फ्लेमिंगो अंडों को बचाने के लिए बनाते हैं मिट्टी का घरौंदा

(सांभर झील में पहली बार सफल ब्रीडिंग के पुख्ता सबूत, 4 हजार से अधिक घरौंदे बने; मानवीय दखल से खतरे में प्रवासी पक्षियों का प्राकृतिक आवास) प्रकृति और वन्यजीव का अद्भुत नजारा से राजस्थान की सांभर झील लबरेज है। दूर-दराज के ठंडे प्रदेशों से हजारों किलोमीटर की यात्रा कर सैकड़ों प्रवासी फ्लेमिंगो (राजहंस) अपनी गुलाबी…

(सांभर झील में पहली बार सफल ब्रीडिंग के पुख्ता सबूत, 4 हजार से अधिक घरौंदे बने; मानवीय दखल से खतरे में प्रवासी पक्षियों का प्राकृतिक आवास)

प्रकृति और वन्यजीव का अद्भुत नजारा से राजस्थान की सांभर झील लबरेज है। दूर-दराज के ठंडे प्रदेशों से हजारों किलोमीटर की यात्रा कर सैकड़ों प्रवासी फ्लेमिंगो (राजहंस) अपनी गुलाबी आभा से सांभर झील को जीवंत बनाये हुए हैं । राजहंस के पहुंचने से इस खारे जलक्षेत्र की रौनक बढ़ गयी है। सांभर झील देश की सबसे बड़ी अंतर्देशीय खारे पानी की झील मानी जाती है। इस वजह से दूर-दूर तक पेड़-पौधे नजर नहीं आते, लेकिन फ्लेमिंगो के यहाँ आने और प्रजनन से पर्यावरण और पक्षी प्रेमियों के चेहरे खिल उठे हैं । जहाँ इनका झुण्ड खुले आसमान के नीचे छिछले पानी में मिट्टी के अनोखे घरौंदे बनाकर अपने अंडों को सुरक्षित रखते है। अद्भुत प्राकृतिक नजारा देखने को मिलता है ।
सांभर झील में पहली बार सफल ब्रीडिंग के प्रमाण
सांभर के पक्षी विशेषज्ञ गौरव दाधीच की माने तो, इस साल अगस्त में सांभर झील में फ्लेमिंगो की सफल ब्रीडिंग के पुख्ता सबूत मिले हैं। उनके मुताबिक, यहां करीब 300 चूजे निकले हैं। इसे राजस्थान में फ्लेमिंगो के संरक्षण और प्रजनन की दिशा में एक ऐतिहासिक उपलब्धि माना जा रहा है। अब तक देश में कच्छ के रण के सेना-संरक्षित क्षेत्र को फ्लेमिंगो की सफल ब्रीडिंग के प्रमुख स्थलों में गिना जाता रहा है।
चोंच से बनाते हैं शंकुनुमा घरौंदे


फ्लेमिंगो पेड़ों पर घोंसले नहीं बनाते। वे अपनी चोंच की मदद से झील की गीली, चिकनी मिट्टी को कुरेदकर पानी से घिरी सतह पर करीब 10 से 12 इंच ऊंचा शंकुनुमा घरौंदा तैयार करते हैं। इसकी ऊपरी सतह पर मादा अंडा देती है। घरौंदे की ऊंचाई अंडे को आसपास के पानी से बचाने में मदद करती है। अंडे की सुरक्षा और उसे गर्म रखने की जिम्मेदारी नर और मादा दोनों निभाते हैं। वे बारी-बारी से अंडे पर बैठते हैं और उसे अपने शरीर की गर्मी देते हैं। इस तरह खुले और पेड़विहीन इलाके में भी फ्लेमिंगो अपने अंडों के लिए सुरक्षित ठिकाना तैयार कर लेते हैं।
झील की सतह पर उभरी हजारों आकृतियां
मानसून के दौरान पानी घटने पर झील की सतह पर हजारों शंकुनुमा आकृतियां दिखाई देती हैं। पहली नजर में ये किसी कलाकार की बनाई कलाकृतियों जैसी लगती हैं, लेकिन वास्तव में ये फ्लेमिंगो के बनाए घरौंदे हैं। पक्षी विशेषज्ञ कहते हैं, वर्ष 2017 से ही सांभर झील में फ्लेमिंगो के घरौंदों और नेस्टिंग के अवशेष दिखाई दे रहे थे। हालांकि, इस साल पहली बार सफल ब्रीडिंग के पुख्ता प्रमाण मिले हैं। वर्ष 2025 में अच्छी बारिश के बाद 2026 में झील में पर्याप्त पानी रहने से फ्लेमिंगो को आबादी से दूर प्रजनन के लिए अनुकूल स्थान मिले। यहां 4 हजार से अधिक घरौंदे बनाए जाने की जानकारी सामने आई है। इनमें करीब 3,500 घरौंदे लेसर फ्लेमिंगो और 500 से अधिक ग्रेटर फ्लेमिंगो के बताए जा रहे हैं।
एक अंडे से उड़ान तक का सफर
फ्लेमिंगो की प्रजनन प्रक्रिया भी काफी दिलचस्प है। मादा आमतौर पर एक बार में एक ही अंडा देती है। लगभग 31 दिन बाद अंडे से चूजा बाहर आता है और दो से तीन दिन में चलने लगता है। करीब 70 दिन बाद वह उड़ान भरने में सक्षम होने लगता है। इसके बाद वयस्क फ्लेमिंगो चूजों को समूह में उड़ने का अभ्यास कराते हैं। बच्चों की सुरक्षा के लिए उन्हें मूल प्रजनन कॉलोनी से दूर एक अलग समूह में भी रखा जाता है, जिसे क्रेच कॉलोनी कहा जाता है। यहां कुछ वयस्क पक्षी उनकी देखभाल करते हैं, ताकि शिकारी जीवों से उन्हें बचाया जा सके।
4 हजार घरौंदे, लेकिन सफल ब्रीडिंग सिर्फ 300 चूजों की
फ्लेमिंगो के प्रजनन के अनुकूल परिस्थितियां बनने के बावजूद उनकी सुरक्षा को लेकर चिंता बनी हुई है। जानकर मानते हैं कि , 4 हजार से अधिक घरौंदे बनने के बावजूद करीब 300 चूजों का ही सफलतापूर्वक निकलना मानवीय दखल की गंभीर चुनौती की ओर संकेत करता है। नमक उत्पादन के लिए कथित अवैध बोरवेल, पाइपलाइन और बिजली के तारों का जाल फ्लेमिंगो के प्राकृतिक आवास को प्रभावित कर रहा है। फ्लेमिंगो संवेदनशील पक्षी हैं और प्रजनन के दौरान अपनी कॉलोनियों में मानवीय गतिविधियों को आसानी से स्वीकार नहीं करते। ऐसे में लगातार दखल से उनके प्रजनन स्थल उजड़ने का खतरा बना रहता है।
पर्यावरण प्रेमियों की मांग रही है कि सांभर झील के एक हिस्से को फ्लेमिंगो के लिए संरक्षित क्षेत्र घोषित किया जाए, ताकि प्रजनन के दौरान मानवीय गतिविधियों को नियंत्रित किया जा सके और पक्षियों को सुरक्षित वातावरण मिल सके। हालाँकि प्रवासी पक्षियों के आगमन का मौसम शुरू होते ही वन विभाग झील में निगरानी बढ़ा देती है। सांभर झील में फ्लेमिंगो की सफल ब्रीडिंग के प्रमाण जहां इस क्षेत्र की पारिस्थितिक महत्ता को रेखांकित करते हैं, वहीं यह उपलब्धि उनके प्राकृतिक आवास को सुरक्षित रखने की जरूरत भी बताती है। यदि झील के संवेदनशील हिस्सों में मानवीय दखल को नियंत्रित किया जाए, तो सांभर आने वाले वर्षों में फ्लेमिंगो के प्रजनन का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन सकती है।

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20 मार्च 2010 को जब विश्व गौरैया दिवस की शुरुआत हुई, तो मकसद साफ था—इस नन्हीं जान को लुप्त होने से बचाना। इस मुहिम को मजबूती देते हुए दिल्ली सरकार ने 15 अगस्त 2012 और बिहार सरकार ने 16 अप्रैल 2013 को गौरैया को अपना राजकीय पक्षी घोषित किया। तब से लेकर आज तक, सरकारी संस्थाओं और निजी संगठनों के साझा प्रयासों से गौरैया की ‘घर वापसी’ का अभियान निरंतर जारी है।

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