प्रकृति से एक बार जुड़कर तो देखिए…(1)

काठगोदाम से बिनसर तक का सफर: पहाड़, जंगल, पक्षियों का संगीत और पर्यावरण संरक्षण का संदेश संजय कुमार | उत्तराखंड प्रकृति से जुड़ना केवल पहाड़ों की सैर करना, खूबसूरत वादियों में तस्वीरें खिंचवाना या ठंडी हवा का आनंद लेना भर नहीं है। प्रकृति से जुड़ने का अर्थ है उसके करीब जाकर जीवन की वास्तविक सुंदरता…

काठगोदाम से बिनसर तक का सफर: पहाड़, जंगल, पक्षियों का संगीत और पर्यावरण संरक्षण का संदेश

संजय कुमार | उत्तराखंड

प्रकृति से जुड़ना केवल पहाड़ों की सैर करना, खूबसूरत वादियों में तस्वीरें खिंचवाना या ठंडी हवा का आनंद लेना भर नहीं है। प्रकृति से जुड़ने का अर्थ है उसके करीब जाकर जीवन की वास्तविक सुंदरता को महसूस करना, पेड़-पौधों, पक्षियों, वन्यजीवों और जलस्रोतों के महत्व को समझना और उनके संरक्षण की जिम्मेदारी स्वीकार करना। उत्तराखंड के कुमाऊँ क्षेत्र में काठगोदाम से अल्मोड़ा होते हुए बिनसर तक की यात्रा इसी अनुभव से रूबरू कराती है। यहां रास्ते में बिखरी हरियाली, घुमावदार पहाड़ी सड़कें, जंगलों की खामोशी, पक्षियों की मधुर आवाजें, स्थानीय संस्कृति और हिमालय की चोटियों के दर्शन मन को एक अलग ही दुनिया में ले जाते हैं।

यह सफर हमें बताता है कि प्रकृति के पास मनुष्य को देने के लिए कितना कुछ है। सवाल यह है कि बदले में हम प्रकृति को क्या दे रहे हैं? क्या हम उसकी सुंदरता का आनंद लेने के साथ उसे सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी भी निभा रहे हैं?

पहाड़ों का प्रवेश द्वार है काठगोदाम

हमारी यात्रा काठगोदाम रेलवे स्टेशन से शुरू हुई। मैदानी इलाकों से आने वाले यात्रियों के लिए यह स्टेशन कुमाऊँ की पहाड़ियों तक पहुंचने का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। यहां से नैनीताल, भीमताल, भवाली, अल्मोड़ा, बिनसर और आसपास के अन्य पर्यटन स्थलों के लिए सड़क मार्ग से आगे बढ़ा जाता है। अल्मोड़ा के लिए काठगोदाम निकटतम प्रमुख रेलवे स्टेशनों में से एक है।

रेल यात्रा के बाद जैसे ही हम स्टेशन से बाहर निकले, पहाड़ों की ओर जाने वाले रास्ते ने हमारा ध्यान खींच लिया। आगे का सफर सड़क मार्ग से तय करना था। हम सात लोग थे, इसलिए सभी ने मिलकर ट्रैवलर से यात्रा करने का निर्णय लिया।

पहाड़ों की ओर बढ़ते हुए धीरे-धीरे वातावरण में बदलाव महसूस होने लगा। सड़क के दोनों ओर पहाड़, कहीं घने पेड़, कहीं दूर तक फैली बस्तियां और कहीं घाटियों के बीच से गुजरते रास्ते दिखाई देने लगे। मैदानी इलाकों की भागदौड़ से निकलकर पहाड़ों की ओर बढ़ना अपने आप में एक अलग अनुभव है। यहां रास्ते की हर मोड़ पर दृश्य बदलता है और हर नया दृश्य अपने साथ एक नई कहानी लेकर आता है।

लेकिन पहाड़ों की सुंदरता केवल उनकी ऊंचाई या हरियाली में नहीं है। यहां की मिट्टी, जंगल, पानी, हवा और जैव विविधता मिलकर इस पूरे प्राकृतिक तंत्र को जीवन प्रदान करते हैं। पहाड़ों में यात्रा करते समय यह समझना जरूरी है कि यहां का पर्यावरण जितना सुंदर है, उतना ही संवेदनशील भी। ….जारी

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संयोजक

 हमारी गौरैया और इनवारमेंट वैरियर्स

Hamari Gauraiya and Environment Warriors

*सम्पादक -डॉ .लीना

*सहायक सम्पादक -निशांत रंजन

उद्देश्य

विश्व गौरैया दिवस: एक साझा संकल्प

20 मार्च 2010 को जब विश्व गौरैया दिवस की शुरुआत हुई, तो मकसद साफ था—इस नन्हीं जान को लुप्त होने से बचाना। इस मुहिम को मजबूती देते हुए दिल्ली सरकार ने 15 अगस्त 2012 और बिहार सरकार ने 16 अप्रैल 2013 को गौरैया को अपना राजकीय पक्षी घोषित किया। तब से लेकर आज तक, सरकारी संस्थाओं और निजी संगठनों के साझा प्रयासों से गौरैया की ‘घर वापसी’ का अभियान निरंतर जारी है।

घर-आँगन, खेत-खलिहान में चहकने-फुदकने वाली गौरैया की घटती संख्या को रोकना और उनकी आबादी को बढ़ाने के लिए एक सुरक्षित और अनुकूल वातावरण सुनिश्चित करना। उद्देश्य है सभी गौरैया संरक्षकों का …इसमें हमारी गौरैया और पर्यावरण योद्धा(Hamari Gauraiya and Environment Warriors) भी शामिल है।

प्रधानमंत्री द्वारा गौरैया को संरक्षित करने को लेकर ‘मन की बात’ में कई बार सन्देश दिया गया हैं :- “विश्व गौरैया दिवस (20 मार्च) पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नन्हीं गौरैया को हमारे पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए उनके संरक्षण पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि शहरीकरण और प्रदूषण के कारण घटती इनकी संख्या पर्यावरण असंतुलन का संकेत है, इसलिए घरों में दाना-पानी रखकर और घोंसले बनाकर इनके प्रति स्नेह और जिम्मेदारी निभाएं।“

हमारी पहल: पूर्णतः निस्वार्थ और जनहित में

यह वेबसाइट पूरी तरह से अवैतनिक,जनहित और सामाजिक सरोकार को समर्पित है। हमारा मंच किसी व्यक्ति या संगठन के लाभ के लिए नहीं, बल्कि केवल गौरैया और पर्यावरण संरक्षण की आवाज बनने के लिए है।

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सम्पादक : डॉ लीना, सहायक सम्पादक : निशांत रंजन