पक्षियों की चहचहाहट बताएगी संख्या, एआई करेगा गणना

मोहन भट्ट/ हल्द्वानी। उत्तराखंड में पहली बार पक्षियों की विभिन्न प्रजातियों की संख्या का पता लगाने के लिए ‘वाइल्डलाइफ एकॉस्टिक रिकॉर्डर’ और एआई तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है।हल्द्वानी वन प्रभाग में करीब एक सप्ताह पहले शुरू की गईइस अनूठी पहल के तहत चार विशेष रिकॉर्डर खरीदे गए हैं। इन्हें वन प्रभाग की पांचों…

मोहन भट्ट/ हल्द्वानी। उत्तराखंड में पहली बार पक्षियों की विभिन्न प्रजातियों की संख्या का पता लगाने के लिए ‘वाइल्डलाइफ एकॉस्टिक रिकॉर्डर’ और एआई तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है।
हल्द्वानी वन प्रभाग में करीब एक सप्ताह पहले शुरू की गईइस अनूठी पहल के तहत चार विशेष रिकॉर्डर खरीदे गए हैं। इन्हें वन प्रभाग की पांचों रेंज में बारी-बारी से लगाने की योजना है। इसके तहत पक्षियों की अधिक आवाजाही वाले क्षेत्रों को चिह्नित कर रिकॉर्डर को पेड़ों पर बांधा जा रहा है। एक स्थान पर करीब एक हफ्ते तक रिकॉर्डर रखने के बाद उसके डाटा कार्ड में दर्ज ऑडियो को एक विशेष सॉफ्टवेयर में डाला जाता है। यह सॉफ्टवेयर एआई तकनीक की मदद से पक्षियों की एक-एक आवाज का बारीकी से विश्लेषण करता है और उनकी प्रजातियों की सटीक जानकारी सामने रख देता है।
ट्रायल में रिकॉर्ड हुई 145 आवाजेंः वन प्रभाग की छकाता रेंज में इस रिकॉर्डर का प्रारंभिक ट्रायल पूरा हो चुका है। यहां महज एक हफ्ते में रिकॉर्डर ने अलग-अलग पक्षियों की 145 आवाजें रिकॉर्ड की हैं। पक्षी विशेषज्ञों ने रिकॉर्डर द्वारा जुटाए गए आंकड़ों और एआई सॉफ्टवेयर द्वारा किए गए इसके सटीक विश्लेषण पर आश्चर्य और खुशी जताई है। दुर्लभ व निशाचर पक्षियों की आसानी से होगी पहचान : विशेषज्ञों के अनुसार, पक्षियों की कई ऐसी दुर्लभप्रजातियां हैं जो घने जंगलों में आसानी से दिखाई नहीं देतीं। अब इस तकनीक से उनकी ध्वनियों के आधार पर पहचान करना बेहद आसान हो जाएगा। इसके अलावा रात में सक्रिय रहने वाले निशाचर पक्षियों (जैसे उल्लू और नाइटजार) की प्रजातियों की संख्या जानने भी यह रात्रिकालीन ध्वनि रिकॉर्डिंग काफी मददगार साबित होगी । (साभार-दैनिक हिंदुस्तान,नई दिल्ली ,२जुन 2026)


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 हमारी गौरैया और इनवारमेंट वैरियर्स

Hamari Gauraiya and Environment Warriors

*सम्पादक -डॉ .लीना

*सहायक सम्पादक -निशांत रंजन

उद्देश्य

विश्व गौरैया दिवस: एक साझा संकल्प

20 मार्च 2010 को जब विश्व गौरैया दिवस की शुरुआत हुई, तो मकसद साफ था—इस नन्हीं जान को लुप्त होने से बचाना। इस मुहिम को मजबूती देते हुए दिल्ली सरकार ने 15 अगस्त 2012 और बिहार सरकार ने 16 अप्रैल 2013 को गौरैया को अपना राजकीय पक्षी घोषित किया। तब से लेकर आज तक, सरकारी संस्थाओं और निजी संगठनों के साझा प्रयासों से गौरैया की ‘घर वापसी’ का अभियान निरंतर जारी है।

घर-आँगन, खेत-खलिहान में चहकने-फुदकने वाली गौरैया की घटती संख्या को रोकना और उनकी आबादी को बढ़ाने के लिए एक सुरक्षित और अनुकूल वातावरण सुनिश्चित करना। उद्देश्य है सभी गौरैया संरक्षकों का …इसमें हमारी गौरैया और पर्यावरण योद्धा(Hamari Gauraiya and Environment Warriors) भी शामिल है।

प्रधानमंत्री द्वारा गौरैया को संरक्षित करने को लेकर ‘मन की बात’ में कई बार सन्देश दिया गया हैं :- “विश्व गौरैया दिवस (20 मार्च) पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नन्हीं गौरैया को हमारे पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए उनके संरक्षण पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि शहरीकरण और प्रदूषण के कारण घटती इनकी संख्या पर्यावरण असंतुलन का संकेत है, इसलिए घरों में दाना-पानी रखकर और घोंसले बनाकर इनके प्रति स्नेह और जिम्मेदारी निभाएं।

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