पेड़ों के अनमोल कलाकार गिब्बन को है संरक्षण की पुकार

24 अक्टूबर को मनाया जाता है ‘अंतर्राष्ट्रीय गिब्बन दिवस’ (International Gibbon Day) “जंगल की छतों पर झूलते, लंबी बांहों वाले और अपनी मोहक आवाज़ों से पूरे वन को गुंजायमान करने वाले गिब्बन हमारे पर्यावरण के अनमोल रत्न हैं।” 24 अक्टूबर को पूरे विश्व में ‘अंतर्राष्ट्रीय गिब्बन दिवस’ का आयोजन कर इसके संरक्षण को लेकर जागरूकता…

24 अक्टूबर को मनाया जाता है ‘अंतर्राष्ट्रीय गिब्बन दिवस’ (International Gibbon Day)

“जंगल की छतों पर झूलते, लंबी बांहों वाले और अपनी मोहक आवाज़ों से पूरे वन को गुंजायमान करने वाले गिब्बन हमारे पर्यावरण के अनमोल रत्न हैं।”

24 अक्टूबर को पूरे विश्व में ‘अंतर्राष्ट्रीय गिब्बन दिवस’ का आयोजन कर इसके संरक्षण को लेकर जागरूकता अभियान चलाया गया। इस वर्ष का थीम है :- The forest has a voice,can you hear it? यानि “जंगल की एक आवाज़ है, क्या आप इसे सुन सकते हैं? यों तो 2015 से हर साल, दुनिया भर में गिब्बन प्रेमी अपने पसंदीदा बंदरों के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए कार्यक्रम आयोजित करते हैं। यह संरक्षण में अधिक लोगों को शामिल करने, उन्हें यह सिखाने कि गिब्बन को जीवित रहने के लिए क्या चाहिए, और अगली पीढ़ी के गिब्बन वैज्ञानिकों को तैयार करने का एक शानदार अवसर है।  अंतर्राष्ट्रीय गिब्बन दिवस वास्तव में एक वैश्विक आयोजन है। अतीत में, ऐसे आयोजन उनके प्राकृतिक आवास वाले देशों के समुदायों, संग्रहालयों और फील्ड स्कूलों, चिड़ियाघरों और धर्मार्थ संस्थाओं द्वारा आयोजित किए जाते रहे हैं।

चीन में अब केवल 45 हेनान गिब्बन बचे हैं, जो इन्हें दुनिया का सबसे दुर्लभ प्राइमेट (वानर प्रजाति) बनाता है। स्थानीय लोगों के साथ मिलकर काम करने से

लेकर संरक्षण के लिए बिल्कुल नई तकनीक विकसित करने तक, हम दुनिया के इस सबसे दुर्लभ प्राइमेट को विलुप्त होने से बचाने के लिए काम कर रहे हैं।

प्रत्येक वर्ष 24 अक्टूबर को ‘अंतर्राष्ट्रीय गिब्बन दिवस’ (International Gibbon Day) के रूप में मनाया जाता है। इस दिवस को मनाने का मुख्य उद्देश्य दुनिया भर में गिब्बन (Gibbon) की विभिन्न प्रजातियों के बारे में जागरूकता फैलाना और उनके प्राकृतिक आवासों (वनों) को बचाने के लिए ठोस कदम उठाना है। गिब्बन, जिन्हें दुनिया के सबसे छोटे और सबसे फुर्तीले वानर (Apes) माना जाता है, आज गंभीर संकट के दौर से गुजर रहे हैं। @OfficialZSL

आज हम अपने कुछ सबसे कलाबाज और मुखर निवासियों का जश्न मना रहे हैं। टोयोटा एलिफेंट पैसेज पर आकर हमारे बेहद संकटग्रस्त सफेद गाल वाले गिब्बन विन्ह और संकटग्रस्त हल्के भूरे गाल वाले गिब्बन ब्रिस्को से मिलें। फिर प्राइमेट पैनोरमा पर जाकर हमारे संकटग्रस्त सियामांग जोड़े लियाम और लोला से मिलें।गिब्बन पृथ्वी पर सबसे अधिक संकटग्रस्त प्राइमेट्स में से हैं, जो आवास के नुकसान, शिकार और जंगली में अवैध शिकार के गंभीर दबाव का सामना कर रहे हैं। उनकी आवाज पेड़ों की चोटियों में गूंजती है और उष्णकटिबंधीय पारिस्थितिक तंत्र को स्वस्थ रखने में उनकी भूमिका अमूल्य है।हमें डीजेडसीए में इन चार अद्भुत जानवरों की देखभाल करने पर गर्व है। @DenverZoo

कौन हैं गिब्बन और इनकी क्या है विशेषता?

गिब्बन मुख्य रूप से एशिया के उष्णकटिबंधीय और उप-उष्णकटिबंधीय वर्षा वनों में पाए जाते हैं। ये असम, पूर्वोत्तर भारत, म्यांमार, थाईलैंड, कंबोडिया, लाओस, वियतनाम, चीन और इंडोनेशिया के जंगलों में निवास करते हैं। इनकी कई खास बातें इन्हें अन्य वानरों से अलग बनाती हैं:

  • वृक्षवासी जीवन शैली (Arboreal Life): गिब्बन अपना अधिकांश जीवन पेड़ों की ऊंची टहनियों पर ही बिताते हैं। वे जमीन पर बहुत कम उतरते हैं।
  • ब्रेचिएशन (Brachiation): पेड़ों की एक डाल से दूसरी डाल पर अपनी लंबी बांहों के सहारे झूलते हुए तेजी से आगे बढ़ने की उनकी कला को ‘ब्रेचिएशन’ कहा जाता है। वे एक छलांग में 15 फीट तक की दूरी तय कर सकते हैं।
  • संगीतनुमा पुकार (Vocalizations): गिब्बन अपनी मधुर और गूंजने वाली आवाज़ों के लिए जाने जाते हैं। जोड़े मिलकर एक संगीतमय धुन गाते हैं, जो कई किलोमीटर दूर तक सुनाई देती है और उनके क्षेत्र (Territory) को निर्धारित करती है।

हमारे देश भारत के गिब्बन: हुलॉक गिब्बन

भारत के लिए यह गर्व की बात है कि यहाँ इकलौती गिब्बन प्रजाति ‘हुलॉक गिब्बन‘ (Hoolock Gibbon) पाई जाती है। मुख्य रूप से पूर्वोत्तर भारत के राज्यों (जैसे असम, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, नागालैंड, मणिपुर, मिजोरम और त्रिपुरा) के घने जंगलों में इनकी उपस्थिति दर्ज की जाती है।

पूर्वोत्तर के स्थानीय समुदायों, विशेषकर नगालैंड और असम की जनजातियों के साथ इनका गहरा सांस्कृतिक जुड़ाव रहा है। हालांकि, आज भारत में भी इनके अस्तित्व पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं।

गिब्बन प्रजातियों के सामने मौजूद गंभीर खतरे

आज गिब्बन दुनिया के सबसे संकटग्रस्त प्राइमेट्स (Primates) में शामिल हैं। आईयूसीएन (IUCN) की रेड लिस्ट में इनकी अधिकांश प्रजातियों को ‘लुप्तप्राय’ (Endangered) या ‘गंभीर रूप से संकटग्रस्त’ (Critically Endangered) घोषित किया गया है। इसके प्रमुख कारण हैं:

  1. वनों की कटाई (Deforestation): कृषि विस्तार, अवैध लकड़ियों की कटाई, पाम ऑयल के बागान और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं (सड़कें, बांध) के कारण उनके प्राकृतिक आवास लगातार सिमट रहे हैं।
  2. अवैध शिकार और व्यापार (Poaching and Illegal Trade): मांस के लिए और पाले जाने वाले पालतू जानवर के रूप में अवैध रूप से इनका शिकार किया जाता है। कई बार तस्कर मां गिब्बन को मारकर उनके बच्चों को पकड़ लेते हैं।
  3. खंडित वन क्षेत्र (Habitat Fragmentation): जंगलों के बीच सड़कें या बस्तियां बन जाने से गिब्बन अलग-थलग पड़ जाते हैं, जिससे उनके बीच आनुवंशिक विविधता (Genetic Diversity) कम हो जाती है।

संरक्षण की दिशा में हमारी जिम्मेदारी

गिब्बन केवल एक खूबसूरत वन्यजीव नहीं हैं, बल्कि वे ‘वन के माली‘ (Gardeners of the Forest) भी हैं। वे फलों को खाकर उनके बीजों को दूर-दूर तक फैलाते हैं, जिससे नए पौधों और पेड़ों का जन्म होता है और वर्षा वनों का पारिस्थितिक संतुलन बना रहता है।

अंतर्राष्ट्रीय गिब्बन दिवस हमें यह याद दिलाता है कि यदि हमने समय रहते कदम नहीं उठाए, तो प्रकृति का यह संगीत हमेशा के लिए खामोश हो सकता है।

  • कड़े कानून और उनका सख्ती से पालन: अवैध शिकार और वन्यजीवों के व्यापार पर पूरी तरह रोक लगनी चाहिए।
  • वनों का संरक्षण: पेड़ों की अंधाधुंध कटाई को रोककर उनके प्राकृतिक आवासों को बहाल करने की आवश्यकता है।
  • जन-जागरूकता: स्थानीय समुदायों और युवाओं को वन्यजीव संरक्षण के प्रति जागरूक करना बेहद जरूरी है।

प्रकृति ने हमें जो धरोहर सौंपी है, उसकी रक्षा करना हमारा नैतिक कर्तव्य है। आइए, इस अंतर्राष्ट्रीय गिब्बन दिवस पर यह संकल्प लें कि हम गिब्बन और उनके आवासों को बचाने के लिए अपनी आवाज उठाएंगे, ताकि इन शांत और खूबसूरत जीवों की गूंज हमेशा हमारे जंगलों में सुनाई देती रहे।

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संयोजक

 हमारी गौरैया और इनवारमेंट वैरियर्स

Hamari Gauraiya and Environment Warriors

*सम्पादक -डॉ .लीना

*सहायक सम्पादक -निशांत रंजन

उद्देश्य

विश्व गौरैया दिवस: एक साझा संकल्प

20 मार्च 2010 को जब विश्व गौरैया दिवस की शुरुआत हुई, तो मकसद साफ था—इस नन्हीं जान को लुप्त होने से बचाना। इस मुहिम को मजबूती देते हुए दिल्ली सरकार ने 15 अगस्त 2012 और बिहार सरकार ने 16 अप्रैल 2013 को गौरैया को अपना राजकीय पक्षी घोषित किया। तब से लेकर आज तक, सरकारी संस्थाओं और निजी संगठनों के साझा प्रयासों से गौरैया की ‘घर वापसी’ का अभियान निरंतर जारी है।

घर-आँगन, खेत-खलिहान में चहकने-फुदकने वाली गौरैया की घटती संख्या को रोकना और उनकी आबादी को बढ़ाने के लिए एक सुरक्षित और अनुकूल वातावरण सुनिश्चित करना। उद्देश्य है सभी गौरैया संरक्षकों का …इसमें हमारी गौरैया और पर्यावरण योद्धा(Hamari Gauraiya and Environment Warriors) भी शामिल है।

प्रधानमंत्री द्वारा गौरैया को संरक्षित करने को लेकर ‘मन की बात’ में कई बार सन्देश दिया गया हैं :- “विश्व गौरैया दिवस (20 मार्च) पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नन्हीं गौरैया को हमारे पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए उनके संरक्षण पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि शहरीकरण और प्रदूषण के कारण घटती इनकी संख्या पर्यावरण असंतुलन का संकेत है, इसलिए घरों में दाना-पानी रखकर और घोंसले बनाकर इनके प्रति स्नेह और जिम्मेदारी निभाएं।“

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