जल सुरक्षा का संकल्प: जन भागीदारी अहम् पहल

संजय कुमार / जल ही जीवन है। जल है तो हरियाली है। हरियाली है तो स्वच्छ पर्यावरण है। यह सिर्फ एक नारा नहीं, बल्कि मानव अस्तित्व और सतत विकास की बुनियादी आवश्यकता है। बढ़ती आबादी, शहरीकरण, कृषि और औद्योगिक गतिविधियों के विस्तार के बीच जल संसाधनों का संरक्षण आज पूरी दुनिया के सामने एक बड़ी…

संजय कुमार / जल ही जीवन है। जल है तो हरियाली है। हरियाली है तो स्वच्छ पर्यावरण है। यह सिर्फ एक नारा नहीं, बल्कि मानव अस्तित्व और सतत विकास की बुनियादी आवश्यकता है। बढ़ती आबादी, शहरीकरण, कृषि और औद्योगिक गतिविधियों के विस्तार के बीच जल संसाधनों का संरक्षण आज पूरी दुनिया के सामने एक बड़ी चुनौती बन गया है। तभी तो इसके गंभीर हालात को देखते हुए जल सुरक्षा अंतरराष्ट्रीय सहयोग और पर्यावरण संरक्षण के महत्वपूर्ण मुद्दों में शामिल हो चुका है। पर्यावरणविद,सरकारी और गैर सरकारी संगठन यों कहें सभी जल संरक्षण के लिए प्रयासरत हैं। इसमें ब्रिक्स भी शामिल है ।

भारत की अध्यक्षता 1 से 7 नवंबर 2026 तक नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स के तहत ‘ब्रिक्स सस्टेनेबल लाइफस्टाइल वीक’ में जल संरक्षण को सात प्रमुख विषयों में विशेष स्थान दिया गया। इस सप्ताह का उद्देश्य मिशन लाइफ यानि लाइफस्टाइल फॉर एनवायरनमेंट के माध्यम से लोगों को पर्यावरण के अनुकूल जीवनशैली अपनाने के लिए प्रेरित करना है। और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार और टिकाऊ जीवनशैली को जन-आंदोलन बनाना है। इसके तहत 3 नवंबर को जल संरक्षण पर विशेष जोर दिया गया। सवाल यह है कि सरकारी नीतियां, ब्रिक्स देशों का साझा सहयोग और हमारी रोजमर्रा की छोटी-छोटी आदतें किस तरह जल सुरक्षा को मजबूत बना सकती हैं।

भूजल संरक्षण: भारत के सामने बड़ी चुनौती

भूजल भारत की जल सुरक्षा की रीढ़ है। कृषि, ग्रामीण परिवारों और शहरी समुदायों की पेयजल आवश्यकताओं का एक बड़ा हिस्सा इसी पर निर्भर करता है। लेकिन भूजल का अत्यधिक दोहन, बढ़ती आबादी और जल की लगातार बढ़ती मांग इस बहुमूल्य संसाधन पर दबाव बढ़ा रही है।

केंद्रीय भूजल बोर्ड और राज्यों के संयुक्त आकलन पर आधारित वर्ष 2024 की भूजल संसाधन रिपोर्ट के अनुसार, भारत में कुल वार्षिक भूजल पुनर्भरण 446.90 अरब घन मीटर (BCM) आंका गया है। प्राकृतिक निकासी को ध्यान में रखने के बाद वार्षिक उपयोग योग्य भूजल संसाधन 406.19 अरब घन मीटर है, जबकि सालाना भूजल दोहन 245.64 अरब घन मीटर दर्ज किया गया। देश में भूजल दोहन का औसत स्तर 60.47 प्रतिशत है। रिपोर्ट के अनुसार, देश की कुल 6,746 भूजल मूल्यांकन इकाइयों में से 751 इकाइयां अति-दोहित (Over-exploited), 206 गंभीर (Critical) और 711 अर्ध-गंभीर (Semi-critical) श्रेणी में हैं। हालांकि, एक सकारात्मक पहलू यह भी है कि 2017 की तुलना में सुरक्षित श्रेणी वाली इकाइयों का अनुपात 62.6 प्रतिशत से बढ़कर 73.4 प्रतिशत हुआ है। वहीं, अति-दोहित इकाइयों का अनुपात 17.24 प्रतिशत से घटकर 11.13 प्रतिशत रह गया है। यह सुधार जल संरक्षण के प्रयासों की उपयोगिता को दर्शाता है, लेकिन चुनौतियां अभी भी बड़ी हैं।

जल संचय जन भागीदारी: जन आंदोलन बन रहा जल संरक्षण

भूजल संरक्षण की इसी आवश्यकता को देखते हुए जल शक्ति मंत्रालय ने 6 सितंबर 2024 को गुजरात के सूरत से ‘जल संचय जन भागीदारी’ (JSJB) पहल की शुरुआत की। इसका उद्देश्य जल संरक्षण को केवल सरकारी कार्यक्रम तक सीमित न रखकर नागरिकों, उद्योगों, स्थानीय निकायों, स्वयंसेवी संस्थाओं और समुदायों की सामूहिक जिम्मेदारी बनाना है।

इस पहल के तहत छतों पर वर्षा जल संचयन प्रणाली, रिचार्ज पिट, कृत्रिम भूजल पुनर्भरण संरचनाओं और बंद पड़े बोरवेल को पुनर्जीवित करने जैसे उपायों को बढ़ावा दिया जा रहा है। जल शक्ति मंत्रालय के आधिकारिक डैशबोर्ड के अनुसार, 3 नवंबर 2026 तक इस पहल के तहत कुल 1,66,20,593 जल संरक्षण एवं पुनर्भरण संरचनाएं दर्ज की गई हैं। यह आंकड़ा जनभागीदारी के माध्यम से जल संरक्षण के व्यापक विस्तार को दर्शाता है।

इस अभियान का एक महत्वपूर्ण पहलू पारंपरिक जल संरक्षण प्रणालियों का पुनरुद्धार भी है। भारत की ऐतिहासिक बावड़ियां, तालाब, जोहड़, कुंड और अन्य स्थानीय जल संरचनाएं इस बात का प्रमाण हैं कि हमारे पूर्वजों ने स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप पानी को सहेजने के प्रभावी तरीके विकसित किए थे। इन पारंपरिक प्रणालियों को आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों के साथ जोड़कर जल संरक्षण के प्रयासों को और प्रभावी बनाया जा सकता है।

जल सुरक्षा में ब्रिक्स देशों की साझा भूमिका

जल संकट किसी एक देश तक सीमित नहीं है। जलवायु परिवर्तन, अनियमित वर्षा, सूखा, मरुस्थलीकरण और जल संसाधनों पर बढ़ता दबाव ब्रिक्स देशों सहित दुनिया के अनेक देशों के सामने समान चुनौतियां हैं। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय सहयोग, तकनीकी नवाचार और अनुभवों का आदान-प्रदान बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है।

ब्रिक्स देशों ने पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में सहयोग को संस्थागत रूप देने के लिए जुलाई 2018 में पर्यावरण सहयोग समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए थे। इस समझौते में जल, वायु गुणवत्ता, जैव विविधता, जलवायु परिवर्तन और अपशिष्ट प्रबंधन को सहयोग के प्रमुख क्षेत्रों में शामिल किया गया। भारत की 2026 की ब्रिक्स अध्यक्षता के तहत इस सहयोग को आगे बढ़ाने के लिए कई महत्वपूर्ण पहल की गई हैं। 18 अगस्त 2026 को नई दिल्ली में 12वीं ब्रिक्स पर्यावरण मंत्रियों की बैठक आयोजित हुई। बैठक में सदस्य देशों ने पर्यावरणीय चुनौतियों से निपटने के लिए ज्ञान साझा करने, तकनीकी सहयोग और संस्थागत साझेदारी को मजबूत बनाने पर जोर दिया। बैठक के समापन पर संयुक्त मंत्रिस्तरीय वक्तव्य स्वीकार किया गया और चार ज्ञान संकलनों का शुभारंभ भी किया गया।

इसके बाद 12-13 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में आयोजित 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में ‘ब्रिक्स नई दिल्ली घोषणापत्र’ स्वीकार किया गया। इसमें जल उपलब्धता, सूखा, मरुस्थलीकरण, भूमि क्षरण और रेत एवं धूल भरी आंधियों को गंभीर पर्यावरणीय चुनौतियों के रूप में रेखांकित किया गया। घोषणापत्र में जल संसाधनों के एकीकृत संरक्षण और प्रबंधन तथा पारंपरिक ज्ञान, स्थानीय नवाचार और वैज्ञानिक तकनीक के बीच बेहतर तालमेल की आवश्यकता पर भी बल दिया गया।

पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक तकनीक का संगम

ब्रिक्स देशों के बीच सहयोग के माध्यम से भारत की पारंपरिक जल संरक्षण प्रणालियों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर साझा किया जा सकता है। राजस्थान की बावड़ियां, गुजरात के पारंपरिक जल संचयन मॉडल, लद्दाख की कृत्रिम हिमनद तकनीक और अन्य स्थानीय जल प्रणालियां जल प्रबंधन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण अनुभव प्रदान करती हैं।

‘जल संचय जन भागीदारी’ नेटवर्क के माध्यम से पारंपरिक जल संरचनाओं के पुनरुद्धार, वर्षा जल संचयन और भूजल पुनर्भरण के सफल मॉडलों को साझा किया जा सकता है। इसके साथ ही जल शक्ति केंद्रों के माध्यम से वेबिनार, कार्यशालाएं और विशेषज्ञ चर्चाएं आयोजित कर केंद्रीय भूमि जल बोर्ड, राज्य जल संसाधन विभागों, शोध संस्थानों और स्थानीय समुदायों को एक मंच पर लाया जा सकता है। आधुनिक तकनीक के उपयोग से जल संसाधनों की निगरानी, भूजल स्तर का आकलन, वर्षा जल संचयन की योजना और जल संरचनाओं के प्रभाव का मूल्यांकन भी अधिक प्रभावी ढंग से किया जा सकता है।

जल संरक्षण की शुरुआत हमारी दैनिक आदतों से

सरकारी योजनाओं और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के साथ आम नागरिकों की भागीदारी भी उतनी ही जरूरी है। जल संरक्षण के लिए बड़े निवेश या जटिल तकनीक की हमेशा आवश्यकता नहीं होती। हमारी रोजमर्रा की कुछ छोटी आदतें भी बड़ा बदलाव ला सकती हैं।

  • ब्रश करते समय और शेविंग के दौरान नल बंद रखें।
  • घरों में पानी के रिसाव को तुरंत ठीक करवाएं।
  • छतों पर वर्षा जल संचयन प्रणाली स्थापित करें।
  • बागवानी में जरूरत के अनुसार पानी दें और ड्रिप सिंचाई जैसे तरीकों को अपनाएं।
  • वाहन धोने और फर्श की सफाई में पाइप के बजाय बाल्टी का इस्तेमाल करें।
  • आरओ और अन्य घरेलू उपकरणों से निकलने वाले पानी का उपयुक्त पुनः उपयोग करें।
  • स्थानीय तालाबों, झीलों और जलाशयों को स्वच्छ रखने में सामुदायिक भागीदारी निभाएं।

इन छोटे प्रयासों के साथ जल के विवेकपूर्ण उपयोग और संरक्षण को परिवार, विद्यालय, कार्यालय और समुदाय के स्तर पर जीवनशैली का हिस्सा बनाना होगा।

आने वाली पीढ़ियों के लिए जल सुरक्षित करने का संकल्प

ब्रिक्स सस्टेनेबल लाइफस्टाइल वीक का संदेश केवल एक सप्ताह तक सीमित रहने वाला अभियान नहीं, बल्कि पर्यावरण के प्रति हमारी दीर्घकालिक जिम्मेदारी का आह्वान है। जल सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सरकारी नीतियों, वैज्ञानिक नवाचार, पारंपरिक ज्ञान, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और जनभागीदारी के बीच मजबूत तालमेल जरूरी है। भारत के पास सदियों पुराना जल संरक्षण का अनुभव, आधुनिक वैज्ञानिक क्षमता और सामुदायिक भागीदारी की मजबूत परंपरा है। इन्हें ब्रिक्स देशों के साझा प्रयासों के साथ जोड़कर जल संकट से निपटने के नए रास्ते तैयार किए जा सकते हैं। जल की हर बूंद का संरक्षण केवल आज की जरूरत नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित और सतत भविष्य की जिम्मेदारी है। (सन्दर्भ -PIB)

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फोटो -AI

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संयोजक

 हमारी गौरैया और इनवारमेंट वैरियर्स

Hamari Gauraiya and Environment Warriors

*सम्पादक -डॉ .लीना

*सहायक सम्पादक -निशांत रंजन

उद्देश्य

विश्व गौरैया दिवस: एक साझा संकल्प

20 मार्च 2010 को जब विश्व गौरैया दिवस की शुरुआत हुई, तो मकसद साफ था—इस नन्हीं जान को लुप्त होने से बचाना। इस मुहिम को मजबूती देते हुए दिल्ली सरकार ने 15 अगस्त 2012 और बिहार सरकार ने 16 अप्रैल 2013 को गौरैया को अपना राजकीय पक्षी घोषित किया। तब से लेकर आज तक, सरकारी संस्थाओं और निजी संगठनों के साझा प्रयासों से गौरैया की ‘घर वापसी’ का अभियान निरंतर जारी है।

घर-आँगन, खेत-खलिहान में चहकने-फुदकने वाली गौरैया की घटती संख्या को रोकना और उनकी आबादी को बढ़ाने के लिए एक सुरक्षित और अनुकूल वातावरण सुनिश्चित करना। उद्देश्य है सभी गौरैया संरक्षकों का …इसमें हमारी गौरैया और पर्यावरण योद्धा(Hamari Gauraiya and Environment Warriors) भी शामिल है।

प्रधानमंत्री द्वारा गौरैया को संरक्षित करने को लेकर ‘मन की बात’ में कई बार सन्देश दिया गया हैं :- “विश्व गौरैया दिवस (20 मार्च) पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नन्हीं गौरैया को हमारे पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए उनके संरक्षण पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि शहरीकरण और प्रदूषण के कारण घटती इनकी संख्या पर्यावरण असंतुलन का संकेत है, इसलिए घरों में दाना-पानी रखकर और घोंसले बनाकर इनके प्रति स्नेह और जिम्मेदारी निभाएं।“

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