अक्टूबर का सुहावना मौसम और जंगल की खामोशी

प्रकृति से एक बार जुड़कर तो देखिए…(9) संजय कुमार / हमने अक्टूबर के मध्य में बिनसर की यात्रा की। मौसम सुहावना था। सुबह और शाम हल्की ठंड महसूस हो रही थी, जबकि दिन में तेज धूप का आनंद लेने का अवसर मिला। ऐसे मौसम में पहाड़ों की खूबसूरती और भी निखरती मिली। पेड़ों के बीच…

प्रकृति से एक बार जुड़कर तो देखिए…(9)

संजय कुमार / हमने अक्टूबर के मध्य में बिनसर की यात्रा की। मौसम सुहावना था। सुबह और शाम हल्की ठंड महसूस हो रही थी, जबकि दिन में तेज धूप का आनंद लेने का अवसर मिला। ऐसे मौसम में पहाड़ों की खूबसूरती और भी निखरती मिली। पेड़ों के बीच से आती धूप, ठंडी हवा और जंगलों का शांत वातावरण मन को सुकून देता है। सुबह की ठंडक में जंगल की ओर निकलने का अपना अलग ही आनंद है।

बिनसर में मौसम के अनुसार तापमान में काफी अंतर हो सकता है। इसलिए गर्मियों में भी हल्के गर्म कपड़े साथ रखना उपयोगी है। अक्टूबर से दिसंबर के बीच मौसम अपेक्षाकृत साफ रहने पर हिमालय की चोटियों के दर्शन के अच्छे अवसर मिल सकते हैं, जबकि सर्दियों में ठंड बढ़ जाती है और कभी-कभी बर्फबारी भी हो सकती है। मार्च से जून का समय भी यात्रा के लिए लोकप्रिय है। इस दौरान मौसम सामान्यतः सुहावना रहता है और जंगलों की हरियाली तथा पक्षियों को देखने का अवसर मिलता है। जुलाई से सितंबर के बीच मानसून के कारण बारिश, फिसलन और भूस्खलन की आशंका हो सकती है, इसलिए यात्रा से पहले मौसम और सड़क की स्थिति की जानकारी लेना जरूरी है।

हमारे लिए अक्टूबर का यह अनुभव खास था। दिन में धूप का आनंद और सुबह-शाम की हल्की सर्दी ने यात्रा को यादगार बना दिया। हालांकि, ऐसे अनुभव को केवल पढ़कर नहीं, वहां जाकर ही पूरी तरह महसूस किया जा सकता है।

बांज, बुरांश और चीड़ के जंगल

बिनसर का प्राकृतिक संसार यहां के जंगलों के बिना अधूरा है। क्षेत्र की ऊंचाई और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार बांज यानी ओक, बुरांश और चीड़ के वन पाए जाते हैं। इन जंगलों में अलग-अलग प्रकार की वनस्पतियां और अनेक जीव-जंतु रहते हैं। बांज के जंगल पहाड़ी पारिस्थितिकी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ये मिट्टी को थामने, नमी बनाए रखने और अनेक जीवों को आश्रय देने में सहायक होते हैं। बुरांश अपने आकर्षक फूलों के लिए प्रसिद्ध है, जबकि चीड़ के जंगल भी पहाड़ी भू-दृश्य का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

जंगल में चलते हुए पेड़ों की विविधता, जमीन पर गिरी पत्तियां, झाड़ियों में हलचल और हवा में घुली मिट्टी की गंध का अनुभव किया जा सकता है। यदि हम थोड़ी देर शांत होकर रुकें, तो जंगल के भीतर चल रही गतिविधियों को महसूस कर सकते हैं। जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं है। यहां मिट्टी में रहने वाले सूक्ष्म जीवों से लेकर कीट-पतंगों, पक्षियों और बड़े वन्यजीवों तक अनेक जीव एक-दूसरे से जुड़े होते हैं। इस पूरी व्यवस्था को पारिस्थितिकी तंत्र कहा जाता है। यदि जंगलों का प्राकृतिक स्वरूप बिगड़ता है, तो उसका असर केवल पेड़ों पर नहीं, बल्कि उनसे जुड़े पूरे जीवन तंत्र पर पड़ता है। इसलिए जंगलों की रक्षा का अर्थ जैव विविधता की रक्षा भी है।

बिनसर में पक्षियों की दुनिया

बिनसर पक्षियों की विविधता के लिए विशेष रूप से जाना जाता है। यहां 200 से अधिक स्थानीय और प्रवासी पक्षी प्रजातियों का उल्लेख पर्यटन संबंधी स्रोतों में मिलता है। यही कारण है कि पक्षी अवलोकन के शौकीनों के लिए यह क्षेत्र आकर्षण का केंद्र है। यहां हिमालयी मोनाल, कलीज तीतर, विभिन्न प्रकार के कठफोड़वे, बुलबुल, फ्लाईकैचर और दूसरे वनपक्षियों को देखने के अवसर मिल सकते हैं। कौन-सा पक्षी किस समय दिखाई देगा, यह मौसम, ऊंचाई और वन क्षेत्र की परिस्थितियों पर निर्भर करता है। सुबह का समय पक्षी अवलोकन के लिए विशेष रूप से उपयोगी हो सकता है। पक्षी भोजन की तलाश में सक्रिय रहते हैं और उनकी आवाजें जंगल में गूंजती हैं। पेड़ों की शाखाओं पर बैठते, एक डाल से दूसरी डाल पर जाते या जमीन के आसपास भोजन तलाशते पक्षियों को देखना प्रकृति प्रेमियों के लिए रोमांचक अनुभव है।

दूरबीन से पक्षियों को देखना इस अनुभव को और बेहतर बना सकता है। कई पक्षी पेड़ों की ऊंची शाखाओं या घनी पत्तियों के बीच छिपे रहते हैं, इसलिए उनकी पहचान करने के लिए धैर्य की जरूरत होती है। लेकिन पक्षियों को देखने के दौरान सावधानी भी जरूरी है। उनके घोंसलों के पास बार-बार जाना, तेज आवाज करना, उन्हें पकड़ने की कोशिश करना या उनके प्राकृतिक व्यवहार में हस्तक्षेप करना उचित नहीं है। पक्षियों की तस्वीरें लेते समय भी उनके लिए सुरक्षित दूरी बनाए रखनी चाहिए। बिनसर में पक्षी अवलोकन का असली आनंद केवल दुर्लभ प्रजातियों को देखने में नहीं, बल्कि उनके प्राकृतिक व्यवहार को समझने में है। पक्षियों की उपस्थिति हमें बताती है कि जंगल में भोजन, आश्रय और प्रजनन के लिए उपयुक्त परिस्थितियां कितनी महत्वपूर्ण हैं।….जारी

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संयोजक

 हमारी गौरैया और इनवारमेंट वैरियर्स

Hamari Gauraiya and Environment Warriors

*सम्पादक -डॉ .लीना

*सहायक सम्पादक -निशांत रंजन

उद्देश्य

विश्व गौरैया दिवस: एक साझा संकल्प

20 मार्च 2010 को जब विश्व गौरैया दिवस की शुरुआत हुई, तो मकसद साफ था—इस नन्हीं जान को लुप्त होने से बचाना। इस मुहिम को मजबूती देते हुए दिल्ली सरकार ने 15 अगस्त 2012 और बिहार सरकार ने 16 अप्रैल 2013 को गौरैया को अपना राजकीय पक्षी घोषित किया। तब से लेकर आज तक, सरकारी संस्थाओं और निजी संगठनों के साझा प्रयासों से गौरैया की ‘घर वापसी’ का अभियान निरंतर जारी है।

घर-आँगन, खेत-खलिहान में चहकने-फुदकने वाली गौरैया की घटती संख्या को रोकना और उनकी आबादी को बढ़ाने के लिए एक सुरक्षित और अनुकूल वातावरण सुनिश्चित करना। उद्देश्य है सभी गौरैया संरक्षकों का …इसमें हमारी गौरैया और पर्यावरण योद्धा(Hamari Gauraiya and Environment Warriors) भी शामिल है।

प्रधानमंत्री द्वारा गौरैया को संरक्षित करने को लेकर ‘मन की बात’ में कई बार सन्देश दिया गया हैं :- “विश्व गौरैया दिवस (20 मार्च) पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नन्हीं गौरैया को हमारे पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए उनके संरक्षण पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि शहरीकरण और प्रदूषण के कारण घटती इनकी संख्या पर्यावरण असंतुलन का संकेत है, इसलिए घरों में दाना-पानी रखकर और घोंसले बनाकर इनके प्रति स्नेह और जिम्मेदारी निभाएं।“

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