हिंदूकुश हिमालय में फैल रहा सूक्ष्म प्लास्टिक प्रदूषण: जीवन- जल सुरक्षा पर बढ़ा खतरा

अरुणाचल प्रदेश। दुनिया के सबसे दुर्गम और संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्रों में शामिल हिंदूकुश हिमालय अब प्लास्टिक प्रदूषण की चपेट में है। बर्फ से ढकी ऊंची चोटियों, ग्लेशियरों, नदियों, झीलों और पर्वतीय मिट्टी में सूक्ष्म प्लास्टिक की मौजूदगी इस बात का संकेत है कि प्लास्टिक प्रदूषण अब केवल शहरों, औद्योगिक क्षेत्रों और समुद्रों तक सीमित नहीं…

अरुणाचल प्रदेश। दुनिया के सबसे दुर्गम और संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्रों में शामिल हिंदूकुश हिमालय अब प्लास्टिक प्रदूषण की चपेट में है। बर्फ से ढकी ऊंची चोटियों, ग्लेशियरों, नदियों, झीलों और पर्वतीय मिट्टी में सूक्ष्म प्लास्टिक की मौजूदगी इस बात का संकेत है कि प्लास्टिक प्रदूषण अब केवल शहरों, औद्योगिक क्षेत्रों और समुद्रों तक सीमित नहीं रहा। यह दुनिया के ऊंचे और अपेक्षाकृत दूरस्थ पारिस्थितिकी तंत्रों तक भी पहुंच चुका है।

एक नए अध्ययन में 562 प्रकाशित अध्ययनों से प्राप्त साक्ष्यों का विश्लेषण करते हुए हिंदूकुश हिमालय में सूक्ष्म प्लास्टिक के फैलाव, उसके स्रोत और पर्वतीय पारिस्थितिकी पर संभावित प्रभावों को समझने का प्रयास किया गया है। अध्ययन के अनुसार, पांच मिलीमीटर से छोटे प्लास्टिक कण निचले मैदानी क्षेत्रों से लेकर अत्यधिक ऊंचाई वाले हिमालयी क्षेत्रों तक पहुंच रहे हैं। इनका पता हिम, बर्फ, ग्लेशियरों, मीठे पानी और मिट्टी सहित विभिन्न पर्यावरणीय घटकों में लगाया गया है।

दुनिया के जल भंडार पर संकट

इस अध्ययन का नेतृत्व अरुणाचल प्रदेश के गोविंद बल्लभ पंत ‘राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान’ (एनआईएचई), जापान के केइओ विश्वविद्यालय, अशोक ट्रस्ट फॉर रिसर्च इन इकोलॉजी एंड द एनवायरनमेंट (एटीआरईई), सिक्किम के हिमालय इनिशिएटिव और ताइवान के राष्ट्रीय केंद्रीय विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने किया। एक विशेष पर्वत-नदी-महासागर ढांचे का उपयोग करते हुए, विश्लेषण से पता चलता है कि ये प्रदूषक अब केवल घनी आबादी वाले शहरी केंद्रों या महासागरों तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि सक्रिय रूप से उच्च ऊंचाई वाले पारिस्थितिक तंत्रों को नया रूप दे रहे हैं, ग्लेशियरों के पिघलने की गति को बदल रहे हैं, और लगभग दो अरब लोगों के लिए गंभीर जोखिम पैदा कर रहे हैं जो इस क्षेत्र से निकलने वाले दस विशाल नदी बेसिनों पर निर्भर हैं, जिनमें गंगा, ब्रह्मपुत्र, सिंधु, मेकांग, यांग्त्ज़ी और पीली नदियाँ शामिल हैं।

हिंदूकुश हिमालय को एशिया का ‘जल स्तंभ’ कहा जाता है। इस क्षेत्र से निकलने वाली नदियां भारत समेत एशिया के कई देशों के करोड़ों लोगों के लिए पेयजल, कृषि, ऊर्जा और आजीविका का आधार हैं। गंगा, ब्रह्मपुत्र, सिंधु, मेकांग, यांग्त्ज़ी और पीली नदी जैसी प्रमुख नदी प्रणालियों का संबंध हिमालय और आसपास के पर्वतीय क्षेत्रों से है।

ऐसे में ग्लेशियरों और ऊंचाई वाले जलस्रोतों में सूक्ष्म प्लास्टिक की मौजूदगी केवल पर्वतीय पर्यावरण की समस्या नहीं है। इन कणों का नीचे की ओर बहना नदियों, झीलों, कृषि भूमि और अंततः मानव उपयोग के जलस्रोतों तक इनके पहुंचने का रास्ता खोल सकता है।

प्लास्टिक पहुंचने के कई रास्ते

अध्ययन में बताया गया है कि हिमालयी क्षेत्रों में सूक्ष्म प्लास्टिक प्रदूषण के पीछे स्थानीय और दूरस्थ, दोनों तरह के स्रोत जिम्मेदार हो सकते हैं। पर्वतीय पर्यटन, पर्वतारोहण अभियान, तीर्थयात्रा, शिविरों से निकलने वाला कचरा और खराब अपशिष्ट प्रबंधन स्थानीय स्रोतों में शामिल हैं। पर्यटन गतिविधियों वाले क्षेत्रों और शिविर स्थलों के आसपास प्लास्टिक कचरे का जमा होना बाद में छोटे-छोटे कणों में बदलने का कारण बन सकता है।

कृषि क्षेत्र भी इसका एक महत्वपूर्ण स्रोत हो सकता है। प्लास्टिक मल्च, ड्रिप सिंचाई की पाइप, उर्वरक और अन्य कृषि सामग्री धूप, तापमान में बदलाव और लगातार घर्षण के कारण टूटकर छोटे कणों में बदल सकती हैं। बारिश और सतही बहाव के साथ ये कण मिट्टी तथा स्थानीय जलस्रोतों तक पहुंच सकते हैं।

लेकिन खतरा केवल स्थानीय गतिविधियों से नहीं है। हवा भी प्लास्टिक को लंबी दूरी तक पहुंचाने का माध्यम बन सकती है। अध्ययन में भारतीय ग्रीष्म मानसून और मध्य अक्षांशीय पछुआ हवाओं सहित विभिन्न वायुमंडलीय प्रणालियों की भूमिका का उल्लेख किया गया है। निचले इलाकों के शहरों और औद्योगिक क्षेत्रों से निकलने वाले प्लास्टिक के महीन रेशे और कण हवा के साथ पर्वतीय क्षेत्रों तक पहुंच सकते हैं।

ग्लेशियरों में जमा हो रहा प्रदूषण

हिमालयी ग्लेशियरों पर जमा होने वाले सूक्ष्म प्लास्टिक को लेकर चिंता इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि ग्लेशियर केवल बर्फ के भंडार नहीं हैं, बल्कि लंबे समय तक पर्यावरणीय प्रदूषकों को अपने भीतर रोक सकते हैं।

बर्फ और हिम पर जमा काले कार्बन जैसे प्रकाश-अवशोषित कणों के साथ सूक्ष्म प्लास्टिक की मौजूदगी ग्लेशियरों की सतह के गुणों को प्रभावित कर सकती है। ऐसे कण सूर्य के विकिरण के व्यवहार को बदल सकते हैं और बर्फ के पिघलने की प्रक्रिया पर प्रभाव डाल सकते हैं। हालांकि, सूक्ष्म प्लास्टिक की वजह से ग्लेशियरों के पिघलने की वास्तविक मात्रा और उसका दीर्घकालिक प्रभाव अभी और शोध का विषय है।

ग्लेशियरों के पिघलने के साथ उनमें लंबे समय से जमा प्रदूषक भी नीचे की ओर बह सकते हैं। इस तरह पर्वतीय क्षेत्र एक तरफ वायुमंडल से नए प्रदूषकों को ग्रहण कर सकते हैं और दूसरी तरफ पुराने प्रदूषण को नदियों के माध्यम से निचले क्षेत्रों तक पहुंचा सकते हैं।

जलीय जीवों के लिए नया खतरा

सूक्ष्म प्लास्टिक का सबसे गंभीर प्रभाव जलीय पारिस्थितिकी पर पड़ सकता है। छोटे जलीय जीव और प्लवक इन कणों को भोजन समझकर निगल सकते हैं। इसके बाद ये कण खाद्य शृंखला में ऊपर तक पहुंच सकते हैं।

वैज्ञानिक अध्ययनों में विभिन्न जीवों में सूक्ष्म प्लास्टिक के सेवन से भोजन करने की क्षमता में बदलाव, पाचन तंत्र पर प्रभाव, ऊतक क्षति और ऑक्सीडेटिव तनाव जैसी समस्याओं की रिपोर्ट सामने आई है। पर्वतीय नदियों और झीलों में रहने वाली स्थानीय तथा स्थानिक प्रजातियों के लिए यह चिंता इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इनमें से कई प्रजातियां पहले ही जलवायु परिवर्तन, आवास में बदलाव और मानवीय गतिविधियों के दबाव का सामना कर रही हैं।

मिट्टी की सेहत पर भी असर

सूक्ष्म प्लास्टिक का प्रभाव केवल जलस्रोतों तक सीमित नहीं है। मिट्टी में पहुंचने के बाद ये कण मिट्टी की संरचना, उसके छिद्रों, जल धारण क्षमता और पोषक तत्वों के चक्र को प्रभावित कर सकते हैं। इससे पौधों की जड़ प्रणाली और वृद्धि पर असर पड़ने की आशंका है।

मिट्टी में रहने वाले केंचुए और अन्य जीव भी सूक्ष्म प्लास्टिक के संपर्क में आते हैं। कुछ अध्ययनों में सूक्ष्म प्लास्टिक की मौजूदगी के साथ भारी धातुओं जैसे अन्य प्रदूषकों के जीवों में पहुंचने की संभावना बढ़ने की बात सामने आई है। हालांकि, अलग-अलग फसलों, मिट्टी और पर्यावरणीय परिस्थितियों में इसका प्रभाव अलग हो सकता है और इसे समझने के लिए अधिक क्षेत्रीय अध्ययन की आवश्यकता है।

मानव स्वास्थ्य को लेकर बढ़ी चिंता

सूक्ष्म और नैनो प्लास्टिक के मानव स्वास्थ्य पर संभावित प्रभाव आज दुनिया भर में वैज्ञानिक शोध का महत्वपूर्ण विषय है। पानी और भोजन के माध्यम से इनके मानव शरीर में पहुंचने की आशंका जताई जाती है। प्रयोगशाला और अन्य अध्ययनों में सूजन, ऑक्सीडेटिव तनाव, कोशिकीय क्षति और अंतःस्रावी तंत्र पर संभावित प्रभावों की जांच की गई है।

हालांकि, हिमालयी पर्यावरण में मौजूद सूक्ष्म प्लास्टिक और मनुष्यों में किसी विशिष्ट बीमारी के बीच सीधा कारणात्मक संबंध अभी स्थापित नहीं माना जा सकता। इसलिए इस विषय में खतरे की संभावना और वैज्ञानिक रूप से सिद्ध स्वास्थ्य प्रभावों के बीच अंतर करना जरूरी है। इसके बावजूद, पेयजल के महत्वपूर्ण स्रोतों में प्लास्टिक प्रदूषण की बढ़ती मौजूदगी निगरानी और रोकथाम को आवश्यक बनाती है।

पर्वत से नदी और नदी से समुद्र तक

इस अध्ययन की महत्वपूर्ण विशेषता इसका ‘पर्वत-नदी-महासागर’ दृष्टिकोण है। सूक्ष्म प्लास्टिक को किसी एक झील, नदी या पहाड़ी क्षेत्र की अलग समस्या मानने के बजाय अध्ययन ने इसे पर्वतीय पारिस्थितिकी, वायुमंडल, हिमनद, नदियों, मिट्टी और जैविक तंत्र के बीच जुड़ी हुई समस्या के रूप में देखने का प्रयास किया है।

पहाड़ों में जमा प्लास्टिक बारिश, हिमपात और बर्फ पिघलने के साथ नदियों में पहुंच सकता है। नदियां इन्हें मैदानी क्षेत्रों से होते हुए अंततः समुद्र तक ले जा सकती हैं। इस तरह हिमालयी क्षेत्र में मौजूद प्रदूषण का संबंध व्यापक नदी घाटियों और समुद्री पारिस्थितिकी से भी जुड़ जाता है।

अभी कई सवालों के जवाब बाकी

अध्ययन ने यह भी स्पष्ट किया है कि हिमालय जैसे अत्यधिक ऊंचाई वाले और कठिन भौगोलिक क्षेत्रों में सूक्ष्म प्लास्टिक पर शोध अभी शुरुआती दौर में है। अलग-अलग अध्ययनों में नमूने लेने, कणों की पहचान करने और उनकी मात्रा निर्धारित करने की पद्धतियों में अंतर है। इसके कारण विभिन्न क्षेत्रों के आंकड़ों की सीधी तुलना करना कठिन हो जाता है।

इसलिए ऊंचाई वाले क्षेत्रों के लिए मानकीकृत नमूनाकरण और परीक्षण पद्धति विकसित करना जरूरी है। नियमित निगरानी से यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि किन क्षेत्रों में प्रदूषण अधिक है, उसके प्रमुख स्रोत क्या हैं और समय के साथ स्थिति किस दिशा में बदल रही है।

समाधान की शुरुआत स्रोत पर रोक से

हिंदूकुश हिमालय को सूक्ष्म प्लास्टिक से बचाने के लिए केवल पर्वतीय क्षेत्रों में सफाई अभियान पर्याप्त नहीं होगा। प्लास्टिक प्रदूषण को उसके स्रोत पर ही कम करना होगा। पर्यटन और पर्वतारोहण क्षेत्रों में प्लास्टिक कचरे के प्रबंधन, वापसी और पुनर्चक्रण की प्रभावी व्यवस्था आवश्यक है।

कृषि में इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक उत्पादों के उपयोग, संग्रह और निपटान के लिए प्रभावी नियम लागू करने होंगे। साथ ही शहरों और औद्योगिक क्षेत्रों से निकलने वाले प्लास्टिक कचरे तथा वायुजनित प्लास्टिक रेशों पर भी नियंत्रण जरूरी है।

हिमालय कई देशों में फैला हुआ क्षेत्र है। इसलिए इसकी नदियों और पारिस्थितिकी को बचाने के लिए केवल किसी एक देश के प्रयास पर्याप्त नहीं होंगे। क्षेत्रीय सहयोग, साझा निगरानी, वैज्ञानिक आंकड़ों का आदान-प्रदान और एक समान पर्यावरणीय मानकों की दिशा में प्रयास आवश्यक हैं।

‘दुनिया की छत’ को प्लास्टिक से बचाना होगा

हिमालय को लंबे समय तक एक अछूते और निर्मल प्राकृतिक क्षेत्र के रूप में देखा जाता रहा है। लेकिन सूक्ष्म प्लास्टिक की मौजूदगी इस धारणा को बदल रही है। प्रदूषण का आकार भले ही आंखों से दिखाई न दे, लेकिन उसका प्रभाव जल, मिट्टी, जीव-जंतुओं और पारिस्थितिक प्रक्रियाओं पर पड़ सकता है।

हिमालय की बर्फ में जमा एक छोटा-सा प्लास्टिक कण भविष्य में पिघलते पानी के साथ किसी नदी में पहुंच सकता है और वही नदी लाखों लोगों के लिए जीवन का आधार बनती है। इसलिए सूक्ष्म प्लास्टिक का सवाल केवल प्लास्टिक कचरे का सवाल नहीं, बल्कि जल सुरक्षा, जैव विविधता और पर्वतीय पारिस्थितिकी के भविष्य का सवाल भी है।

हिंदूकुश हिमालय को बचाने का अर्थ केवल ग्लेशियरों और पहाड़ों को बचाना नहीं है। इसका अर्थ उन नदियों, जंगलों, जीव-जंतुओं और करोड़ों लोगों के भविष्य को सुरक्षित रखना भी है, जिनका जीवन इस पर्वतीय क्षेत्र से जुड़ा हुआ है। (फोटो -AI)

स्रोत: दुनिया की छत में अनदेखा खतरा: हिंदू कुश हिमालय में बढ़ते पारिस्थितिक जोखिम की ओर ले जाने वाले सूक्ष्म प्लास्टिक प्रदूषण का एक मेटा-विश्लेषण

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