गौरैया संरक्षण पहल से बनी  डॉ.सुनीता यादव ‘गौरैया वाली दीदी’

गौरैया और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में इटावा, उत्तर प्रदेश की गौरैया संरक्षक डॉ. सुनीता यादव अलख जगा रही हैं। घरेलू गौरैया की विलुप्ति की जानकरी मिलने के बाद इसके संरक्षण की पहल में लग गयी। वे बताई है, प्रकृति के प्रति अनुराग मेरे जीवन में किसी आकस्मिक प्रेरणा का परिणाम नहीं, बल्कि मेरे संस्कारों…

गौरैया और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में इटावा, उत्तर प्रदेश की गौरैया संरक्षक डॉ. सुनीता यादव अलख जगा रही हैं। घरेलू गौरैया की विलुप्ति की जानकरी मिलने के बाद इसके संरक्षण की पहल में लग गयी। वे बताई है, प्रकृति के प्रति अनुराग मेरे जीवन में किसी आकस्मिक प्रेरणा का परिणाम नहीं, बल्कि मेरे संस्कारों की अमूल्य विरासत है। मेरे स्वर्गीय पिताजी रामनारायण यादव, जो करहल (मैनपुरी) के पूर्व ब्लॉक प्रमुख थे, ने उस ऊसर भूमि में, जहाँ घास का एक तिनका भी नहीं उगता था, अथक परिश्रम और दूरदृष्टि से हरियाली का संसार रच दिया। बड़े-बड़े गड्ढे खुदवा कर उपजाऊ मिट्टी डलवाई, वृक्षारोपण कराया और राइस मिल से निकलने वाली राख का सदुपयोग कर बंजर भूमि को उर्वर बना दिया। मेरी दादी भी प्रकृति-प्रेम की जीवंत प्रतिमूर्ति थीं। उन्होंने खेतों और बंबा के किनारे अनेक आम और जामुन के वृक्ष लगाए तथा मूक प्राणियों के प्रति करुणा का भाव अपने आचरण से सिखाया।

वर्तमान में मैं उच्च प्राथमिक विद्यालय खरदूली (बालक), ब्लॉक सैफई, जनपद इटावा में विज्ञान अध्यापिका के रूप में कार्यरत सुनीता कहती है वर्ष 2016 में जब मैंने पढ़ा कि घरेलू गौरैया संकटग्रस्त प्रजातियों की सूची में शामिल हो रही है, तो मन व्याकुल हो उठा। गिद्धों के विलुप्त होते जाने के बाद यदि गौरैया भी हमारी आँखों के सामने लुप्त हो जाए, यह विचार मुझे बेचैन करने लगा। इसी बीच अपने ग्रामीण प्रवास के दौरान मैंने देखा कि गाँवों में गौरैया पर्याप्त संख्या में विद्यमान है। पुराने मकानों के छिद्रों, छप्परों और खपरैलों में वे सहजता से अपने घोंसले बना रही थीं। तभी मुझे यह बोध हुआ कि गौरैया के संकट का सबसे बड़ा कारण भोजन नहीं, बल्कि सुरक्षित आश्रय का अभाव है। उसी क्षण मैंने संकल्प लिया कि जीवन का एक महत्त्वपूर्ण भाग गौरैया संरक्षण को समर्पित करूँगी। अपने इटावा स्थित गंगा विहार कॉलोनी के घर में मैंने मिट्टी की मटकियाँ टाँगीं, दाना-पानी की व्यवस्था की और पेड़-पौधों से घर को हराभरा बनाया। लगभग आठ महीने के धैर्यपूर्ण इंतजार के बाद मार्च 2017 में वह सुखद क्षण आया, जब एक गौरैया जोड़े ने मेरी लगाई हुई मटकी में तिनके सजाकर अपना घर बनाना आरम्भ किया। उस समय की अनुभूति शब्दों से परे थी—”गूँगे के मीठे फल को रस अंतरमन ही भावे।”

एक वर्ष में उस जोड़े ने चार बार अंडे दिए और सभी बच्चे सुरक्षित उड़ गए। उन नन्हे पंखों की पहली उड़ान ने मेरे भीतर एक नई जिम्मेदारी का भाव जगा दिया। मैंने निश्चय किया कि अधिक से अधिक गौरैयाओं के लिए सुरक्षित आशियाने तैयार किए जाएँ। “कबाड़ से जुगाड़” की अवधारणा को अपनाते हुए मैंने अनुपयोगी कार्डबोर्ड और रद्दी सामग्री से सुंदर एवं उपयोगी घोंसले बनाना आरम्भ किया। जो भी व्यक्ति मेरे घर या विद्यालय आता, उसे मैं गौरैया संरक्षण का संदेश देती और एक घोंसला भेंट करती। धीरे-धीरे यह प्रयास एक जन-अभियान का रूप लेने लगा। सुनीता कहती हैं, आज मेरे तीन मंजिला घर, जिसे लोग स्नेहपूर्वक “गौरैया हाउस” कहते हैं,  में सैकड़ों गौरैयाएँ निवास करती हैं और प्रतिवर्ष लगभग 300 से अधिक शावक सुरक्षित उड़ान भरते हैं। अब तक हजारों घोंसले निःशुल्क वितरित किए जा चुके हैं, जिनके माध्यम से इटावा, मैनपुरी, एटा, अलीगढ़, आगरा, जयपुर, नोएडा, गाजियाबाद, प्रयागराज और कोलकाता सहित अनेक नगरों में गौरैया संरक्षण का कार्य हो रहा है। इटावा की लायन सफारी में भी मेरे द्वारा निर्मित घोंसलों से गौरैया संरक्षण को नई दिशा मिली है।

कहती हैं, प्रतिवर्ष गौरैया संरक्षण संगोष्ठियों का आयोजन करती हूँ और “हर घर घोंसला, हर घर गौरैया” अभियान के माध्यम से समाज को प्रकृति के प्रति संवेदनशील बनाने का प्रयास करती हूँ। पक्षियों के लिए पेड़ों पर जल से भरे सकोरे तथा पशुओं के लिए पानी की नांद की व्यवस्था करना मेरे दैनिक जीवन का हिस्सा बन चुका है। मैंने अपने अनुभवों को “गौरैया फिर लौट आई” पुस्तक में संजोया है ।

विद्यालय परिसर में भी गौरैया, ब्राह्मणी मैना, बुलबुल, पंडुक, महोख, कौआ और अन्य पक्षियों के संरक्षण के लिए मैंने अनेक घोंसले लगाए हैं। पक्षियों के लिए दाना-पानी की व्यवस्था तथा फलदार वृक्षों का रोपण मेरे लिए पर्यावरण संरक्षण का अभिन्न अंग है। इसी उद्देश्य से मैंने “ईको विंग्स फाउंडेशन, इटावा” तथा “अभय दानम सेवा ट्रस्ट” की स्थापना की। मेरे घर को लोग “गौरैया हाउस” और मुझे स्नेहपूर्वक “गौरैया वाली दीदी” के नाम से जानते हैं। यह मेरे लिए किसी सम्मान से कम नहीं। मेरा विश्वास है कि यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने घर में एक घोंसला और एक पात्र जल का रख दे, तो गौरैया ही नहीं, अनेक पक्षियों का भविष्य सुरक्षित किया जा सकता है। वे कहती हैं, मेरे जीवन के शेष क्षण प्रकृति, पक्षियों और पर्यावरण के संरक्षण को समर्पित हैं। मेरा संकल्प अटूट है—”जब तक साँस है, तब तक प्रयास है; हर घर घोंसला, हर घर गौरैया का विश्वास है।”

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संयोजक

 हमारी गौरैया और इनवारमेंट वैरियर्स

Hamari Gauraiya and Environment Warriors

*सम्पादक -डॉ .लीना

*सहायक सम्पादक -निशांत रंजन

उद्देश्य

विश्व गौरैया दिवस: एक साझा संकल्प

20 मार्च 2010 को जब विश्व गौरैया दिवस की शुरुआत हुई, तो मकसद साफ था—इस नन्हीं जान को लुप्त होने से बचाना। इस मुहिम को मजबूती देते हुए दिल्ली सरकार ने 15 अगस्त 2012 और बिहार सरकार ने 16 अप्रैल 2013 को गौरैया को अपना राजकीय पक्षी घोषित किया। तब से लेकर आज तक, सरकारी संस्थाओं और निजी संगठनों के साझा प्रयासों से गौरैया की ‘घर वापसी’ का अभियान निरंतर जारी है।

घर-आँगन, खेत-खलिहान में चहकने-फुदकने वाली गौरैया की घटती संख्या को रोकना और उनकी आबादी को बढ़ाने के लिए एक सुरक्षित और अनुकूल वातावरण सुनिश्चित करना। उद्देश्य है सभी गौरैया संरक्षकों का …इसमें हमारी गौरैया और पर्यावरण योद्धा(Hamari Gauraiya and Environment Warriors) भी शामिल है।

प्रधानमंत्री द्वारा गौरैया को संरक्षित करने को लेकर ‘मन की बात’ में कई बार सन्देश दिया गया हैं :- “विश्व गौरैया दिवस (20 मार्च) पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नन्हीं गौरैया को हमारे पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए उनके संरक्षण पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि शहरीकरण और प्रदूषण के कारण घटती इनकी संख्या पर्यावरण असंतुलन का संकेत है, इसलिए घरों में दाना-पानी रखकर और घोंसले बनाकर इनके प्रति स्नेह और जिम्मेदारी निभाएं।

हमारी पहल: पूर्णतः निस्वार्थ और जनहित में

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सम्पादक : डॉ लीना, सहायक सम्पादक : निशांत रंजन