“प्रकृति से एक बार जुड़कर तो देखिए”…(6)
संजय कुमार / बिनसर पहाड़ों की यात्रा का सबसे सुखद अनुभव केवल दूर दिखाई देने वाली चोटियां या घने जंगल नहीं थे बल्कि पेड़ों के बीच से सुनाई देने वाली पक्षियों की आवाजें भी इस अनुभव को खास बनाती मिली। रात में आसमान में टिमटिमाते तारे और धरती पर झींगुर की जबरदस्त आवाज एक साथ कई झींगुरों की आवाज पूरे इलाकें में ऐसे गूंजते मिले जैसे हर ओर उन्ही का कब्ज़ा हो कभी-कभी तो दिन में भी उनकी आवाज सुनने को मिली। दिन में चिड़ियों की संगीतमय आवाज और रात में झींगुर की कर्कश शोर भी कानों को शहरों में वाहनों के शोर, निर्माण कार्यों और लगातार बजते ध्वनि उपकरणों के तुलना में सुकून देते मिले । शहरों में ध्वनी प्रदूषण के बीच पक्षियों की आवाज कई बार सुनाई ही नहीं देती। इसके विपरीत, पहाड़ी-जंगलों में प्रकृति का एक अलग संसार महसूस किया जा सकता है।
बिनसर के जंगल से किसी पेड़ से आती चहचहाहट, तो कभी दूर से सुनाई देती किसी पक्षी की पुकार और कभी पत्तियों के बीच होती हलचल हमें यह एहसास कराती है कि जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं है। यह असंख्य जीवों का घर है, जहां हर प्रजाति की अपनी भूमिका होती है। उत्तराखंड के जंगलों में ऊंचाई और वनस्पति के अनुसार पक्षियों की विविधता देखने को मिलती है। बिनसर क्षेत्र अपने पक्षी जीवन के लिए विशेष रूप से जाना जाता है। यहां स्थानीय और प्रवासी पक्षियों की लगभग 200 प्रजातियों का उल्लेख उत्तराखंड पर्यटन विभाग करता है। इनमें विभिन्न प्रकार की वन चिड़ियां, कठफोड़वे, फाख्ता, कलिज और कोकलास जैसे पक्षी शामिल हैं। हालांकि, किसी खास यात्रा में कौन-सी प्रजाति दिखाई देगी, यह मौसम, स्थान और समय पर निर्भर करता है। मैंने बिनसर में बर्ड वाचिंग के दौरान 30 से ज्यादा चिड़ियों को देखा और उनमें कुछ को कैमरे में कैद किया जैसे- एशियन टिट, बार-टेल्ड ट्रीक्रीपर, ब्लैक-हेडेड जे, ब्राउन-फ्रंटेड वुडपेकर, क्रिमसन सनबर्ड, ग्रे बुशचैट, हिमालयन बुलबुल, हाउस स्पैरो, इंडियन व्हाइट-आई, रेड-वेंटेड बुलबुल, रसेट स्पैरो, रस्टी-चीक्ड स्किमिटर-बैबलर, सनबर्ड, व्हाइट-टेल्ड नटहैच, मैना, कबूतर, हरियल आदि प्रमुख है। मुझे गौरैया की दो प्रजाति जैसे घरेलू और लाल (रसेट) गौरैया दिखी, जिसने रोमांचित कर दिया।
पक्षियों को देखने के लिए महंगे उपकरण होना जरूरी नहीं है। धैर्य, ध्यान और शांत व्यवहार से भी उनके संसार को समझा जा सकता है। दूरबीन और पक्षियों की पहचान से संबंधित पुस्तक या मोबाइल ऐप इस अनुभव को और उपयोगी बना सकते हैं। मैंने अपने कैमरा निकोन डी 1100 का भरपूर इस्तेमाल किया जबरदस्त लेंस ने दुर्लभ चिड़ियों के दर्शन ही नहीं करायें बल्कि कैद करने में भरपूर सहयोग किया। लेकिन पक्षी अवलोकन करते समय कुछ सावधानियां जरूरी हैं। तेज आवाज नहीं करना अथवा उन्हें आकर्षित करने के लिए बार-बार आवाज बजाना उचित नहीं है। हमें उनके प्राकृतिक व्यवहार में कम से कम हस्तक्षेप करना। जैसे वह पत्तों के बीच छुपी बैठी रहती है उसे उदेखने के लिए पत्थर मार कर उड़ना नहीं चाहिए।
पक्षियों की उपस्थिति हमें यह भी बताती है कि किसी जंगल में भोजन, आश्रय और प्रजनन के लिए आवश्यक परिस्थितियां कितनी महत्वपूर्ण हैं। यदि जंगलों का स्वरूप बदलता है, पेड़ों की विविधता घटती है या मानवीय गतिविधियों से उनके आवास प्रभावित होते हैं, तो इसका असर पक्षियों पर भी पड़ सकता है। प्रकृति के इस संगीत को सुनने के लिए हमें केवल अपने कान नहीं, अपना मन भी शांत करना होगा। हमने बिनसर यात्रा में चिड़ियों के संग जो वक्त बिताया वह यादगार रहा।…. जारी














