बिनसर का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व

“प्रकृति से एक बार जुड़कर तो देखिए”…(11) संजय कुमार/बिनसर की पहचान केवल जंगलों और हिमालयी दृश्यों तक सीमित नहीं है। इसका ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व भी है।कुमाऊं के चंद शासकों के समय बिनसर का विशेष महत्व था। उत्तराखंड पर्यटन विभाग के अनुसार, यह चंद राजवंश की पूर्ववर्ती ग्रीष्मकालीन राजधानी रहा है। यहां का बिनेश्वर महादेव…

“प्रकृति से एक बार जुड़कर तो देखिए”…(11)

संजय कुमार/बिनसर की पहचान केवल जंगलों और हिमालयी दृश्यों तक सीमित नहीं है। इसका ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व भी है।कुमाऊं के चंद शासकों के समय बिनसर का विशेष महत्व था। उत्तराखंड पर्यटन विभाग के अनुसार, यह चंद राजवंश की पूर्ववर्ती ग्रीष्मकालीन राजधानी रहा है। यहां का बिनेश्वर महादेव मंदिर भगवान शिव को समर्पित एक प्राचीन धार्मिक स्थल है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, बिनसर नाम का संबंध इसी मंदिर से है। बिनसर और आसपास के क्षेत्रों में गोलू देवता से जुड़ी लोककथाएं भी प्रचलित हैं। कुमाऊं में गोलू देवता को न्याय के देवता के रूप में विशेष श्रद्धा से पूजा जाता है। उनसे जुड़ी कथाएं स्थानीय आस्था और लोकपरंपरा का हिस्सा हैं। इन कथाओं को ऐतिहासिक तथ्य के बजाय स्थानीय धार्मिक मान्यता और लोककथा के रूप में समझना उचित है।

यहां से बहुत दूर नहीं, अल्मोड़ा के पास कासर देवी मंदिर भी एक प्रसिद्ध धार्मिक और सांस्कृतिक स्थल है। यह स्थान अपनी शांत पहाड़ी स्थिति और आसपास के मनोरम दृश्यों के लिए जाना जाता है। स्वामी विवेकानंद के यहां आने का उल्लेख भी मिलता है। इन स्थलों को देखने से यात्रा में एक नया आयाम जुड़ता है। प्रकृति, इतिहास और आस्था का मेल बताता है कि पहाड़ों का महत्व केवल उनके प्राकृतिक संसाधनों में नहीं, बल्कि उनकी सांस्कृतिक विरासत में भी है।

“पर्यटन और पर्यावरण के बीच संतुलन जरूरी”

बिनसर जैसे प्राकृतिक स्थलों पर पर्यटन से स्थानीय लोगों को रोजगार मिलता है। होटल, होमस्टे, भोजनालय, स्थानीय परिवहन और गाइड जैसी सेवाओं से अर्थव्यवस्था को सहारा मिलता है। पर्यटकों की आवाजाही से स्थानीय संस्कृति और प्राकृतिक धरोहर के प्रति जागरूकता भी बढ़ सकती है।

लेकिन अनियंत्रित पर्यटन पर्यावरण के लिए चुनौती बन सकता है। अधिक वाहनों से शोर और प्रदूषण बढ़ सकता है। पानी की मांग पर दबाव पड़ सकता है। कचरे का उचित प्रबंधन न होने से जंगलों और आसपास के क्षेत्रों की स्वच्छता प्रभावित हो सकती है। वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास में अनावश्यक मानवीय हस्तक्षेप भी चिंता का विषय है। जंगलों में तेज आवाज, वन्यजीवों को भोजन देना और निर्धारित रास्तों से हटकर घूमना उनके व्यवहार तथा सुरक्षा को प्रभावित कर सकता है। इसलिए पर्यटन को प्रकृति के अनुकूल बनाना जरूरी है। स्थानीय समुदायों की भागीदारी, पानी का विवेकपूर्ण उपयोग, कचरे का उचित निस्तारण और वन्यजीवों के प्रति संवेदनशील व्यवहार इसकी महत्वपूर्ण शर्तें हैं।

पर्यटकों को भी यह समझना चाहिए कि पहाड़ केवल घूमने की जगह नहीं हैं। ये लोगों के घर हैं, जलस्रोतों का आधार हैं और अनेक जीव-जंतुओं का प्राकृतिक आवास हैं। हमें यहां के पर्यावरण का सम्मान करते हुए यात्रा करनी चाहिए।

“प्रकृति की सुंदरता बचाने की जिम्मेदारी हमारी भी”

काठगोदाम से बिनसर तक की यात्रा ने प्रकृति के अनेक रूपों से परिचित कराया। कहीं लोकसंस्कृति की झलक मिली, कहीं स्थानीय जीवन की सहजता दिखाई दी, कहीं पानी के महत्व का एहसास हुआ और कहीं जंगलों में पक्षियों तथा दूसरे जीवों की मौजूदगी ने मन को सुकून दिया। लेकिन रास्ते में पड़ा कचरा और खाली शराब की बोतलें यह भी बताती हैं कि प्रकृति की सुंदरता को बनाए रखने के लिए अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। हम प्रकृति से बहुत कुछ लेते हैं—स्वच्छ हवा, पानी, भोजन, औषधियां, मानसिक शांति और जीवन के लिए जरूरी संसाधन। इसके बदले हमें भी कुछ करना चाहिए।इसके लिए बड़े अभियान का हिस्सा बनना ही जरूरी नहीं है। यात्रा के दौरान कचरा न फैलाना, पानी बचाना, वन्यजीवों को परेशान न करना, स्थानीय नियमों का पालन करना और दूसरे लोगों को भी जिम्मेदार व्यवहार के लिए प्रेरित करना छोटे लेकिन महत्वपूर्ण कदम हैं।

यदि हम प्रकृति को केवल पर्यटन का साधन मानेंगे, तो धीरे-धीरे उसकी सुंदरता और जैव विविधता पर दबाव बढ़ेगा। लेकिन यदि हम उसे जीवन का आधार समझेंगे, तो उसके संरक्षण के प्रति हमारी जिम्मेदारी भी बढ़ेगी। बिनसर जैसे क्षेत्र हमें प्रकृति से जुड़ने का अवसर देते हैं। यहां की हरियाली, हिमालय की चोटियां, पक्षियों की आवाजें और जंगल की शांति हमें याद दिलाती हैं कि प्राकृतिक संपदा का कोई विकल्प नहीं है।

तो आइए, प्रकृति से एक बार जुड़कर देखिए। पहाड़ों की शांति महसूस कीजिए, जंगलों का संगीत सुनिए, पक्षियों की दुनिया को समझिए और लौटते समय अपने साथ केवल खूबसूरत यादें लेकर आइए—कचरा और प्रदूषण नहीं। प्रकृति सुरक्षित रहेगी, तभी उसकी सुंदरता, जैव विविधता और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य भी सुरक्षित रहेगा…जारी

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संयोजक

 हमारी गौरैया और इनवारमेंट वैरियर्स

Hamari Gauraiya and Environment Warriors

*सम्पादक -डॉ .लीना

*सहायक सम्पादक -निशांत रंजन

उद्देश्य

विश्व गौरैया दिवस: एक साझा संकल्प

20 मार्च 2010 को जब विश्व गौरैया दिवस की शुरुआत हुई, तो मकसद साफ था—इस नन्हीं जान को लुप्त होने से बचाना। इस मुहिम को मजबूती देते हुए दिल्ली सरकार ने 15 अगस्त 2012 और बिहार सरकार ने 16 अप्रैल 2013 को गौरैया को अपना राजकीय पक्षी घोषित किया। तब से लेकर आज तक, सरकारी संस्थाओं और निजी संगठनों के साझा प्रयासों से गौरैया की ‘घर वापसी’ का अभियान निरंतर जारी है।

घर-आँगन, खेत-खलिहान में चहकने-फुदकने वाली गौरैया की घटती संख्या को रोकना और उनकी आबादी को बढ़ाने के लिए एक सुरक्षित और अनुकूल वातावरण सुनिश्चित करना। उद्देश्य है सभी गौरैया संरक्षकों का …इसमें हमारी गौरैया और पर्यावरण योद्धा(Hamari Gauraiya and Environment Warriors) भी शामिल है।

प्रधानमंत्री द्वारा गौरैया को संरक्षित करने को लेकर ‘मन की बात’ में कई बार सन्देश दिया गया हैं :- “विश्व गौरैया दिवस (20 मार्च) पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नन्हीं गौरैया को हमारे पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए उनके संरक्षण पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि शहरीकरण और प्रदूषण के कारण घटती इनकी संख्या पर्यावरण असंतुलन का संकेत है, इसलिए घरों में दाना-पानी रखकर और घोंसले बनाकर इनके प्रति स्नेह और जिम्मेदारी निभाएं।“

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