खुद से बनाएं गौरैया का घोंसला

संजय कुमार / गौरैया के लिए तरह-तरह के रंग-बिरंगे, साधारण-डिजाइनदार महंगे-सस्ते कृत्रिम घोंसला (60 रूपये से दो हजार रूपये तक) यों तो बाजार में मिल जाते हैं लेकिन खुद से भी बनाया जा सकता हैं। गौरैया का घोंसला बनाते समय सबसे जरूरी है कि वह गौरैया के लिए अनुकूल एवं सुरक्षित हो। कैसी लकड़ी लें?…

संजय कुमार / गौरैया के लिए तरह-तरह के रंग-बिरंगे, साधारण-डिजाइनदार महंगे-सस्ते कृत्रिम घोंसला (60 रूपये से दो हजार रूपये तक) यों तो बाजार में मिल जाते हैं लेकिन खुद से भी बनाया जा सकता हैं। गौरैया का घोंसला बनाते समय सबसे जरूरी है कि वह गौरैया के लिए अनुकूल एवं सुरक्षित हो। कैसी लकड़ी लें? यह अहम् है। सबसे अच्छी, 8-12 मिमी मोटी देसी लकड़ी (आम, शीशम आदि की बची हुई)। यह गर्मी में ठंडी और सर्दी में गर्म रहती है। गत्ते और प्लाईवुड भी ठीक है। 3 और 6 एमएम प्लाईवुड भी चलेगी, पर अंदर की तरफ जूट की बोरी चिपका सकते हैं ताकि गर्मी कम लगे। कुछ लोग बेकार जूतें, बांस, वेस्ट चमड़ा, सूखा कद्दू आदि का भी घोंसला बनांते हैं। प्लास्टिक की बोतल, लोहे का डिब्बा, बिस्किट का टिन का इस्तेमाल न करें। ये धूप में 50 डिग्री तक गर्म हो जाता है। मिट्टी की मटकी और गुल्लक बहुत अच्छा विकल्प है। आजकल बड़े पैमाने पर मिटटी के गुलक जैसा घोंसला प्रचालन में है।

वैसे प्लास्टिक के बोतल के अंदर जूट लगा कर भी घोंसला बनाया जाता हैं। नारियल के छिलके से भी बना घोंसला बाजार में बहुत मिलता है। बाजार में तरह-तरह के सुन्दर घोंसले उपलब्ध हैं। लेकिन गौरैया को जो पसंद आएगा उसी में जाती है । वैसे प्रकृतिक घोंसला उसे पसंद हैं। घोंसला को खुबसूरत बनाने के लिए रंग और कलाकृति बनाई जाती है। अगर हो सके तो रंगे नहीं खासकर अंदर। अगर बाहर का हिस्सा रंगते हैं तो भूरा या हरा रंग करें।   

घोंसला के लिए सही नाप जरुरी है। लंबाई: 20-25 सेमी,चौड़ाई: 15-18 सेमी,  ऊंचाई: 20-25 सेमी,प्रवेश द्वार: 3.1 से 3.5 सेमी गोल छेद में हो बेहतर होगा। यही सबसे जरूरी है। इतने में गौरैया आराम से घुसेगी, पर मैना, कौवा, तोता नहीं घुस पाएगा। हाँ, गिलहरी प्रवेश कर जाती है इसलिए जब घोंसला टाँगे तो आसपास कोई सहारा न दें। घोंसला बनाते समय जरूरी बातों पर ध्यान,जैसे  वेंटिलेशन दें । पीछे की तरफ ऊपर-नीचे 2-3 छोटे के छेद कर दें। हवा आती-जाती रहेगी। वैसे यह बहुत जरूरी नहीं, पर गर्मी वाले इलाके में फायदेमंद है। गौरैया अमूमन दीवार आदि के खोह में घोंसला बना लेती है जहाँ प्रवेश तो होता है लेकिन कोई वेंटिलेशन नहीं होता हैं। घोंसला का छत हमेशा ढलान वाली रखें और सामने की ओर 3-5 सेमी बाहर निकली हुई हो। इससे बारिश का पानी और सीधी धूप अंदर नहीं जाएगी। हालाँकि घोंसला लगते समय यह जरुरी है कि उस पर धूप न पड़े और न ही बारिश का पानी प्रवेश कर सकें। घोंसला के अंदर अंदर कुछ मत लगाएं। कुछ लोग पेंट, वार्निश करते हैं इससे बचे। गौरैया घोंसला बनाने के क्रम में खुद ही सूखी घास, कोमल तिनके आदि रखती है।

घोंसला लगते समय कहाँ और ऊंचाई का ध्यान रखने। जमीन से 8-10 फीट ऊंचाई पर लगायें। ऐसी जगह लगायें, जहाँ तेज़ धूप सीधे न पड़े। साथ ही घोंसला के पास कोई सहारा न दें नहीं तो बिल्ली गौरैया के बच्चे का शिकार बना लेगी। और हाँ,एक बार लगा दिया तो रोज-रोज जगह मत बदलिए। उसमें तक-झांक भी नहीं करें । धीरज रखें। घोंसला लगाने के बाद पास में पानी की कटोरी, दाना और थोड़े कंकड़-भूसे वाला छज्जा रख दें, गौरैया खुद-ब-खुद आ जाएगी। गौरैया के लिए घोंसला बनाने के लिए यहाँ डिजाइन दिया हुआ है:-

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संयोजक

 हमारी गौरैया और इनवारमेंट वैरियर्स

Hamari Gauraiya and Environment Warriors

*सम्पादक -डॉ .लीना

*सहायक सम्पादक -निशांत रंजन

उद्देश्य

विश्व गौरैया दिवस: एक साझा संकल्प

20 मार्च 2010 को जब विश्व गौरैया दिवस की शुरुआत हुई, तो मकसद साफ था—इस नन्हीं जान को लुप्त होने से बचाना। इस मुहिम को मजबूती देते हुए दिल्ली सरकार ने 15 अगस्त 2012 और बिहार सरकार ने 16 अप्रैल 2013 को गौरैया को अपना राजकीय पक्षी घोषित किया। तब से लेकर आज तक, सरकारी संस्थाओं और निजी संगठनों के साझा प्रयासों से गौरैया की ‘घर वापसी’ का अभियान निरंतर जारी है।

घर-आँगन, खेत-खलिहान में चहकने-फुदकने वाली गौरैया की घटती संख्या को रोकना और उनकी आबादी को बढ़ाने के लिए एक सुरक्षित और अनुकूल वातावरण सुनिश्चित करना। उद्देश्य है सभी गौरैया संरक्षकों का …इसमें हमारी गौरैया और पर्यावरण योद्धा(Hamari Gauraiya and Environment Warriors) भी शामिल है।

प्रधानमंत्री द्वारा गौरैया को संरक्षित करने को लेकर ‘मन की बात’ में कई बार सन्देश दिया गया हैं :- “विश्व गौरैया दिवस (20 मार्च) पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नन्हीं गौरैया को हमारे पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए उनके संरक्षण पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि शहरीकरण और प्रदूषण के कारण घटती इनकी संख्या पर्यावरण असंतुलन का संकेत है, इसलिए घरों में दाना-पानी रखकर और घोंसले बनाकर इनके प्रति स्नेह और जिम्मेदारी निभाएं।

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