साहित्य में गौरैया

संजय कुमार / दुनिया भर में लोकगीतों, लोककथाओं और साहित्य में जिस पक्षी  को सबसे ज्यादा जगह मिली है, वह ‘गौरैया’ है। देश के चर्चित साहित्यकारों ने कहानी, कविता, गीत-गजलों या यूं कहें हर विधा में गौरैया को जगह दी है। कथा सम्राट प्रेमचंद की कहानी ‘नादान दोस्त’, प्रसिद्ध उपन्यासकार भीष्म साहनी की कहानी ‘दो…

संजय कुमार / दुनिया भर में लोकगीतों, लोककथाओं और साहित्य में जिस पक्षी  को सबसे ज्यादा जगह मिली है, वह ‘गौरैया’ है। देश के चर्चित साहित्यकारों ने कहानी, कविता, गीत-गजलों या यूं कहें हर विधा में गौरैया को जगह दी है। कथा सम्राट प्रेमचंद की कहानी ‘नादान दोस्त’, प्रसिद्ध उपन्यासकार भीष्म साहनी की कहानी ‘दो गौरैया’, प्रसिद्ध लेखिका महादेवी वर्मा की ‘गौरैया’ है तो वहीं, प्रसिद्ध कथाकार रवीन्द्र कालिया ने कहानी ‘गौरैया’ के जरिये कई सन्देश दिये हैं। उड़ती चिड़िया को पहचानने वाले पक्षी विशेषज्ञ सालिम अली ने अपनी आत्मकथा का नाम ‘एक गौरैया का गिरना’(फाल ऑफ़ स्पैरो) रखा है। शेक्सपियर के नाटक ‘हेमलेट’ में भी एक पात्र अपनी बात कहने के लिए गौरैया को जरिया बनाता है।

साहित्य हो या लोककथा या फिर लोकगीत-संगीत सभी में गौरैया चिड़िया को घर-आंगन में खेलते-कूदते-फ़ुदकते- गाते- जीते हुए जीवंत कर हमारे बचपन की तस्वीर को सामने रख दिया गया है, ताकि जिसके साथ बचपन गुजारा, आज वह संकट में हैं, हमें आगे आना होगा और उसे बचाना होगा। भारतीय साहित्य की बात करें तो गौरैया को विशेष स्थान मिला है। इन्सान के घर आंगन में रहने वाली नन्हीं-सी जान गौरैया पर ढ़ेरों कहानी, कविता, गीत-संगीत है, जो गौरैया संरक्षण की वकालत करते हुए गौरैया के इन्सान के जीवन में रहने के महत्व को बताते हैं। ज्यादातर कहानी, कविता, गीत-संगीत की प्रस्तुति बच्चों को केंद्र में रख कर पेश किया गया है, लेकिन ऐसा नहीं है गौरैया पर केंद्रित कहानी, कविताएँ, गीत-संगीत बड़ों को भी अपनी और खींचती है और संदेश देती है।

साहित्य ही नहीं बल्कि प्राचीन ग्रीक और रोमन कविताओं से लेकर कई धार्मिक ग्रंथों में भी गौरैया का प्रतिनिधित्व दिखता है। पंचतंत्र की पहली पुस्तक  मित्रभेद  में, एक कहानी  है जिसमें एक गौरैया, एक कठफोड़वा, एक नट और एक मेंढक की सहायता से एक हाथी से बदला लेती है जिसने उसके घोंसले  और  अंडों  को नष्ट कर दिया था। कहानी  नैतिक  सन्देश  देता  है कि छोटे और विनम्र प्राणी एक साथ काम करके बड़े और शक्तिशाली विरोधियों को भी मात दे सकते हैं।

गौरैया को आज भी साहित्य में चित्रित किया जा रहा है। तो चलिए बात करते हैं साहित्य में चर्चित ‘गौरैया’ को लेकर, सबसे पहले चलते हैं चर्चित साहित्यकार भीष्म साहनी की कहानी ‘दो गौरैया’ के पास। ‘दो गौरैया’ एक मार्मिक कहानी है जो गौरैया संरक्षण से बहुत करीब है। करीब इसलिए कि इंसान के घर आंगन में घोंसला बनाने वाली गौरैया को हमने व्यवहार परिवर्तन कर उससे नाता तोड़ लिया है। घर के अंदर रोशनदान या पंखे के कप में या बाथरूम के पाइप के पीछे तिनका रख घोंसला बनाने वाली गौरैया को अंदर आने नहीं देते हैं आ जाती है तो भगा देते हैं।

‘दो गौरैया’ का नायक लेखक का पिता है। घर में हम तीन ही व्यक्ति रहते हैं-लेखक और मां-पिताजी। एक दिन दो गौरैया लेखक के घर के अन्दर घुस आईं और छत में लगे पंखे के गोले में उन्होंने अपना घोंसला बना लिया……नायक को यह अच्छा नहीं लगा। उन्हें ग़ुस्सा आ गया। गौरैया को घर से बाहर करने में जुट गए। नायक के हस्तक्षेप से गौरैया घोंसले में से निकलकर इधर – उधर बैठने लगी। मां कहती है ये निकलेंगी नहीं। अब इन्होंने अण्डे दे दिए होंगे।फिर भी नायक पीले हैं कि निकाल कर ही दम लेंगे। लाठी से पंखे के गोले को ठोकर मारी तो ‘चीं-चीं’ करती गौरैया उड़कर कभी इधर तो उधर बैठने लगती। दरवाजे/रोशनदान को बंद कर देने के बाद भी रात में आ जाती। गुस्से में नायक ने लाठी के सिरा को घोंसले में फंसा कर उसे हटाने लगता है। दोनों गौरैया आंगन में बैठ बिना आवाज के घोंसला को निहारे जा रही थी तभी सहसा जोर की आवाज आई,‘चीं-चीं, चीं-चीं!!! नायक के हाथ ठिठक गए। यह क्या? क्या गौरैया लौट आईं हैं? नहीं, दोनों गौरैया बाहर दीवार पर गुमसुम बैठी थीं।‘चीं-चीं, चीं-चीं!’ फिर आवाज आई। पंखे के गोले के ऊपर से नन्हीं-नन्हीं गौरैया सिर निकाले नीचे की ओर देख रही थीं और चीं-चीं किए जा रही थीं। हमारे मां-बाप कहां हैं? सभी अवाक्, नायक स्टूल पर से नीचे उतर आते हैं और घोंसले के तिनकों में से लाठी निकालकर, लाठी को एक ओर रख देते है और चुपचाप कुर्सी पर आकर बैठ जाते हैं। लेखक की मां सभी दरवाज़े खोल देती है। नन्हीं चिड़ियां अभी भी हांफ-हांफकर चिल्लाए जा रही थीं और अपने मां-बाप को बुला रही थीं। उनके मां-बाप झट-से उड़कर अन्दर आ गए और चीं-चीं करते उनसे जा मिले और उनकी नन्हीं-नन्हीं चोंचों में चुग्गा डालने लगे। लेखक, माँ-पिताजी उनकी ओर देखते रह गए। कमरे में फिर से शोर होने लगा था, पर अबकी बार नायक यानि पिताजी उनकी ओर देख-देखकर केवल मुसकराते रहे।

वहीं, गौरैया को केंद्र में रख लिखी रवींद्र कालिया की कहानी “गौरैया” एक संकेत हैं। कहनी में वे लिखते हैं…..गौरैया बोलती तो लगता, अभी प्रलय बहुत दूर है। पृथ्वी पर जीवन के चिह्न बाकी हैं। लगातार एक जिज्ञासा हो रही थी कि क्या कह रही। जेठ की उजली दुपहरी थी। पत्ता तक नहीं हिल रहा था । लू के थपेड़े, घने पेड़ों के बावजूद बदन पर आग की लपटों की तरह लपलपा रहे थे। इस खौफनाक मौसम में बस एक ही राहत थी गौरैया की मधुर आवाज। दोपहर के इस घनघोर सन्नाटे में उसकी आवाज पेड़ पौधों के ऊपर तितली की तरह थिरक रही थी। इस आवाज के सम्मोहन में ही मैं बाहर बगिया में निकल आया था और पेड़ के नीचे पड़ी खटिया पर पसर गया था। गौरैया चुप हो जाती तो लगता  पूरी  कायनात  धू- धू कर  जल रही है, और अभी सब कुछ जलकर राख हो जाएगा, गौरैया बोलती तो, लगता अभी प्रलय बहुत दूर है, पृथ्वी पर जीवन चिन्ह बाकी है…..कहानी में लेखक बताते हैं कि जन्मभूमि नाम से ही मुझे दहशत होने लगी, लेकिन यह सुकून था कि यहां गौरैया ने जन्म लिया था भगवान ने नहीं। रवींद्र कालिया की कहानी गौरैया में सांप्रदायिकता से लेकर पर्यावरण से दूर होते समाज पर चर्चा की गई है। इस कहानी में लेखक ने सांप्रदायिकता पर कटाक्ष करते हुए कहा कि गौरैया या कोई भी अन्य पक्षी धर्मनिरपेक्ष होते हैं जो मंदिर मस्जिद का भेदभाव नहीं करते हैं। कहानी बहुत ही रोचक है।

उत्तर भारत की संस्कृति में चिड़िया गौरैया इस तरह रची बसी है कि प्रसिद्ध लेखिका महादेवी वर्मा ने कहानी गौरैया में कामना की है कि हमारे शहरी जीवन को समृद्ध करने के लिए गौरैया चिड़िया फिर लौटेगी।

कथा सम्राट प्रेमचंद की कहानी ‘नादान दोस्त’, की बात करें तो कहानी में चिड़ा (नर गौरैया)-चिड़िया(मादा गौरैया) और दो नन्हें बच्चों (केशव व श्यामा) की कहानी है। चिड़ियों के द्वारा कार्निस के ऊपर घोंसला बनाने के बाद बच्चों के अंदर उसके घोंसले एवं अंडे को देखने की ललक तो होती ही साथ ही घोंसले की सुरक्षा का ख्याल आता है। अपने माँ बाप से छुप-छुपा कर घोंसला तक बच्चे पहुँचते हैं। घोंसले को धूप पानी से बचाने के लिए टोकरी रखते हैं। अंडे को तिनके पर देख उसकी सुरक्षा के लिए उसके नीचे कपड़ा डाल देते हैं। साथ ही दाना-पानी भी रखते हैं। बच्चे खुश होते हैं कि उन्होंने अंडे की सुरक्षा कर दी। लेकिन, शाम में जमीन पर गिरा टोकरी, पानी का टूटा प्याला और टूटे तीनों अण्डों को देख उनके होश उड़ जाते हैं। बच्चों की माँ सब समझ जाती है। बच्चों को बताती है कि तुमने अंडे छुए इसलिए चिड़ियों के अंडे गंदे हो गए। चिड़िया फिर से उन्हें नहीं सेती। चिड़ा और चिड़िया के नादान दोस्त की वजह से अण्डों की हिफाजत की जगह सत्यनाश हो गया । दोनों चिड़ियाँ वहां फिर न दिखाई दीं। ‘नादान दोस्त’ कहानी के जरिये प्रेमचंद ने गौरैया सहित दूसरी चिड़ियों के घोंसले और अण्डों से छेड़-छाड नहीं करने और उनके संरक्षण की नसीयत दी है अक्सर लोग नादानी में घोंसला में ताकझांक और अण्डों- बच्चों को देखने-छुने की कोशिश करते रहते हैं।

हरिवंशराय बच्चन की कविता ‘चिड़िया और चुरुंगुन’, मुक्ति शाहदेव की कविता ‘आँगन की गौरैया’ सहित सैकड़ों कविताएँ। गौरैया को केंद्र में रख कर लिखी गयी है बल्कि लगातार लिखी जा रही है।

साहित्य और गौरैया स्वभाव से एक जैसे हैं। जैसे साहित्य सब का हित देखता है, साहित्य में देश काल की समग्रता होती है। गौरैया भी साहित्य की तरह ही है। सबका हित चाहने वाली। सब को एक साथ जोड़ने वाली। डॉ. आशुतोष कुमार ने अपनी कविता  गौरैया  में इस भाव को बड़ी शिद्दत से रखा है।

‘गौरैया रोज आती है

मेरे आंगन में

लाती है खुशियों का समवेत स्वर

उम्मीदों से लबरेज नया सहर

फुदकती है, चहकती है, बुनती है सपने

कुलीन-मलिन सब इसके अपने।’

साहित्य में संवेदना होती है और जब हम संवेदना की बात करते हैं, तो स्वत: गौरैया के करीब हो जाते हैं। गौरैया मतलब एक ऐसी छोटी- सी चिड़िया, जो प्राचीन काल से ही मानव के साथ रही। मानवीय स्वभाव के साथ रच- बस गयी। अपने समवेत स्वर से घर- आंगन को गुलजार करती रही। गौरैया के बिना घर सूना हो जाता है। गौरैया नहीं, तो सुख समृद्धि का वास नहीं। घर में गौरैया नहीं, तो बरकत नहीं। अनाज की बड़ी कोठी का एक मुट्ठी दाना गौरैया के अंश का माना जाता है। लेकिन, आज हम सब घर के इस अनन्य सदस्य को भूल रहे हैं। इसकी मौजूदगी के महत्व को भूल गये। मानवीय उपेक्षा और अनदेखी ने गौरैया को विलुप्ति के कगार पर खड़ा कर दिया है। यह किसी भी संवेदनशील रचनाकार के मन- मस्तिष्क को झकझोरता है। इसलिए गौरैया साहित्य में भी बखूबी अपनी मौजूदगी दर्ज कर चुकी है।

यू टूब पर गौरैया की कई कार्टून फ़िल्म है। लोकगायिका चंदन तिवारी की गीत ‘का खाऊ का पीऊ का ले के परदेस जाउं’। काफ़ी चर्चित है, जो गौरैया की खूंटे में फंसी एक दाल की कथा है, जिसे पाने के लिए वह अथक संघर्ष करती है। गीत में ‘अपने परिवार के भोजन के लिए खूंटे में फंसे दाल के एक दाने के लिए बढ़ई से लेकर राजा, रानी, सांप, बांस, जंगल, आग, समुद्र और हाथी तक से फ़रियाद करने वाली मासूम गौरैया की मासूम कहानी बच्चों सहित बड़ों को अपनी और खींचती है। नन्हीं गौरैया को दाल का वह दाना वापस मिलता है चींटियों के साथ और सहयोग से। गौरैया की दिल को छुने वाली व्यथा अथक संघर्ष की वह कहानी है जो हर नन्हे और कमजोर को बल देती है। गौरैया माँ का प्यार, गर्भवती गौरैया, गरीब गौरैया की कठिनाई, गरीब गौरैया बच्चे,चूड़ी बेचने वाली गौरैया, गौरैया की तीन संताने, गौरैया और बंदर की कहानी सहित कई कार्टून फ़िल्म यू टूब पर हैं।

गौरैया संरक्षण में साहित्य की विभिन्न आयामों कहानी, कविता, गीत-संगीत, लोककथा, लोकगीत-संगीत आदि में जो जगह मिली और मिल रही है उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। सभी भाषाओँ और टेस्टबुक में भी जगह मिल रही है जो संरक्षण की दिशा में मील का पत्थर सबित होगी। आइये साभार गौरैया संरक्षण पर पढ़ते हैं दो चर्चित कहानी।  

(कहानी)

“दो गौरैया” – भीष्म साहनी

घर में हम तीन ही व्यक्ति रहते हैं-मां, पिताजी और मैं। पर पिताजी कहते हैं कि यह घर सराय बना हुआ है। हम तो जैसे यहां मेहमान हैं, घर के मालिक तो कोई दूसरे ही हैं।

आंगन में आम का पेड़ है।  तरह-तरह के पक्षी उस पर डेरा डाले रहते हैं।  जो भी पक्षी पहाड़ियों-घाटियों पर से उड़ता हुआ दिल्ली पहुंचता है, पिताजी कहते हैं वही सीधा हमारे घर पहुंच जाता है, जैसे हमारे घर का पता लिखवाकर लाया हो। यहां कभी तोते पहुंच जाते हैं, तो कभी कौवे और कभी तरह-तरह की गौरैया। वह शोर मचता है कि कानों के पर्दे फट जाएं, पर लोग कहते हैं कि पक्षी गा रहे हैं!घर के अन्दर भी यही हाल है।  बीसियों तो चूहे बसते हैं।  रात-भर एक कमरे से दूसरे कमरे में भागते फिरते हैं। वह धमा-चौकड़ी मचती है कि हम लोग ठीक तरह से सो भी नहीं पाते।  बर्तन गिरते हैं, डिब्बे खुलते हैं, प्याले टूटते हैं।  एक चूहा अंगीठी के पीछे बैठना पसन्द करता है, शायद बूढ़ा है उसे सर्दी बहुत लगती है। एक दूसरा है जिसे बाथरूम की टंकी पर चढ़कर बैठना पसन्द है। उसे शायद गर्मी बहुत लगती है। बिल्ली हमारे घर में रहती तो नहीं मगर घर उसे भी पसन्द है और वह कभी-कभी झांक जाती है। मन आया तो अन्दर आकर दूध पी गई, न मन आया तो बाहर से ही ‘फिर आऊंगी’ कहकर चली जाती है। शाम होते ही दो-तीन चमगादड़ कमरों के आर-पार पर फैलाए कसरत करने लगते हैं। घर में कबूतर भी हैं।  दिन-भर ‘गुटर-गूं, गुटर-गूं’ का संगीत सुनाई देता रहता है।  इतने पर ही बस नहीं, घर में छिपकलियां भी हैं और बर्रे भी हैं और चींटियों की तो जैसे फ़ौज ही छावनी डाले हुए है।

अब एक दिन दो गौरैया सीधी अन्दर घुस आईं और बिना पूछे उड़-उड़कर मकान देखने लगीं।  पिताजी कहने लगे कि मकान का निरीक्षण कर रही हैं कि उनके रहने योग्य है या नहीं।  कभी वे किसी रोशनदान पर जा बैठतीं, तो कभी खिड़की पर।  फिर जैसे आईं थीं वैसे ही उड़ भी गईं।  पर दो दिन बाद हमने क्या देखा कि बैठक की छत में लगे पंखे के गोले में उन्होंने अपना बिछावन बिछा लिया है, और सामान भी ले आईं हैं और मजे से दोनों बैठी गाना गा रही हैं। जाहिर है, उन्हें घर पसन्द आ गया था।मां और पिताजी दोनों सोफ़े पर बैठे उनकी ओर देखे जा रहे थे।  थोड़ी देर बाद मां सिर हिलाकर बोलीं,‘अब तो ये नहीं उड़ेंगी।  पहले इन्हें उड़ा देते, तो उड़ जातीं। अब तो इन्होंने यहां घोंसला बना लिया है। ’इस पर पिताजी को ग़ुस्सा आ गया। वह उठ खड़े हुए और बोले,‘देखता हूं ये कैसे यहां रहती हैं! गौरैया मेरे आगे क्या चीज़ हैं! मैं अभी निकाल बाहर करता हूं। ’‘छोड़ो जी, चूहों को तो निकाल नहीं पाए, अब चिड़ियों को निकालेंगे!’ मां ने व्यंग्य से कहा।मां कोई बात व्यंग्य में कहें, तो पिताजी उबल पड़ते हैं।  वह समझते हैं कि मां उनका मज़ाक उड़ा रही हैं।  वह फौरन उठ खड़े हुए और पंखे के नीचे जाकर ज़ोर से ताली बजाई और मुंह से ‘श—–शू’ कहा, बांहें झुलाईं, फिर खड़े-खड़े कूदने लगे, कभी बाहें झुलाते, कभी ‘श—शू’ करते।

गौरैयों ने घोंसले में से सिर निकालकर नीचे की ओर झांककर देखा और दोनों एक साथ ‘चीं-चीं करने लगीं।  और मां खिलखिलाकर हंसने लगीं।पिताजी को ग़ुस्सा आ गया, इसमें हंसने की क्या बात है?मां को ऐसे मौकों पर हमेशा मज़ाक सूझता है।  हंसकर बोली, चिड़ियां एक दूसरी से पूछ रही हैं कि यह आदमी कौन है और नाच क्यों रहा है?तब पिताजी को और भी ज़्यादा ग़ुस्सा आ गया और वह पहले से भी ज़्यादा ऊंचा कूदने लगे।  गौरैया घोंसले में से निकलकर दूसरे पंखे के डैने पर जा बैठीं।  उन्हें पिताजी का नाचना जैसे बहुत पसन्द आ रहा था।  मां फिर हंसने लगीं,‘ये निकलेंगी नहीं, जी। अब इन्होंने अण्डे दे दिए होंगे।’‘निकलेंगी कैसे नहीं?’ पिताजी बोले और बाहर से लाठी उठा लाए। इसी बीच गौरैया फिर घोंसले में जा बैठी थीं।  उन्होंने लाठी ऊंची उठाकर पंखे के गोले को ठकोरा।  ‘चीं-चीं’ करती गौरैया उड़कर पर्दे के डण्डे पर जा बैठीं।

‘इतनी तक़लीफ़ करने की क्या ज़रूरत थी।  पंखा चला देते तो ये उड़ जातीं।’ मां ने हंसकर कहा।

पिताजी लाठी उठाए पर्दे के डण्डे की ओर लपके।  एक गौरैया उड़कर किचन के दरवाज़े पर जा बैठी।  दूसरी सीढ़ियों वाले दरवाज़े पर। मां फिर हंस दी।  ‘तुम तो बड़े समझदार हो जी, सभी दरवाज़े खुले हैं और तुम गौरैयों को बाहर निकाल रहे हो।  एक दरवाज़ा खुला छोड़ो, बाक़ी दरवाज़े बन्द कर दो।  तभी ये निकलेंगी। ’अब पिताजी ने मुझे झिड़ककर कहा,‘तू खड़ा क्या देख रहा है? जा, दोनों दरवाज़े बन्द कर दे!’मैंने भागकर दोनों दरवाज़े बन्द कर दिए केवल किचन वाला दरवाज़ा खुला रहा। पिताजी ने फिर लाठी उठाई और गौरैयों पर हमला बोल दिया। एक बार तो झूलती लाठी मां के सिर पर लगते-लगते बची।  चीं-चीं करती चिड़ियां कभी एक जगह तो कभी दूसरी जगह जा बैठतीं।  आखिर दोनों किचन की ओर खुलने वाले दरवाज़े में से बाहर निकल गईं। मां तालियां बजाने लगीं।  पिताजी ने लाठी दीवार के साथ टिकाकर रख दी और छाती फैलाए कुर्सी पर आ बैठे।‘आज दरवाज़े बन्द रखो’ उन्होंने हुक़्म दिया।  ‘एक दिन अन्दर नहीं घुस पाएंगी, तो घर छोड़ देंगी। ’तभी पंखे के ऊपर से चीं-चीं की आवाज सुनाई पड़ी। और मां खिलखिलाकर हंस दीं।  मैंने सिर उठाकर ऊपर की ओर देखा, दोनों गौरैया फिर से अपने घोंसले में मौज़ूद थीं।  ‘दरवाज़े के नीचे से आ गई हैं,’ मां बोलीं।मैंने दरवाज़े के नीचे देखा। सचमुच दरवाज़ों के नीचे थोड़ी-थोड़ी जगह ख़ाली थी।पिताजी को फिर ग़ुस्सा आ गया।  मां मदद तो करती नहीं थीं, बैठी हंसे जा रही थीं।अब तो पिताजी गौरैयों पर पिल पड़े। उन्होंने दरवाज़ों के नीचे कपड़े ठूंस दिए ताकि कहीं कोई छेद बचा नहीं रह जाए।  और फिर लाठी झुलाते हुए उन पर टूट पड़े।  चिड़ियां चीं-चीं करती फिर बाहर निकल गईं।  पर थोड़ी ही देर बाद वे फिर कमरे में मौजूद थीं।  अबकी बार वे रोशनदान में से आ गई थीं जिसका एक शीशा टूटा हुआ था।

‘देखो-जी, चिड़ियों को मत निकालो’ मां ने अबकी बार गम्भीरता से कहा,‘अब तो इन्होंने अण्डे भी दे दिए होंगे।  अब ये यहां से नहीं जाएंगी। ’क्या मतलब? मैं कालीन बरबाद करवा लूं? पिताजी बोले और कुर्सी पर चढ़कर रोशनदान में कपड़ा ठूंस दिया और फिर लाठी झुलाकर एक बार फिर चिड़ियों को खदेड़ दिया।  दोनों पिछले आंगन की दीवार पर जा बैठीं।  

इतने में रात हो गई। हम खाना खाकर ऊपर जाकर सो गए। जाने से पहले मैंने आंगन में झांककर देखा, चिड़ियां वहां पर नहीं थीं। मैंने समझ लिया कि उन्हें अक़्ल आ गई होगी। अपनी हार मानकर किसी दूसरी जगह चली गई होंगी।दूसरे दिन इतवार था। जब हम लोग नीचे उतरकर आए तो वे फिर से मौज़ूद थीं और मज़े से बैठी मल्हार गा रही थीं। पिताजी ने फिर लाठी उठा ली। उस दिन उन्हें गौरैयों को बाहर निकालने में बहुत देर नहीं लगी।

अब तो रोज़ यही कुछ होने लगा। दिन में तो वे बाहर निकाल दी जातीं पर रात के वक़्त जब हम सो रहे होते, तो न जाने किस रास्ते से वे अन्दर घुस आतीं।

पिताजी परेशान हो उठे। आख़िर कोई कहां तक लाठी झुला सकता है? पिताजी बार-बार कहें,‘मैं हार मानने वाला आदमी नहीं हूं।’ पर आख़िर वह भी तंग आ गए थे। आख़िर जब उनकी सहनशीलता चुक गई तो वह कहने लगे कि वह गौरैयों का घोंसला नोचकर निकाल देंगे। और वह फ़ौरन ही बाहर से एक स्टूल उठा लाए।घोंसला तोड़ना कठिन काम नहीं था। उन्होंने पंखे के नीचे फर्श पर स्टूल रखा और लाठी लेकर स्टूल पर चढ़ गए। ‘किसी को सचमुच बाहर निकालना हो, तो उसका घर तोड़ देना चाहिए,’ उन्होंने गुस्से से कहा।घोंसले में से अनेक तिनके बाहर की ओर लटक रहे थे, गौरैयों ने सजावट के लिए मानो झालर टांग रखी हो। पिताजी ने लाठी का सिरा सूखी घास के तिनकों पर जमाया और दाईं ओर को खींचा। दो तिनके घोंसले में से अलग हो गए और फरफराते हुए नीचे उतरने लगे।‘चलो, दो तिनके तो निकल गए,’ मां हंसकर बोलीं,‘अब बाकी दो हज़ार भी निकल जाएंगे!’तभी मैंने बाहर आंगन की ओर देखा और मुझे दोनों गौरैया नज़र आईं। दोनों चुपचाप दीवार पर बैठी थीं। इस बीच दोनों कुछ-कुछ दुबला गई थीं, कुछ-कुछ काली पड़ गई थीं। अब वे चहक भी नहीं रही थीं।अब पिताजी लाठी का सिरा घास के तिनकों के ऊपर रखकर वहीं रखे-रखे घुमाने लगे। इससे घोंसले के लम्बे-लम्बे तिनके लाठी के सिरे के साथ लिपटने लगे। वे लिपटते गए, लिपटते गए, और घोंसला लाठी के इर्द-गिर्द खिंचता चला आने लगा। फिर वह खींच-खींचकर लाठी के सिरे के इर्द-गिर्द लपेटा जाने लगा। सूखी घास और रूई के फाहे, और धागे और थिगलियां लाठी के सिरे पर लिपटने लगीं। तभी सहसा जोर की आवाज आई,‘चीं-चीं, चीं-चीं!!!’पिताजी के हाथ ठिठक गए। यह क्या? क्या गौरैया लौट आईं हैं? मैंने झट से बाहर की ओर देखा। नहीं, दोनों गौरैया बाहर दीवार पर गुमसुम बैठी थीं।

‘चीं-चीं, चीं-चीं!’ फिर आवाज आई। मैंने ऊपर देखा। पंखे के गोले के ऊपर से नन्हीं-नन्हीं गौरैया सिर निकाले नीचे की ओर देख रही थीं और चीं-चीं किए जा रही थीं। अभी भी पिताजी के हाथ में लाठी थी और उस पर लिपटा घोंसले का बहुत-सा हिस्सा था। नन्हीं-नन्हीं दो गौरैया! वे अभी भी झांके जा रही थीं और चीं-चीं करके मानो अपना परिचय दे रही थीं, हम आ गई हैं। हमारे मां-बाप कहां हैं?मैं अवाक् उनकी ओर देखता रहा। फिर मैंने देखा, पिताजी स्टूल पर से नीचे उतर आए हैं। और घोंसले के तिनकों में से लाठी निकालकर उन्होंने लाठी को एक ओर रख दिया है और चुपचाप कुर्सी पर आकर बैठ गए हैं। इस बीच मां कुर्सी पर से उठीं और सभी दरवाज़े खोल दिए। नन्हीं चिड़ियां अभी भी हांफ-हांफकर चिल्लाए जा रही थीं और अपने मां-बाप को बुला रही थीं।उनके मां-बाप झट-से उड़कर अन्दर आ गए और चीं-चीं करते उनसे जा मिले और उनकी नन्हीं-नन्हीं चोंचों में चुग्गा डालने लगे। मां-पिताजी और मैं उनकी ओर देखते रह गए। कमरे में फिर से शोर होने लगा था, पर अबकी बार पिताजी उनकी ओर देख-देखकर केवल मुसकराते रहे।(साभार-वेब साईट फ़ेमिना – दिसंबर 21, 2020)

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(कहानी)

“नादान दोस्त” – प्रेमचंद

केशव के घर में कार्निस के ऊपर एक चिड़िया ने अण्डे दिए थे। केशव और उसकी बहन श्यामा दोनों बड़े ध्यान से चिड़ियों को वहां आते-जाते देखा करते । सवेरे दोनों आंखे मलते कार्निस के सामने पहुँच जाते और चिड़ा या चिड़िया दोनों को वहां बैठा पातें। उनको देखने में दोनों बच्चों को न मालूम क्या मजा मिलता, दूध और जलेबी की भी सुध न रहती थी। दोनों के दिल में तरह-तरह के सवाल उठते। अण्डे कितने बड़े होंगे ? किस रंग के होंगे ? कितने होंगे ? क्या खाते होंगे ? उनमें बच्चे किस तरह निकल आयेंगे ? बच्चों के पर कैसे निकलेंगे ? घोंसला कैसा है? लेकिन इन बातों का जवाब देने वाला कोई नहीं। न अम्मां को घर के काम-धंधों से फुर्सत थी न बाबूजी को पढ़ने-लिखने से । दोनों बच्चे आपस ही में सवाल-जवाब करके अपने दिल को तसल्ली दे लिया करते थे।

        श्यामा कहती—क्यों भइया, बच्चे निकलकर फुर से उड़ जायेंगे ?

        केशव विद्वानों जैसे गर्व से कहता—नहीं री पगली, पहले पर निकलेंगे। बगैर परों के बेचारे कैसे उड़ेगे ?

        श्यामा—बच्चों को क्या खिलायेगी बेचारी ?

        केशव इस पेचीदा सवाल का जवाब कुछ न दे सकता था।

        इस तरह तीन-चान दिन गुजर गए। दोनों बच्चों की जिज्ञासा दिन-दिन बढ़ती जाती थीं अण्डों को देखने के लिए वह अधी हो उठते थे। उन्होने अनुमान लगाया कि अब बच्चे जरूर निकल आये होंगे । बच्चों के चारों का सवाल अब उनके सामने आ खड़ा हुआ। चिड़ियां बेचारी इतना दाना कहां पायेंगी कि सारे बच्चों का पेट भरे। ग़रीब बच्चे भूख के मारे चूं-चूं करके मर जायेंगे।

इस मुसीबत का अन्दाजा करके दोनों घबरा उठे। दोनों ने फैसला किया कि कार्निस पर  थोड़ा-सा दाना रख दिया जाये। श्यामा खुश होकर बोली—तब तो चिड़ियों को चारे के लिए कहीं उड़कर न जाना पड़ेगा न ?

        केशव—नहीं, तब क्यों जायेंगी ?

        श्यामा—क्यों भइया, बच्चों को धूप न लगती होगी?

        केशव का ध्यान इस तकलीफ की तरफ न गया था। बोला—जरूर तकलीफ हो रही होगी। बेचारे प्यास के मारे पड़फ रहे होंगे। ऊपर छाया भी तो कोई नहीं ।

        आखिर यही फैसला हुआ कि घोंसले के ऊपर कपड़े की छत बना देनी चाहिये। पानी की प्याली और थोड़े-से चावल रख देने का प्रस्ताव भी स्वीकृत हो गया।

        दोनों बच्चे बड़े चाव से काम करने लगें श्यामा मॉँ की आंख बचाकर मटके से चावल निकाल लायी। केशव ने पत्थर की प्याली का तेल चुपके से जमीन पर गिरा दिया और खूब साफ़ करके उसमें पानी भरा।

        अब चांदनी के लिए कपड़ा कहां से लाए ? फिर ऊपर बगैर छड़ियों के कपड़ा ठहरेगा कैसे और छड़ियां खड़ी होंगी कैसे ?

        केशव बड़ी देर तक इसी उधेड़-बुन में रहा। आखिरकार उसने यह मुश्किल भी हल कर दी। श्यामा से बोला—जाकर कूड़ा फेंकने वाली टोकरी उठा लाओ। अम्मांजी को मत दिखाना।

        श्यामा—वह तो बीच में फटी हुई है। उसमें से धूप न जाएगी ?

        केशव ने झुंझलाकर कहा—तू टोकरी तो ला, मै उसका सुराख बन्द करने की कोई हिकमत निकालूंगा।

        श्यामा दौड़कर टोकरी उठा लायी। केशव ने उसके सुराख में थोड़ा –सा कागज ठूँस दिया और तब टोकरी को एक टहनी से टिकाकर बोला—देख ऐसे ही घोंसले पर उसकी आड़ दूंगा। तब कैसे धूप जाएगी?

        श्यामा ने दिल में सोचा, भइया कितने चालाक हैं।

गर्मी के दिन थे। बाबूजी दफ्तर गए हुए थे। अम्मां दोनो बच्चों को कमरे में सुलाकर खुद सो गयी थीं। लेकिन बच्चों की आंखों में आज नींद कहां ? अम्माजी को बहकाने के लिए दोनों दम रोके आंखें बन्द किए मौके का इन्तजार कर रहे थे। ज्यों ही मालूम हुआ कि अम्मां जी अच्छी तरह सो गयीं, दोनों चुपके से उठे और बहुत धीरे से दरवाजे की सिटकनी खोलकर बाहर निकल आये। अण्डों की हिफाजत करने की तैयारियां होने लगीं। केशव कमरे में से एक स्टूल उठा लाया, लेकिन जब उससे काम न चला, तो नहाने की चौकी लाकर स्टूल के नीचे रखी और डरते-डरते स्टूल पर चढ़ा।

        श्यामा दोनों हाथों से स्टूल पकड़े हुए थी। स्टुल को चारों टागें बराबर न होने के  कारण जिस तरफ ज्यादा दबाव पाता था, जरा-सा हिल जाता था। उस वक्त केशव को कितनी तकलीफ उठानी पड़ती थी। यह उसी का दिल जानता था। दोनो हाथों से कार्निस पकड़ लेता और श्यामा को दबी आवाज से डांटता—अच्छी तरह पकड़, वर्ना उतरकर बहुत मारूँगा। मगर बेचारी श्यामा का दिल तो ऊपर कार्निस पर था। बार-बार उसका ध्यान उधर चला जाता और हाथ ढीले पड़ जाते।

        केशव ने ज्यों ही कार्निस पर हाथ रक्खा, दोनों चिड़ियां उड़ गयी । केशव ने देखा, कार्निस पर थोड़े-से तिनके बिछे हुए है, और उस पर तीन अण्डे पड़े हैं। जैसे घोंसले उसने पेड़ों पर देखे थे, वैसा कोई घोंसला नहीं है। श्यामा  ने नीचे से पूछा—कै बच्चे हैं भइया?

        केशव—तीन अण्डे हैं, अभी बच्चे नहीं निकले।

        श्यामा—जरा हमें दिखा दो भइया, कितने बड़े है ?

        केशव—दिखा दूंगा, पहले जरा चिथड़े ले आ, नीचे बिछा दूँ। बेचारे अंडे तिनकों पर पड़े है।

        श्यामा दौड़कर अपनी पुरानी धोती फाड़कर एक टुकड़ा लायी। केशव ने झुककर कपड़ा ले लिया, उसके कई तह करके उसने एक गद्दी बनायी और उसे तिनकों पर बिछाकर तीनों अण्डे उस पर धीरे से रख दिए।

        श्यामा ने फिर कहा—हमको भी दिखा दो भइया।

        केशव—दिखा दूँगा, पहले जरा वह टोकरी दे दो, ऊपर छाया कर दूँ।

        श्यामा ने टोकरी नीचे से थमा दी और बोली—अब तुम उतर आओ, मैं भी तो देखूं।

        केशव ने टोकरी को एक टहनी से टिकाकर कहा—जा, दाना और पानी की प्याली ले आ, मैं उतर आऊँ तो दिखा दूँगा।

        श्यामा प्याली और चावल भी लाची । केशव ने टोकरी के नीचे दोनों चीजें रख दीं और आहिस्ता से उतर आया।

        श्यामा ने गिड़गिड़ा कर कहा—अब हमको भी चढ़ा दो भइया

        केशव—तू गिर पड़ेगी ।

        श्यामा—न गिरूंगी भइया, तुम नीये से पकड़े रहना।

        केशव—न भइया, कहीं तू गिर-गिरा पड़ी तो अम्मां जी मेरी चटनी ही कर डालेंगी। कहेंगी कि तूने ही चढ़ाया था। क्या करेगी देखकर। अब अण्डे बड़े आराम से हैं। जब बच्चे निकलेगें, तो उनको पालेंगे।

        दोनों चिड़ियॉँ बार-बार कार्निस पर आती थीं और बगैर बैठे ही उड़ जाती थीं। केशव ने सोचा, हम लोगों के डर के मारे नहीं बैठतीं। स्टूल उठाकर कमरे में रख आया , चौकी जहां की थी, वहां रख दी।

        श्यामा ने आंखों में आंसू भरकर कहा—तुमने मुझे नहीं दिखाया, मैं अम्मां जी से कह दूँगी।

        केशव—अम्मां जी से कहेगी तो बहुत मारूँगा, कहे देता हूँ।

        श्यामा—तो तुमने मुझे दिखाया क्यों नहीं ?

        केशव—और गिर पड़ती तो चार सर न हो जाते।

        श्यामा—हो जाते, हो जाते। देख लेना मैं कह दूँगी।

        इतने में कोठरी का दरवाजा खुला और मां ने धूप से आंखें को बचाते हुए कहा- तुम दोनों बाहर कब निकल आए ? मैंने कहा था न कि दोपहर को न निकलना ? किसने किवाड़ खोला ?

        किवाड़ केशव ने खोला था, लेकिन श्यामा न मां से यह बात नहीं कही। उसे डर लगा कि भैया पिट जायेंगे। केशव दिल में कांप रहा था कि कहीं श्यामा कह न दे। अण्डे न दिखाए थे, इससे अब उसको श्यामा पर विश्वास न था श्यामा सिर्फ मुहब्बत के मारे चुप थी या इस क़सूर में हिस्सेदार होने की वजह से, इसका फैसला नहीं किया जा सकता। शायद दोनों ही बातें थीं।

        मॉँ ने दोनों को डॉँट-डपटकर फिर कमरे में बंद कर दिया और आप धीरे-धीरे उन्हें पंखा झलने लगी। अभी सिर्फ दो बजे थें बाहर तेज लू चल रही थी। अब दोनों बच्चों को नींद आ गयी थी।

चार बजे यकायक श्यामा की नींद खुली। किवाड़ खुले हुए थे। वह दौड़ी हुई कार्निस के पास आयी और ऊपर की तरफ ताकने लगी । टोकरी का पता न था। संयोग से उसकी नजर नीचे गयी और वह उलटे पांव दौड़ती हुई कमरे में जाकर जोर से बोली—भइया,अण्डे तो नीचे पड़े हैं, बच्चे उड़ गए!

        केशव घबराकर उठा और दौड़ा हुआ बाहर आया तो क्या देखता है कि तीनों अण्डे नीचे टूटे पड़े हैं और उनसे को चूने की-सी चीज बाहर निकल आयी है। पानी की प्याली भी एक तरफ टूटी पड़ी हैं।

        उसके चेहरे का रंग उड़ गया। सहमी हुई आंखों से जमीन की तरफ देखने लगा।

        श्यामा ने पूछा—बच्चे कहां उड़ गए भइया ?

        केशव ने करुण स्वर में कहा—अण्डे तो फूट गए ।

        ‘और बच्चे कहां गये ?’

        केशव—तेरे सर में। देखती नहीं है अण्डों से उजला-उजला पानी निकल आया है। वही दो-चार दिन में बच्चे बन जाते।

        मां ने सोटी हाथ में लिए हुए पूछा—तुम दोनो वहां धूप में क्या कर रहें हो ?

        श्यामा ने कहा—अम्मां जी, चिड़िया के अण्डे टूटे पड़े है।

        मां ने आकर टूटे हुए अण्डों को देखा और गुस्से से बोलीं—तुम लोगों ने अण्डों को छुआ होगा ?

        अब तो श्यामा को भइया पर ज़रा भी तरस न आया। उसी ने शायद अण्डों को इस तरह रख दिया कि वह नीचे गिर पड़े। इसकी उसे सजा मिलनी चाहिएं बोली—इन्होंने अण्डों को छेड़ा था अम्मां जी।

        मां ने केशव से पूछा—क्यों रे?

        केशव भीगी बिल्ली बना खड़ा रहा।

        मां—तू वहां पहुँचा कैसे ?

        श्यामा—चौके पर स्टूल रखकर चढ़े अम्मांजी।

        केशव—तू स्टूल थामे नहीं खड़ी थी ?

        श्यामा—तुम्हीं ने तो कहा था !

        मां—तू इतना बड़ा हुआ, तुझे अभी इतना भी नहीं मालूम कि छूने से चिड़ियों के अण्डे गन्दे हो जाते हैं। चिड़िया फिर इन्हें नहीं सेती।

        श्यामा ने डरते-डरते पूछा—तो क्या चिड़िया ने अण्डे गिरा दिए हैं, अम्मां जी ?

        मां—और क्या करती। केशव के सिर इसका पाप पड़ेगा। हाय, हाय, जानें ले लीं दुष्ट नें!

        केशव रोनी सूरत बनाकर बोला—मैंने तो सिर्फ अण्डों को गद्दी पर रख दिया था, अम्मा जी !

        मां को हंसी आ गयी। मगर केशव को कई दिनों तक अपनी गलती पर अफसोस होता रहा। अण्डों की हिफ़ाजत करने के जोश में उसने उनका सत्यानाश कर डाला। इसे याद करके वह कभी-कभी रो पड़ता था। दोनों चिड़ियां वहां फिर न दिखायी दीं। (साभार-खुलासाडॉटइन सहित कई अंतरजाल पर उपलब्ध)

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 हमारी गौरैया और इनवारमेंट वैरियर्स

Hamari Gauraiya and Environment Warriors

*सम्पादक -डॉ .लीना

*सहायक सम्पादक -निशांत रंजन

उद्देश्य

विश्व गौरैया दिवस: एक साझा संकल्प

20 मार्च 2010 को जब विश्व गौरैया दिवस की शुरुआत हुई, तो मकसद साफ था—इस नन्हीं जान को लुप्त होने से बचाना। इस मुहिम को मजबूती देते हुए दिल्ली सरकार ने 15 अगस्त 2012 और बिहार सरकार ने 16 अप्रैल 2013 को गौरैया को अपना राजकीय पक्षी घोषित किया। तब से लेकर आज तक, सरकारी संस्थाओं और निजी संगठनों के साझा प्रयासों से गौरैया की ‘घर वापसी’ का अभियान निरंतर जारी है।

घर-आँगन, खेत-खलिहान में चहकने-फुदकने वाली गौरैया की घटती संख्या को रोकना और उनकी आबादी को बढ़ाने के लिए एक सुरक्षित और अनुकूल वातावरण सुनिश्चित करना। उद्देश्य है सभी गौरैया संरक्षकों का …इसमें हमारी गौरैया और पर्यावरण योद्धा(Hamari Gauraiya and Environment Warriors) भी शामिल है।

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