संजय कुमार/ घटना उत्तर प्रदेश के भगौतीगंज स्थित के एक स्कूल की है जहाँ पढ़ने वाली कक्षा दो की एक छात्रा 22 सितंबर को उस समय कक्षा में गिर गई, जब स्कूल के पास से गुजर रहे जुलूस में तेज आवाज में लाउडस्पीकर/डीजे बजाया जा रहा था। छात्रा को उपचार के लिए अस्पताल ले जाया गया, लेकिन उसे बचाया नहीं जा सका। हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने घटना का स्वतः संज्ञान लिया। न्यायालय ने ध्वनि प्रदूषण की बढ़ती समस्या और उससे जुड़े कानूनी प्रावधानों के पालन की स्थिति की जांच के लिए अलग से जनहित याचिका दर्ज करने का निर्देश दिया है। खंडपीठ ने चिंता जताई कि ध्वनि प्रदूषण को नियंत्रित करने के स्पष्ट कानून होने के बावजूद यह समस्या गंभीर रूप लेती जा रही है और नियमों के उल्लंघन की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं। ऐसे में यह देखना जरूरी है कि इस समस्या पर रोक लगाने की जिम्मेदारी किसकी है और इसके लिए क्या प्रभावी कदम उठाए जा रहे हैं।
दिल को दहलाने वाले डीजे या लाउडस्पीकर से बच्ची की मौत ध्वनि प्रदूषण को नियंत्रित करने के वाले कानून पर तमाचा है। देखें तो शहरों और गांवों में उत्सव, शादी-विवाह, धार्मिक आयोजनों और दूसरे आयोजनों में अक्सर तेज संगीत के साथ डीजे बजते हैं। खुशी के इन अवसरों पर बढ़ता शोर यानि ध्वनि प्रदूषण अब केवल असुविधा का कारण नहीं रह गया है, बल्कि लोगों के स्वास्थ्य और जीवन के लिए गंभीर खतरा बनता जा रहा है। हाल ही में डीजे के तेज शोर के बीच एक बच्ची की मौत की खबर ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर मनोरंजन और उत्सव के नाम पर हम कब तक ध्वनि प्रदूषण को स्वीकार करते रहेंगे?
आवाज़ को एक सुरक्षित सीमा-क्षेत्रवार ध्वनि सीमा (डेसिबल में)
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, 70 से 85 डेसिबल तक की आवाज़ को एक सुरक्षित सीमा माना जाता है। 85 डेसिबल से अधिक की तेज़ आवाज़ में लगातार रहने पर सुनने की क्षमता कम हो सकती है।
क्षेत्रवार ध्वनि सीमा (डेसिबल में)
साइलेंस जोन (अस्पताल, स्कूल के आसपास 100 मीटर का दायरा): दिन में अधिकतम 50 डेसिबल और रात में 40 डेसिबल।
रिहायशी क्षेत्र (आवासीय इलाका): दिन में अधिकतम 55 डेसिबल और रात में 45 डेसिबल।
कमर्शियल क्षेत्र (व्यापारिक इलाका): दिन में अधिकतम 65 डेसिबल और रात में 55 डेसिबल।
औद्योगिक क्षेत्र: दिन में अधिकतम 75 डेसिबल और रात में 70डेसिबल।
लेकिन कोई भी डीजे इसका पालन नहीं करता है
यह सच है कि ध्वनि-संगीत मानव जीवन का हिस्सा है, लेकिन जब ध्वनि अपनी निर्धारित और सहनीय सीमा से अधिक हो जाए तो वह खतरनाक होते हुए प्रदूषण का रूप ले लेती है। इसका असर केवल कानों पर ही नहीं पड़ता, बल्कि शरीर और मन के कई हिस्से इससे प्रभावित होते हैं। डीजे अपनी सीमा को तोड़ते हुए तेज शोर से आसपास भयानक कंपन उत्पन्न करता है। जो खतरनाक है और जान लेवा है, साथ ही तेज आवाज के लगातार संपर्क में रहने से सुनने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी अत्यधिक शोर को स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण पर्यावरणीय जोखिमों में शामिल किया है। ध्वनि प्रदूषण का प्रभाव इससे कहीं व्यापक है। लगातार तेज आवाज तनाव, चिड़चिड़ापन, बेचैनी और नींद की समस्या बढ़ा सकती है। रात के समय तेज आवाज नींद के प्राकृतिक चक्र को प्रभावित करती है। नींद पूरी नहीं होने का असर अगले दिन की कार्यक्षमता, एकाग्रता और मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ सकता है। तेज आवाज का प्रभाव हर व्यक्ति पर समान नहीं होता। छोटे बच्चे, बुजुर्ग, गर्भवती महिलाएं और गंभीर बीमारी से जूझ रहे लोग तेज शोर के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं। अस्पतालों, स्कूलों और आवासीय क्षेत्रों के आसपास अत्यधिक तेज ध्वनि विशेष रूप से परेशानी पैदा करती है। किसी बीमार व्यक्ति के लिए अचानक पैदा होने वाला तेज शोर तनाव और बेचैनी बढ़ाता है। इसलिए सार्वजनिक आयोजनों में यह समझना जरूरी है कि हमारे मनोरंजन का तरीका किसी दूसरे व्यक्ति के लिए शारीरिक परेशानी या मानसिक तनाव का कारण न बन जाए। कभी –कभी तो शोर कई दिनों तक लगातार चलता है। शादी-विवाह, जुलूस, धार्मिक कार्यक्रम और दूसरे सामाजिक आयोजनों में डीजे की आवाज कई बार इतनी तेज कर दी जाती है कि आसपास के घरों की खिड़कियां और दरवाजे तक कंपन करने लगते हैं। रोक के बावजूद कई स्थानों पर देर रात तक तेज संगीत बजाया जाता है। समस्या केवल आवाज की तीव्रता की ही नहीं है। बल्कि तेज आवाज के साथ लंबे समय तक रहने और अचानक बहुत ऊंची ध्वनि पैदा होने से खतरा बढ़ जाता है।
भारत में ध्वनि प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए ध्वनि प्रदूषण (विनियमन और नियंत्रण) नियम, 2000 लागू हैं। इन नियमों में औद्योगिक, वाणिज्यिक, आवासीय और शांत क्षेत्र के लिए अलग-अलग ध्वनि सीमाएं निर्धारित की गई हैं। रात के समय ध्वनि नियंत्रण के लिए भी विशेष प्रावधान हैं। कहीं-कहीं पर रात्रि 11 बजे के बाद डीजे आदि तेज आवाज पर प्रतिबन्ध है,फिर भी बजाये जाते हैं। शांत क्षेत्रों में अस्पताल, शैक्षणिक संस्थानों और न्यायालयों के आसपास विशेष सावधानी बरतनी चाहिए है। इसके बावजूद नियमों का उल्लंघन देखने को मिलता है। सवाल यह है कि जब नियम मौजूद हैं तो उनका प्रभावी पालन क्यों नहीं हो रहा?
खुशी मनाना और सामाजिक-सांस्कृतिक आयोजन हमारी जिंदगी का हिस्सा हैं। संगीत भी जीवन में आनंद और ऊर्जा भरता है। समस्या संगीत या उत्सव से नहीं, बल्कि उसकी सीमा पार कर देने से है। हमें यह समझना होगा कि सार्वजनिक स्थान पर बजने वाला डीजे केवल उसे बजाने वाले व्यक्ति की आवाज नहीं है। उसकी आवाज आसपास रहने वाले हर व्यक्ति तक पहुंचती है। इसलिए सार्वजनिक आयोजन में ध्वनि की तीव्रता और समय दोनों का ध्यान रखना सामाजिक जिम्मेदारी भी है।
वहीँ, ध्वनि प्रदूषण पर नियंत्रण केवल प्रशासन या पुलिस की जिम्मेदारी नहीं है। आयोजकों, डीजे संचालकों और आम नागरिकों को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। प्रशासन को निर्धारित ध्वनि सीमा और समय संबंधी नियमों का प्रभावी पालन सुनिश्चित करना चाहिए। शिकायत मिलने पर त्वरित कार्रवाई होनी चाहिए और बार-बार नियम तोड़ने वालों पर नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए। वहीं समाज को भी यह तय करना होगा कि खुशी का अर्थ तेज आवाज नहीं है।
हम अक्सर पर्यावरण संरक्षण की चर्चा करते समय वायु, जल, जंगल और वन्यजीवों की बात करते हैं, लेकिन ध्वनि भी हमारे पर्यावरण का महत्वपूर्ण हिस्सा है। स्वच्छ और स्वस्थ वातावरण का अर्थ केवल साफ हवा और साफ पानी नहीं, बल्कि ऐसा परिवेश भी है जहां इंसान कुछ समय शांति से सांस ले सके और सो सके। डीजे की तेज आवाज से बच्ची की मौत की घटनाएं समाज को यह सोचने का अवसर जरूर देती हैं कि क्या कुछ घंटों का तेज मनोरंजन हमारे लिए इतना जरूरी है? ध्वनि प्रदूषण पर नियंत्रण केवल कानून का विषय नहीं, बल्कि संवेदनशील और जिम्मेदार समाज की पहचान भी है।














