर्राष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमियाँ' जो हमारे पर्यावरण के लिए उतनी ही जरूरी हैं जितने कि हमारे फेफड़े । इसलिए इन्हें अक्सर "पृथ्वी की किडनी" भी कहा जाता है। आर्द्रभूमियाँ प्राकृतिक फिल्टर की तरह काम करती हैं। ये पानी में मौजूद प्रदूषकों और तलछट को सोख लेती हैं, जिससे हमें साफ पानी मिलता है। साथ ही, ये भूजल के स्तर को रीचार्ज करने में बड़ी भूमिका निभाती हैं। रामसर साइट्स स्पंज की तरह काम करती हैं। अत्यधिक वर्षा के समय ये अतिरिक्त पानी को सोख लेती हैं, जिससे आसपास के इलाकों में बाढ़ का खतरा कम हो जाता है। तटीय क्षेत्रों में ये चक्रवात और सुनामी के प्रभाव को भी कम करती हैं। ये दुनिया के सबसे समृद्ध पारिस्थितिक तंत्रों में से एक हैं। रामसर साइट्सों की खूबसूरती यह है कि यहाँ हजारों किलोमीटर दूर से आने वाले पक्षियों के लिए ये सुरक्षित आश्रय और भोजन का स्रोत होता हैं। प्रवासी और अप्रवासी पक्षियों का जमावड़ा यहाँ लगता है साथ ही जलीय जीव भी रहते हैं। जहाँ स्थानीय पक्षी का बसेरा होता है वहीँ मौसम के अनुरूप प्रवासी पक्षी हजारों किलोमीटर का सफ़र तय कर आते हैं और पुरे मौसम तक रहते हैं। रामसर साइट्सों कई ऐसी वनस्पतियाँ और जीव हैं जो केवल इन्हीं क्षेत्रों में पनपते हैं। अब सवाल हमारी जिम्मेदारी की तो रामसर साइट्सों को सुरक्षित हमें रखना होगा। ताकि पृथ्वी की किडनी बची रहे और हम भी । **

संजय कुमार/ भारत में जल्द ही रामसर साइट का आंकड़ा 100 छूने वाला है। उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ की शेखा झील बर्ड सेंक्चुरी को भारत का 99 वां अंतरराष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमि, रामसर साइट का दर्जा प्रदान किया गया है। इस घोषणा के साथ ही देश में रामसर साइट्स की कुल संख्या बढ़कर 99 हो गई है, जबकि उत्तर प्रदेश की यह 12वीं रामसर साइट बन गई है। 99 रामसर साइटों के साथ भारत  अब  दुनिया  में वेटलैंड संरक्षण  में  अग्रणी  देशों  में शामिल हो गया है। वैसे, सबसे ज्यादा रामसर साइट वाला राज्य तमिलनाडु है जहाँ कुल 20 रामसर साइट हैं। पांच से अधिक रामसर साइट वाले राज्यों में उत्तर प्रदेश में 12, जबकि पंजाब, ओडिशा, बिहार में छह-छह हैं।

अलीगढ़ की शेखा झील बर्ड सेंक्चुरी को अंतरराष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमि, रामसर  घोषित होने पर खुशी जताते हुए केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तनमंत्री भूपेंद्र यादव ने एक्स पर कहा कि इससे न केवल वैश्विक जैव विविधता संरक्षण को मजबूती मिलेगी, बल्कि स्थानीय लोगों की आजीविका, जल संरक्षण और जलवायु सुरक्षा को भी बढ़ावा मिलेगा। उन्होंने कहा कि शेखा झील सेंट्रल एशियन फ्लायवे का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है, जहां सर्दियों के दौरान बार-हेडेड गूज, पेंटेड स्टॉर्क और कई प्रजातियों की बतख जैसे प्रवासी पक्षी बड़ी संख्या में आते हैं। यह झील पक्षियों के लिए सुरक्षित और अनुकूल आवास प्रदान करती है। उन्होंने लिखा  कि  प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में चल रहे भारत के ‘पारिस्थितिकी तंत्र बहाली मिशन’  के साथ, आर्द्रभूमियों और जानवरों विशेष रूप से पक्षियों के प्राकृतिक आवासों के संरक्षण के प्रति हमारी प्रतिबद्धता को वैश्विक समुदाय से एक बार फिर सराहना मिली है। इससे शेखा झील में पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा और पर्यावरण संरक्षण के प्रयासों को नई दिशा मिलेगी। साथ ही स्थानीय लोगों की आजीविका और वैश्विक जैव विविधता को बढ़ावा मिलेगा, जल और जलवायु सुरक्षा भी सुनिश्चित होगी।

शेखा झील ‘सेंट्रल एशियन फ्लाईवे’ पर एक महत्वपूर्ण पड़ाव का काम करती है। सर्दियों के मौसम में यह ‘बार-हेडेड गूज’, ‘पेंटेड स्टॉर्क’ और विभिन्न प्रकार की बत्तखों जैसे प्रवासी पक्षियों के लिए एक अहम ठिकाना बनती है। जहाँ तक रामसर साइट ‘अंतरराष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमि’ का सवाल है तो ईरान के रामसर शहर में 1971 में हुई रामसर कन्वेंशन के तहत संरक्षित किया जाता है। भारत 1 फरवरी 1982 को इसका सदस्य बना था। इन साइटों का मकसद जैव-विविधता, जल-चक्र, प्रवासी पक्षियों और स्थानीय आजीविका को बचाना है। भारत में फरवरी 2026 तक कुल 98 रामसर साइट थी। 2014 में ये संख्या 26 थी, यानी 276% की बढ़ोतरी हुई है। ये साइटें मिलकर लगभग 13,85,000 हेक्टेयर क्षेत्र कवर करती हैं।

रामसर साइट्स  यानी ‘अंतर्राष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमियाँ’ जो  हमारे पर्यावरण के लिए उतनी ही जरूरी हैं जितने कि हमारे फेफड़े । इसलिए इन्हें अक्सर “पृथ्वी की किडनी” भी कहा जाता है। आर्द्रभूमियाँ प्राकृतिक फिल्टर की तरह काम करती हैं। ये पानी में मौजूद प्रदूषकों और तलछट को सोख लेती हैं, जिससे हमें साफ पानी मिलता है। साथ ही, ये भूजल  के स्तर को रीचार्ज करने में बड़ी भूमिका निभाती हैं। रामसर साइट्स स्पंज की तरह काम करती हैं। अत्यधिक वर्षा के समय ये अतिरिक्त पानी को सोख लेती हैं, जिससे आसपास के इलाकों में बाढ़ का खतरा कम हो जाता है। तटीय क्षेत्रों में ये चक्रवात और सुनामी के प्रभाव को भी कम करती हैं। ये दुनिया के सबसे समृद्ध पारिस्थितिक तंत्रों में से एक हैं।

रामसर साइट्सों की खूबसूरती यह है कि यहाँ हजारों किलोमीटर दूर से आने वाले पक्षियों के लिए ये सुरक्षित आश्रय और भोजन का स्रोत होता हैं। प्रवासी और अप्रवासी पक्षियों का जमावड़ा यहाँ लगता है साथ ही जलीय जीव भी रहते हैं। जहाँ स्थानीय पक्षी का बसेरा होता है वहीँ मौसम के अनुरूप प्रवासी पक्षी हजारों किलोमीटर का सफ़र तय कर आते हैं और पुरे मौसम तक रहते हैं। रामसर साइट्सों कई ऐसी वनस्पतियाँ और जीव हैं जो केवल इन्हीं क्षेत्रों में पनपते हैं। अब सवाल हमारी जिम्मेदारी की तो रामसर साइट्सों को सुरक्षित हमें रखना होगा। ताकि पृथ्वी की किडनी बची रहे और हम भी ।

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संयोजक

 हमारी गौरैया और इनवारमेंट वैरियर्स

Hamari Gauraiya and Environment Warriors

*सम्पादक -डॉ .लीना

*सहायक सम्पादक -निशांत रंजन

उद्देश्य

विश्व गौरैया दिवस: एक साझा संकल्प

20 मार्च 2010 को जब विश्व गौरैया दिवस की शुरुआत हुई, तो मकसद साफ था—इस नन्हीं जान को लुप्त होने से बचाना। इस मुहिम को मजबूती देते हुए दिल्ली सरकार ने 15 अगस्त 2012 और बिहार सरकार ने 16 अप्रैल 2013 को गौरैया को अपना राजकीय पक्षी घोषित किया। तब से लेकर आज तक, सरकारी संस्थाओं और निजी संगठनों के साझा प्रयासों से गौरैया की ‘घर वापसी’ का अभियान निरंतर जारी है।

घर-आँगन, खेत-खलिहान में चहकने-फुदकने वाली गौरैया की घटती संख्या को रोकना और उनकी आबादी को बढ़ाने के लिए एक सुरक्षित और अनुकूल वातावरण सुनिश्चित करना। उद्देश्य है सभी गौरैया संरक्षकों का …इसमें हमारी गौरैया और पर्यावरण योद्धा(Hamari Gauraiya and Environment Warriors) भी शामिल है।

प्रधानमंत्री द्वारा गौरैया को संरक्षित करने को लेकर ‘मन की बात’ में कई बार सन्देश दिया गया हैं :- “विश्व गौरैया दिवस (20 मार्च) पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नन्हीं गौरैया को हमारे पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए उनके संरक्षण पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि शहरीकरण और प्रदूषण के कारण घटती इनकी संख्या पर्यावरण असंतुलन का संकेत है, इसलिए घरों में दाना-पानी रखकर और घोंसले बनाकर इनके प्रति स्नेह और जिम्मेदारी निभाएं।

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