चितई गोलू देवता मंदिर :पर्चियों में फरियाद-घंटियों में गूंजता न्याय

प्रकृति से एक बार जुड़कर तो देखिए…(12) संजय कुमार/ उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले में अल्मोड़ा–जागेश्वर मार्ग पर स्थित एक ऐसा मंदिर है, जहां पहुंचते ही एक अनूठा दृश्य देखने को मिलता है। मंदिर परिसर में हजारों छोटी-बड़ी घंटियां और अनगिनत पर्चियां लटकी दिखाई देती हैं। कहीं सफेद कागज पर अपनी फरियाद-मनोकामना लिखकर बांधी गई है…

प्रकृति से एक बार जुड़कर तो देखिए…(12)

संजय कुमार/ उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले में अल्मोड़ा–जागेश्वर मार्ग पर स्थित एक ऐसा मंदिर है, जहां पहुंचते ही एक अनूठा दृश्य देखने को मिलता है। मंदिर परिसर में हजारों छोटी-बड़ी घंटियां और अनगिनत पर्चियां लटकी दिखाई देती हैं। कहीं सफेद कागज पर अपनी फरियाद-मनोकामना लिखकर बांधी गई है तो कहीं स्टांप पेपर पर न्याय की गुहार लगाई गई है। फरियाद- मनोकामना पूरी होने या न्याय मिलने पर श्रद्धालु यहां घंटियां चढ़ाकर अपनी कृतज्ञता प्रकट करते हैं। यह मंदिर है चितई गोलू देवता मंदिर, जिसे स्थानीय लोग पर्ची वाला मंदिर और घंटियों वाला मंदिर भी कहते हैं।

उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में गोलू देवता को न्याय के देवता के रूप में विशेष मान्यता प्राप्त है। यहां की लोकआस्था में गोलू देवता केवल मनोकामनाएं पूरी करने वाले देवता नहीं, बल्कि अन्याय के विरुद्ध न्याय दिलाने वाले आराध्य के रूप में पूजे जाते हैं। मान्यता है कि जब किसी व्यक्ति को कहीं से न्याय नहीं मिलता या वह किसी समस्या से परेशान होता है, तो वह गोलू देवता के दरबार में अपनी फरियाद लेकर पहुंचता है।

पर्चियों में लिखी जाती हैं फरियाद, घंटियों में दर्ज है आस्था

चितई गोलू देवता मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यहां की अर्जी और घंटियों की परंपरा है। दूर-दूर से आने वाले श्रद्धालु अपनी मनोकामना, समस्या, पारिवारिक विवाद या किसी अन्याय के विरुद्ध शिकायत को सादे कागज पर लिखकर मंदिर में अर्पित करते हैं। कुछ श्रद्धालु अपनी फरियाद स्टांप पेपर पर भी लिखकर चढ़ाते हैं। पूजा-अर्चना के बाद इन अर्जियों को मंदिर परिसर में उपलब्ध स्थान पर बांध दिया जाता है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि गोलू देवता उनकी फरियाद सुनते हैं और उन्हें न्याय दिलाते हैं। जब उनकी मनोकामना पूरी हो जाती है या उन्हें न्याय मिल जाता है, तो वे दोबारा मंदिर पहुंचकर घंटी चढ़ाते हैं। इसी परंपरा के चलते मंदिर परिसर, प्रवेश मार्ग और आसपास के हिस्सों में पीतल तथा तांबे की छोटी-बड़ी घंटियां लटकी दिखाई देती हैं। इसकी शुरुआत कब हुई कोई नहीं बताता,बस कहते हैं सदियों से चला आ रहा है।

मंदिर के पिछले हिस्से से लेकर प्रवेश द्वार तक पर्चियों और घंटियों की लंबी कतारें नजर आती हैं। मंदिर में वर्षों से सेवा कर रहे एक श्रद्धालु के अनुसार, यहां चढ़ाई गई पर्चियों और घंटियों की कभी आधिकारिक गिनती नहीं हुई है। हालांकि, इनकी संख्या और लगातार बढ़ते ढेर को देखकर इनके करोड़ों में होने का अनुमान लगाया जाता है। करीब 48 वर्षों से मंदिर में सेवा दे रहे श्रद्धालु के अनुसार, हर दिन बड़ी संख्या में लोग अपनी फरियाद लेकर यहां पहुंचते हैं।

चितई मंदिर के इतिहास को लेकर भी कई मान्यताएं प्रचलित हैं। हालांकि मंदिर की मूल स्थापना की कोई निश्चित ऐतिहासिक तिथि उपलब्ध नहीं है। कुमाऊं मंडल विकास निगम के पर्यटन साहित्य में मंदिर के वर्ष 1909 में पुनर्निर्माण का उल्लेख मिलता है।

कौन हैं गोलू देवता, क्या है उनकी उत्पत्ति की कहानी?

गोलू देवता को कुमाऊं क्षेत्र के प्रमुख लोक देवताओं में स्थान प्राप्त है। उन्हें गौर भैरव यानी भगवान शिव के भैरव स्वरूप का अवतार माना जाता है। कुमाऊं की लोकपरंपरा में उन्हें न्याय, साहस और जनकल्याण का प्रतीक माना जाता है। स्थानीय लोगों की मान्यता है कि गोलू देवता ने हमेशा अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाई और जरूरतमंदों की सहायता की। गोलू देवता की उत्पत्ति और जीवन को लेकर कुमाऊं में अलग-अलग लोककथाएं प्रचलित हैं। चंपावत और आसपास के क्षेत्रों में प्रचलित एक लोककथा के अनुसार, उनका संबंध कत्यूरी राजवंश से माना जाता है। एक अन्य स्थानीय लोकमान्यता में उनका संबंध कल्याण सिंह बिष्ट यानी कालबिष्ट से जोड़ा जाता है।

अल्मोड़ा जिला प्रशासन की वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार, कालबिष्ट को कुमाऊं का एक लोकनायक माना जाता है। मान्यता है कि उन्होंने अपने जीवन में गरीबों और शोषितों की सहायता की। उनके जीवन और बलिदान से जुड़ी लोकगाथाएं भी इस क्षेत्र में प्रचलित हैं। कालबिष्ट से जुड़ी कथा में उनके शरीर के गैराड़ और सिर के कपड़खान क्षेत्र में गिरने का उल्लेख मिलता है। इन लोकमान्यताओं के कारण डाना गोलू गैराड़ मंदिर को गोलू देवता का मूल और प्राचीन मंदिर माना जाता है।

कुमाऊं के गांव-गांव में पूजे जाते हैं गोलू देवता

गोलू देवता का महत्व केवल चितई मंदिर तक सीमित नहीं है। कुमाऊं के अनेक गांवों में उन्हें इष्ट देवता और कुल देवता के रूप में पूजा जाता है। स्थानीय परिवारों में उनके प्रति गहरी आस्था है। वे मानते हैं कि गोलू देवता उनके घर और साथ साथ रहते है उनकी सुरक्षा भी करते हैं। धार्मिक अवसरों, पारिवारिक आयोजनों और विशेष अनुष्ठानों में भी गोलू देवता का स्मरण किया जाता है।

कुमाऊं में गोलू देवता के कई प्रसिद्ध मंदिर हैं। इनमें अल्मोड़ा का चितई मंदिर, बिनसर क्षेत्र का डाना गोलू गैराड़ मंदिर, नैनीताल जिले का घोड़ाखाल मंदिर और चंपावत स्थित गोलू देवता मंदिर प्रमुख हैं। इनमें गैराड़ स्थित डाना गोलू मंदिर को विशेष रूप से प्राचीन और मूल मंदिर के रूप में मान्यता प्राप्त है।

अल्मोड़ा से लगभग 8 किलोमीटर दूर स्थित चितई मंदिर में गोलू देवता की घोड़े पर सवार प्रतिमा विराजमान है। मंदिर के गर्भगृह में राजसी वेशभूषा में धनुष-बाण धारण किए हुए गोलू देवता के दर्शन होते हैं। मंदिर में उनकी माता कालिंका और सहयोगी कालुवा मसाण से जुड़ी प्रतिमाएं भी हैं। डाना गोलू गैराड़ में गोलू देवता को सफेद वस्त्र, सफेद पगड़ी और सफेद शॉल अर्पित करने की परंपरा प्रचलित है।

लोकसंस्कृति का अनूठा संगम

गोलू देवता की पूजा उत्तराखंड की लोकसंस्कृति और धार्मिक परंपराओं से गहराई से जुड़ी है। कुमाऊं में प्रचलित जागर परंपरा में भी लोक देवताओं का आह्वान किया जाता है। जागर में लोकगीतों, पारंपरिक वाद्ययंत्रों और अनुष्ठानों के माध्यम से देवताओं की लोकगाथाओं का वर्णन किया जाता है। गोलू देवता से जुड़ी कथाएं भी इस सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा हैं।

न्याय के लिए विश्वास का केंद्र बन चुके गोलू देवता मंदिर आज के आधुनिक युग और न्याय प्रक्रिया के सामने सवाल बन कर खड़ा है। अगर मंदिर न्याय आर दे तो फिर न्याय व्यवस्था की क्या जरूरत है? लोग कोर्ट कचहरी न जाकर न्याय की उम्मीद लेकर यहाँ आते हैं। यहां लटकती हजारों घंटियां और अनगिनत पर्चियां केवल धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि उन उम्मीदों, विश्वास और भावनाओं की अभिव्यक्ति प्रतीत होती हैं, जिन्हें लेकर लोग गोलू देवता के दरबार में पहुंचते हैं।

कुमाऊं के लोकजीवन में गोलू देवता का स्थान इसी कारण विशिष्ट है। उनके मंदिर में लटकती हर घंटी किसी श्रद्धालु की पूरी हुई मन्नत की कहानी कहती है। यही वजह है कि चितई गोलू देवता मंदिर आज भी उत्तराखंड की लोकआस्था और सांस्कृतिक पहचान का एक महत्वपूर्ण केंद्र बना हुआ है।…जारी

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विश्व गौरैया दिवस: एक साझा संकल्प

20 मार्च 2010 को जब विश्व गौरैया दिवस की शुरुआत हुई, तो मकसद साफ था—इस नन्हीं जान को लुप्त होने से बचाना। इस मुहिम को मजबूती देते हुए दिल्ली सरकार ने 15 अगस्त 2012 और बिहार सरकार ने 16 अप्रैल 2013 को गौरैया को अपना राजकीय पक्षी घोषित किया। तब से लेकर आज तक, सरकारी संस्थाओं और निजी संगठनों के साझा प्रयासों से गौरैया की ‘घर वापसी’ का अभियान निरंतर जारी है।

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