प्रकृति से एक बार जुड़कर तो देखिए…(2)

नरीमन चौक पर लोकसंस्कृति की झलक……… छलिया नृत्य की कलाकृति में दिखाई देती है कुमाऊँ की सांस्कृतिक पहचान संजय कुमार / काठगोदाम से आगे बढ़ने पर नरीमन चौक (नरीमन चौक- जिसे नरीमन चौराहा या काठगोदाम सर्कल के नाम से भी जाना जाता है) के पास उत्तराखंड की लोकसंस्कृति को दर्शाती छलिया नृत्य की कलाकृति दिखाई…

नरीमन चौक पर लोकसंस्कृति की झलक……… छलिया नृत्य की कलाकृति में दिखाई देती है कुमाऊँ की सांस्कृतिक पहचान

संजय कुमार / काठगोदाम से आगे बढ़ने पर नरीमन चौक (नरीमन चौक- जिसे नरीमन चौराहा या काठगोदाम सर्कल के नाम से भी जाना जाता है) के पास उत्तराखंड की लोकसंस्कृति को दर्शाती छलिया नृत्य की कलाकृति दिखाई देती है। तलवार और ढाल के साथ पारंपरिक अंदाज में प्रस्तुत यह कलाकृति पहाड़ की उस सांस्कृतिक विरासत से हमारा परिचय कराती है, जिसमें इतिहास, शौर्य, संगीत और लोकजीवन का सुंदर मेल दिखाई देता है।

उत्तराखंड की पहचान केवल ऊंचे पहाड़ों, हरे-भरे जंगलों, नदियों और खूबसूरत घाटियों तक सीमित नहीं है। यहां की लोकभाषाएं, लोकगीत, पारंपरिक नृत्य, खानपान, पहनावा और रीति-रिवाज भी इस क्षेत्र की विशिष्ट पहचान हैं। नरीमन चौक पर लगी यह कलाकृति राहगीरों और पर्यटकों को इसी समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा की याद दिलाती है।

छलिया नृत्य: कुमाऊँ की शौर्य परंपरा

छलिया, जिसे कई जगह छलिया नृत्य भी कहा जाता है, कुमाऊँ क्षेत्र का प्रसिद्ध पारंपरिक लोकनृत्य है। इसे तलवार और ढाल के साथ किए जाने वाले नृत्य के रूप में भी जाना जाता है। इसकी जड़ें कुमाऊँ की पुरानी युद्धक परंपराओं से जुड़ी मानी जाती हैं। परंपरागत रूप से विवाह की बारात में इस नृत्य दल को विशेष स्थान मिलता रहा है। आज यह विवाह समारोहों के अलावा सांस्कृतिक आयोजनों और विभिन्न उत्सवों में भी प्रस्तुत किया जाता है।

इस नृत्य में कलाकार तलवार और ढाल लेकर जोशपूर्ण मुद्राओं, तेज कदमों, छलांगों और आपसी तालमेल के साथ युद्धाभ्यास जैसी आकृतियां बनाते हैं। उनकी गतिविधियों में आक्रमण और बचाव का सांकेतिक प्रदर्शन दिखाई देता है। नृत्य की विशेषता यह है कि इसमें शारीरिक कौशल के साथ लय, अनुशासन और सामूहिक तालमेल का भी महत्वपूर्ण स्थान है।

ढोल-दमाऊ की थाप और पारंपरिक वेशभूषा

छलिया नृत्य का आकर्षण केवल तलवार और ढाल तक सीमित नहीं है। ढोल और दमाऊ की गूंजती थाप के साथ रणसिंघा और तुरही जैसे पारंपरिक वाद्ययंत्र भी इसकी प्रस्तुति को प्रभावशाली बनाते हैं। इन वाद्ययंत्रों की आवाज वातावरण में उत्साह और वीर रस का संचार करती है।

कलाकार पारंपरिक परिधान और सिर पर पगड़ी धारण कर अपनी प्रस्तुति को जीवंत बनाते हैं। तलवारों की गति, ढाल से बचाव की मुद्राएं और वाद्ययंत्रों की लय मिलकर ऐसा दृश्य रचते हैं, जो दर्शकों को कुमाऊँ की पुरानी सांस्कृतिक परंपराओं की याद दिलाता है।

छलिया नृत्य की लोकप्रियता विशेष रूप से अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, चंपावत और बागेश्वर जैसे कुमाऊँ के क्षेत्रों में रही है। समय के साथ यह लोककला उत्तराखंड के अन्य हिस्सों और शहरों के सांस्कृतिक मंचों तक भी पहुंची है।

लोककला में छिपी है क्षेत्र की ऐतिहासिक स्मृति

लोकनृत्य किसी समाज के मनोरंजन का साधन भर नहीं होते। वे उस समाज के इतिहास, विश्वास, सामाजिक संबंधों और जीवनशैली को भी अपने भीतर समेटे रहते हैं। छलिया नृत्य में दिखाई देने वाली युद्धक मुद्राएं कुमाऊँ की शौर्य परंपरा की स्मृति को जीवित रखती हैं, जबकि विवाह और मांगलिक अवसरों पर इसकी प्रस्तुति सामाजिक उत्सवों के साथ इसके जुड़ाव को दर्शाती है।

पीढ़ी-दर-पीढ़ी कलाकारों ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया है। उनके अभ्यास, वाद्ययंत्रों की जानकारी, पारंपरिक पहनावे और प्रस्तुति की शैली के माध्यम से लोकसंस्कृति का ज्ञान अगली पीढ़ियों तक पहुंचता है। इसलिए इस कला को सुरक्षित रखना केवल नृत्य की एक विधा को बचाना नहीं, बल्कि क्षेत्र की सांस्कृतिक स्मृति को संरक्षित करना भी है।

प्रकृति और लोकजीवन का गहरा संबंध

उत्तराखंड की संस्कृति को समझने के लिए यहां के प्राकृतिक परिवेश को समझना भी जरूरी है। पहाड़ी गांवों में जंगल, जलस्रोत, खेत, पशुपालन और मौसमी बदलाव लंबे समय से जीवन का हिस्सा रहे हैं। स्थानीय लोगों ने अपने अनुभवों, गीतों, त्योहारों और परंपराओं में प्रकृति के साथ अपने संबंधों को अभिव्यक्त किया है।

जंगलों से मिलने वाली लकड़ी, चारा और अनेक उपयोगी वनस्पतियां ग्रामीण जीवन में महत्वपूर्ण रही हैं। पारंपरिक जलस्रोत और खेती भी गांवों की आजीविका के आधार रहे हैं। हालांकि, बदलती जीवनशैली, पलायन, प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ते दबाव और पर्यटन के विस्तार के बीच इन परंपराओं तथा प्रकृति से जुड़े ज्ञान को अगली पीढ़ी तक पहुंचाना एक महत्वपूर्ण चुनौती है।

पर्यटन के साथ संस्कृति का संरक्षण भी जरूरी

काठगोदाम और हल्द्वानी से पहाड़ों की ओर जाने वाले मार्गों पर ऐसी कलाकृतियां पर्यटन को एक सांस्कृतिक आयाम देती हैं। आमतौर पर यात्री पहाड़ों की सुंदरता, ठंडी हवा और प्राकृतिक दृश्यों को देखने के लिए निकलते हैं, लेकिन रास्ते में दिखाई देने वाले सांस्कृतिक प्रतीक उन्हें उस क्षेत्र की परंपराओं से भी जोड़ते हैं।

यदि इन कलाकृतियों के पास लोकनृत्य का संक्षिप्त परिचय, उसके इतिहास और पारंपरिक वाद्ययंत्रों की जानकारी देने वाले सूचना-पट्ट लगाए जाएं, तो पर्यटकों और नई पीढ़ी को इस विरासत के बारे में और बेहतर जानकारी मिल सकती है। स्थानीय कलाकारों को सांस्कृतिक कार्यक्रमों में अवसर देना और उनके कौशल को सम्मानित करना भी लोककला के संरक्षण में मददगार हो सकता है।

नरीमन चौक पर छलिया नृत्य की कलाकृति इसी बात का प्रतीक है कि किसी क्षेत्र की असली पहचान उसके प्राकृतिक सौंदर्य और सांस्कृतिक विरासत, दोनों से मिलकर बनती है। पहाड़ों की यात्रा तभी अधिक अर्थपूर्ण होती है, जब हम वहां के दृश्य देखने के साथ-साथ वहां के लोगों की परंपराओं, जीवनशैली और प्रकृति के साथ उनके संबंधों को भी समझने का प्रयास करें।……जारी

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संयोजक

 हमारी गौरैया और इनवारमेंट वैरियर्स

Hamari Gauraiya and Environment Warriors

*सम्पादक -डॉ .लीना

*सहायक सम्पादक -निशांत रंजन

उद्देश्य

विश्व गौरैया दिवस: एक साझा संकल्प

20 मार्च 2010 को जब विश्व गौरैया दिवस की शुरुआत हुई, तो मकसद साफ था—इस नन्हीं जान को लुप्त होने से बचाना। इस मुहिम को मजबूती देते हुए दिल्ली सरकार ने 15 अगस्त 2012 और बिहार सरकार ने 16 अप्रैल 2013 को गौरैया को अपना राजकीय पक्षी घोषित किया। तब से लेकर आज तक, सरकारी संस्थाओं और निजी संगठनों के साझा प्रयासों से गौरैया की ‘घर वापसी’ का अभियान निरंतर जारी है।

घर-आँगन, खेत-खलिहान में चहकने-फुदकने वाली गौरैया की घटती संख्या को रोकना और उनकी आबादी को बढ़ाने के लिए एक सुरक्षित और अनुकूल वातावरण सुनिश्चित करना। उद्देश्य है सभी गौरैया संरक्षकों का …इसमें हमारी गौरैया और पर्यावरण योद्धा(Hamari Gauraiya and Environment Warriors) भी शामिल है।

प्रधानमंत्री द्वारा गौरैया को संरक्षित करने को लेकर ‘मन की बात’ में कई बार सन्देश दिया गया हैं :- “विश्व गौरैया दिवस (20 मार्च) पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नन्हीं गौरैया को हमारे पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए उनके संरक्षण पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि शहरीकरण और प्रदूषण के कारण घटती इनकी संख्या पर्यावरण असंतुलन का संकेत है, इसलिए घरों में दाना-पानी रखकर और घोंसले बनाकर इनके प्रति स्नेह और जिम्मेदारी निभाएं।“

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