प्रकृति से एक बार जुड़कर तो देखिए…(5)

*जल की कमी और सड़क किनारे लगे चेतावनी बोर्ड, पहाड़ से सिखने की जरूरत * संजय कुमार / यात्रा के दौरान एक महत्वपूर्ण बात ने हमारा ध्यान खींचा। काठगोदाम से अल्मोड़ा की ओर जाने वाले मार्ग पर कई जगह वाहनों की धुलाई से संबंधित प्रतिबंधात्मक चेतावनी बोर्ड लगे दिखाई दिए। इन बोर्डों को देखकर पहाड़ी…

*जल की कमी और सड़क किनारे लगे चेतावनी बोर्ड, पहाड़ से सिखने की जरूरत *

संजय कुमार / यात्रा के दौरान एक महत्वपूर्ण बात ने हमारा ध्यान खींचा। काठगोदाम से अल्मोड़ा की ओर जाने वाले मार्ग पर कई जगह वाहनों की धुलाई से संबंधित प्रतिबंधात्मक चेतावनी बोर्ड लगे दिखाई दिए। इन बोर्डों को देखकर पहाड़ी क्षेत्रों में जल की उपलब्धता और उसके विवेकपूर्ण उपयोग का प्रश्न मन में आया।

जल जीवन का आधार है, लेकिन पहाड़ों में इसकी उपलब्धता को हमेशा सहज नहीं माना जा सकता। कई गांवों में लोगों को पेयजल के लिए प्राकृतिक जलस्रोतों, धारों और स्थानीय जलापूर्ति व्यवस्थाओं पर निर्भर रहना पड़ता है। गर्मियों में जलस्रोतों पर दबाव बढ़ सकता है। वर्षा के बदलते स्वरूप, जंगलों की स्थिति, भूमि के उपयोग में बदलाव और बढ़ती आबादी तथा पर्यटन की मांग भी स्थानीय जल व्यवस्था को प्रभावित कर सकती है।

वाहनों की धुलाई पर प्रतिबंध संबंधी बोर्ड किसी स्थानीय प्रशासनिक आदेश या जल संरक्षण व्यवस्था का हिस्सा हो सकते हैं। इनका उद्देश्य जिस परिस्थिति में भी हो, वे एक बड़े सवाल की ओर ध्यान दिलाते हैं, जब पहाड़ों में रहने वाले लोगों के लिए पानी महत्वपूर्ण संसाधन है, तो क्या पर्यटकों को इसका उपयोग अधिक जिम्मेदारी से नहीं करना चाहिए?

पर्यटन स्थलों पर होटल, रेस्टोरेंट, होमस्टे, वाहन और दूसरी सुविधाओं के संचालन में पानी की जरूरत होती है। पर्यटकों की संख्या बढ़ने के साथ इस मांग का दबाव भी बढ़ सकता है। इसलिए पर्यटन विकास की योजना बनाते समय स्थानीय जलस्रोतों की क्षमता और वहां रहने वाले लोगों की जरूरतों को प्राथमिकता देना जरूरी है। हम सभी अपने स्तर पर छोटे कदम उठा सकते हैं। पानी को व्यर्थ बहने से रोकना, अनावश्यक धुलाई से बचना, स्थानीय नियमों का पालन करना और जल की बर्बादी करने वाली गतिविधियों को प्रोत्साहित न करना ऐसे ही कदम हैं।

प्रकृति की सुंदरता का आनंद लेने के लिए पहाड़ों तक पहुंचना आसान है, लेकिन उन संसाधनों की रक्षा करना भी उतना ही जरूरी है जिनके कारण ये पहाड़ सुंदर और जीवनदायी बने हुए हैं। केवल पहाड़ी क्षेत्र में ही बल्कि मैदानी क्षेत्रों में भी जल की समस्या है। ऐसे में पानी की बर्बादी को लेकर कड़े कानून की जरूरत है। साथ ही जनजागरूकता फ़ैलाने की।

“रास्ते में चाय, नाश्ता और स्थानीय कारोबार”

पहाड़ी रास्तों पर यात्रा के दौरान छोटे-बड़े रेस्टोरेंट और चाय-नाश्ते की दुकानें यात्रियों के लिए राहत का काम करती हैं। घुमावदार सड़कों पर लगातार सफर करने से थकान हो जाती है। ऐसे में सुरक्षित स्थान पर रुककर चाय पीना, भोजन करना, शौचालय का उपयोग करना और कुछ देर आराम करना यात्रा को सुविधाजनक बनाता है।

इन दुकानों और रेस्टोरेंट से स्थानीय लोगों को रोजगार भी मिल रहा है। पर्यटन से होने वाली आय पहाड़ी क्षेत्रों की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। स्थानीय उत्पादों, पारंपरिक भोजन, हस्तशिल्प और छोटे कारोबार को बढ़ावा मिलने से गांवों में रोजगार के अवसर तो पैदा होते हैं। वैसे, रोजगार के साधन सीमित दिखें। देखा जाये तो पहाड़ का जीवन संकटों से भरा है। कुछ लोग खेती करते हैं तो कुछ टैक्सी चलाते हैं। लेकिन पर्यटन का लाभ तभी लंबे समय तक बना रह सकता है, जब उससे प्राकृतिक संसाधनों पर अनियंत्रित दबाव न पड़े। दुकानों और रेस्टोरेंट से निकलने वाले कचरे का उचित प्रबंधन, साफ-सफाई, शौचालयों की व्यवस्था और जल संरक्षण जैसे विषयों पर ध्यान देना जरूरी है। तेजी से दुकानों और रेस्टोरेंट का निर्माण हो रहा है।…..जारी

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संयोजक

 हमारी गौरैया और इनवारमेंट वैरियर्स

Hamari Gauraiya and Environment Warriors

*सम्पादक -डॉ .लीना

*सहायक सम्पादक -निशांत रंजन

उद्देश्य

विश्व गौरैया दिवस: एक साझा संकल्प

20 मार्च 2010 को जब विश्व गौरैया दिवस की शुरुआत हुई, तो मकसद साफ था—इस नन्हीं जान को लुप्त होने से बचाना। इस मुहिम को मजबूती देते हुए दिल्ली सरकार ने 15 अगस्त 2012 और बिहार सरकार ने 16 अप्रैल 2013 को गौरैया को अपना राजकीय पक्षी घोषित किया। तब से लेकर आज तक, सरकारी संस्थाओं और निजी संगठनों के साझा प्रयासों से गौरैया की ‘घर वापसी’ का अभियान निरंतर जारी है।

घर-आँगन, खेत-खलिहान में चहकने-फुदकने वाली गौरैया की घटती संख्या को रोकना और उनकी आबादी को बढ़ाने के लिए एक सुरक्षित और अनुकूल वातावरण सुनिश्चित करना। उद्देश्य है सभी गौरैया संरक्षकों का …इसमें हमारी गौरैया और पर्यावरण योद्धा(Hamari Gauraiya and Environment Warriors) भी शामिल है।

प्रधानमंत्री द्वारा गौरैया को संरक्षित करने को लेकर ‘मन की बात’ में कई बार सन्देश दिया गया हैं :- “विश्व गौरैया दिवस (20 मार्च) पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नन्हीं गौरैया को हमारे पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए उनके संरक्षण पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि शहरीकरण और प्रदूषण के कारण घटती इनकी संख्या पर्यावरण असंतुलन का संकेत है, इसलिए घरों में दाना-पानी रखकर और घोंसले बनाकर इनके प्रति स्नेह और जिम्मेदारी निभाएं।“

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