पश्चिम चंपारण जिले के सिकटा प्रखंड की सुगहा भवानीपुर पंचायत में पर्यावरण संरक्षण की एक पहल अब जमीन पर दिखाई देने लगी है। सड़क के दोनों किनारों पर करीब 10 माह पहले लगाए गए लगभग 1,000 नीम के पौधे सामुदायिक सहयोग, नियमित देखभाल और लगातार निरीक्षण के कारण तेजी से विकसित हो रहे हैं। पौधों की बढ़ती हरियाली ने इस मार्ग को धीरे-धीरे ‘नीम कॉरिडोर’ का रूप देना शुरू कर दिया है।
इस पहल के पीछे मनरेगा अधिकारी अजय सहाय की भूमिका बताई जा रही है। पौधरोपण के बाद पौधों को उनके हाल पर छोड़ने के बजाय उनकी नियमित निगरानी, सिंचाई और सुरक्षा पर ध्यान दिया गया। यही वजह है कि शुरुआती पौधरोपण अब सड़क किनारे विकसित होती हरित पट्टी के रूप में नजर आने लगा है।
भीषण गर्मी में पौधों को बचाना बड़ी चुनौती
पौधे लगाना अपेक्षाकृत आसान है, लेकिन उन्हें प्रतिकूल मौसम से बचाकर पेड़ बनाना बड़ी चुनौती है। पश्चिम चंपारण में गर्मी और हीटवेव के दौरान तापमान बढ़ने से नए पौधों के सूखने का खतरा रहता है। ऐसे समय में नियमित सिंचाई और देखभाल बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। सुगहा भवानीपुर में लगाए गए नीम के पौधों को बचाने के लिए इसी पहलू पर विशेष ध्यान दिया गया।
पौधों की निगरानी के साथ जहां जरूरत पड़ी, वहां सिंचाई की व्यवस्था की गई। कमजोर या मृत पौधों की पहचान कर उनके स्थान पर दोबारा पौधरोपण करने की व्यवस्था भी इस तरह की हरित परियोजनाओं की सफलता के लिए महत्वपूर्ण है। स्थानीय लोगों की भागीदारी ने भी पौधों की सुरक्षा में मदद की है।
नीम से मिलेगी कई स्तरों पर पर्यावरणीय मदद
नीम भारतीय परिवेश में लंबे समय से महत्वपूर्ण वृक्ष माना जाता रहा है। इसकी छाया राहगीरों और स्थानीय लोगों को गर्मी से राहत देती है। बड़े होने पर सड़क के दोनों ओर खड़े नीम के पेड़ एक हरित गलियारे का स्वरूप ले सकते हैं, जिससे मार्ग का दृश्य भी बदलेगा और आसपास हरियाली बढ़ेगी।
पेड़ों की पत्तियों के माध्यम से होने वाला वाष्पोत्सर्जन और छायांकन स्थानीय स्तर पर गर्मी के प्रभाव को कम करने में योगदान दे सकता है। पेड़ों की जड़ें मिट्टी को बांधने और वर्षाजल के जमीन में समाने की प्रक्रिया में भी मदद करती हैं। हालांकि किसी एक पौधरोपण परियोजना को सीधे ‘ऑक्सीजन फैक्ट्री’ कहना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं होगा, लेकिन विकसित वृक्ष स्थानीय पारिस्थितिकी में कार्बन अवशोषण, वायु गुणवत्ता, छाया और जैव विविधता जैसे कई लाभ प्रदान करते हैं।नीम के पेड़ पक्षियों और अन्य छोटे जीवों के लिए भी आश्रय और भोजन की परिस्थितियां उपलब्ध करा सकते हैं। सड़क किनारे विकसित होती यह हरित पट्टी भविष्य में स्थानीय जैव विविधता के लिए उपयोगी आवास का काम कर सकती है।
पौधरोपण से ज्यादा जरूरी संरक्षण
सुगहा भवानीपुर का यह प्रयोग इस बात को रेखांकित करता है कि किसी भी पौधरोपण अभियान की सफलता केवल लगाए गए पौधों की संख्या से तय नहीं होती। असली उपलब्धि इस बात में है कि उनमें से कितने पौधे जीवित रहकर पेड़ बनते हैं। यदि पौधों की नियमित निगरानी, समय पर सिंचाई, सुरक्षा, खरपतवार नियंत्रण और मृत पौधों का पुनःरोपण जारी रहता है तो आने वाले वर्षों में यह मार्ग और अधिक घना और हरा दिखाई दे सकता है। इसके साथ स्थानीय लोगों को भी पौधों की सुरक्षा से जोड़ना इस अभियान को लंबे समय तक बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
सुगहा भवानीपुर का नीम कॉरिडोर इसलिए सिर्फ पौधरोपण अभियान नहीं, बल्कि पौधे से पेड़ और पेड़ से हरित विरासत बनाने की कोशिश के रूप में देखा जा सकता है। संदेश स्पष्ट है—‘पौधा लगाना शुरुआत है, उसे पेड़ बनाना ही वास्तविक सफलता है।’














