कहां ‘भंवरा’ बन गया है करोड़ों के कारोबार का सूत्रधार..!!

“सिक्किम में बड़ी इलायची के खेत कई बार खेत कम और जंगल का हिस्सा ज्यादा लगते हैं। बड़ी इलायची यहां केवल कृषि की कहानी नहीं, जैव-विविधता और आजीविका के रिश्ते की कहानी भी है।” संजीव शर्मा / गीतकार आनंद बख्शी, संगीतकार हेमंत कुमार और गायक मोहम्मद रफी और आशा भोंसले की टीम जब फिल्म ‘आराधना’…

“सिक्किम में बड़ी इलायची के खेत कई बार खेत कम और जंगल का हिस्सा ज्यादा लगते हैं। बड़ी इलायची यहां केवल कृषि की कहानी नहीं, जैव-विविधता और आजीविका के रिश्ते की कहानी भी है।”

संजीव शर्मा / गीतकार आनंद बख्शी, संगीतकार हेमंत कुमार और गायक मोहम्मद रफी और आशा भोंसले की टीम जब फिल्म ‘आराधना’ के लिए ‘गुनगुना रहे हैं भंवरे, खिल रही है कली कली..’ या फिर फिल्म ‘साहिब बीबी और गुलाम’ के लिए ‘भंवरा बड़ा नादान है, कलियन की मुस्कान है..’ रचते समय गीतकार शकील बदायूंनी, गायिका आशा जी और संगीतकार हेमंत कुमार ने कभी सोचा भी नहीं होगा उनके कालजयी गीत का एक किरदार कभी हकीकत भी बन जाएगा और सैकड़ों परिवारों की माली हालत बेहतर बनाने के साथ साथ पूरे इलाके में सुगंध बिखेरने का जरिया बन जाएंगे।

यह कोई कपोल कल्पना नहीं बल्कि सच्चाई है कि इन गानों को वास्तविकता में तब्दील करते हुए भँवरे ने ऐसा जादू बिखेरा है कि कली कली खिल रही है और मुस्कराकर अपनी खुशबू से देश ही नहीं विदेशों तक में जलवा दिखा रही है। दरअसल, हम बात कर रहे हैं सिक्किम में भरपूर मात्रा में होने वाली बड़ी इलायची की खेती और इसमें भंवरे की महत्वपूर्ण भूमिका की। 

यहां भंवरा या भौंरा बड़ी इलायची की कहानी का एक बेहद महत्वपूर्ण किरदार है। भारत में सिक्किम बड़ी या काली इलायची का गढ़ है और देश में इसका 80 फीसदी उत्पादन इसी राज्य में होता है एवं वह भी जैविक क्योंकि सिक्किम देश का पहला सौ फीसद ऑर्गेनिक स्टेट है। यहां करीब साढ़े पांच हज़ार मीट्रिक टन बड़ी इलायची होती है। उत्तरी सिक्किम से शुरू हुई इस काली बड़ी ‘ठूलो इलायची’ (स्थानीय भाषा में) की यात्रा अब 23 हजार हेक्टेयर तक पहुंच गई है।

अब बात भंवरे की, तो सिक्किम कृषि विभाग के अनुसार बड़ी इलायची में पॉलीनेशन मुख्य रूप से भौंरों द्वारा ही होता है। इसे नेपाली भाषा में भोमोरा, भूटिया में बूम बूमटा और लेपचा भाषा में तुंगबूम कहा जाता है। बताया जाता है कि फूलों से रस लेने के लिए जब भौंरा इन तक पहुंचता है तो उसके शरीर पर नर मादा परागकण चिपक जाते हैं और दूसरे फूल तक पहुंच जाते हैं। इस तरह फूल से फल बनने की इस प्राकृतिक प्रक्रिया में भंवरे की भूमिका बहुत बड़ी है। यहां भंवरा किसान का एक ऐसा साथी है, जिसे न मजदूरी चाहिए और न ही छुट्टी।

मजे की बात यह है कि, भंवरे की तरह मधुमक्खी सहित कई कीट बड़ी इलायची के फूलों का रसपान करने के लिए आते हैं लेकिन इसके फूलों में अंतर और अपने छोटे आकार की वजह से वे पराग कण की सफल आवाजाही का हिस्सा नहीं बन पाते और इस वजह से उत्पादन उम्मीद के मुताबिक नहीं हो पाता। भंवरे का आकार नर मादा पराग कण को मिलाने के लिए बिल्कुल सटीक है।

सिक्किम की तर्ज पर एवं यहां से मिलती जुलती परिस्थितियों वाले कुछ अन्य राज्यों में भी बड़ी इलायची की खेती के प्रयास हुए हैं लेकिन सब कुछ अनुकूल होने के बाद भी उत्पादन मन मुताबिक नहीं हुआ। बाद में, कृषि अनुसंधान से पता चला कि वहां परागकण का वाहक भंवरा नहीं था या कम संख्या में था। वैसे, अब अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड और पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग में भंवरों की मौजूदगी से इसकी खेती को सफलता मिल रही है जबकि कुछ राज्यों में भंवरों की कमी से खेती सफल नहीं हुई।

शायद यह जानकर आपको भी आश्चर्य होगा कि भारत में बड़ी इलायची मानव जाति द्वारा उपयोग किए जाने वाले सबसे पुराने मसालों में से एक मानी जाती है। इसका उपयोग आयुर्वेदिक औषधियों में छठी शताब्दी में सुश्रुत के समय से ही होता आ रहा है। इसका उपयोग यूनानी औषधियों में भी  प्राचीन समय से किया जाता रहा है।

वैसे,बड़ी इलायची सिक्किम के लिए सिर्फ मसाला नहीं है। यह राज्य की प्रमुख नकदी फसलों में से एक है और 16 हजार से अधिक किसान परिवारों की आजीविका से जुड़ी हुई है। सरकार ने भी इसे राज्य की कृषि अर्थव्यवस्था और ग्रामीण जीवन का महत्वपूर्ण आधार बताया है। इस फसल की खासियत यह है कि इसे खुले मैदान की तेज धूप की बजाय पेड़ों की छांव और पहाड़ी वातावरण पसंद है। इसलिए सिक्किम में बड़ी इलायची के खेत कई बार खेत कम और जंगल का हिस्सा ज्यादा लगते हैं। बड़ी इलायची यहां केवल कृषि की कहानी नहीं, जैव-विविधता और आजीविका के रिश्ते की कहानी भी है।

सिक्किम की पहाड़ियों में पैदा हुई यह सुगंध देश की सीमाओं पर नहीं रुकती बल्कि अन्य देशों को भी अपनी सुगंध से सराबोर कर देती है। भारत बड़ी इलायची का निर्यात संयुक्त अरब अमीरात, अमेरिका, सऊदी अरब, जापान, ब्रिटेन सहित कई देशों को करता है। मसाला बोर्ड के अनुसार वित्त वर्ष 2024-25 में भारत ने लगभग 229 करोड़  रुपए से अधिक की बड़ी इलायची दुनिया को बेची। तो देखिए, कैसे एक भंवरा करोड़ों के कारोबार का जरिया बन गया वह भी चुपके चुपके।(साभार – https://jugaali.blogspot.com/2026/09/blog-post_28.html)

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