डाक टिकट पर गौरैया की उड़ान

संजय कुमार / ‘विश्व गौरैया दिवस 20 मार्च 2010’ के मद्देनजर भारतीय डाक विभाग के द्वारा 9 जुलाई 2010 को विलुप्त होती गौरैया को संरक्षण देने और लोगों में जागरूकता को बढ़ावा देने के लिए डाक टिकट जारी किया था। यह डाक टिकट दो पक्षियों ‘गौरैया और रॉक कबूतर’ के सेट में जारी किया गया…

संजय कुमार / ‘विश्व गौरैया दिवस 20 मार्च 2010’ के मद्देनजर भारतीय डाक विभाग के द्वारा 9 जुलाई 2010 को विलुप्त होती गौरैया को संरक्षण देने और लोगों में जागरूकता को बढ़ावा देने के लिए डाक टिकट जारी किया था। यह डाक टिकट दो पक्षियों ‘गौरैया और रॉक कबूतर’ के सेट में जारी किया गया हैं। इस डाक टिकट का उद्देश्य लोगों को गौरैया एवं कबूतर के संरक्षण से जोड़ना है। गौरैया और  कबूतर भारतीय  संस्कृति और परंपराओं का हिस्सा रहे हैं। लोक कथा, लोक जीवन एवं साहित्य में इनसे जुड़ी कई कहानियां, कविताएँ व गीत है।

जबसे गौरैया विलुप्ति की ओर अग्रसर हुई है और पक्षी प्रेमी, वैज्ञानिकों एंव सरंक्षणविदों का ध्यान गौरैया की तरफ़ गया है। संरक्षण की गूंज हर ओर सुनाई पड़ने लगी है। नतीजतन इसके अध्ययन और सरंक्षण को लेकर लोग सजग हुए। पक्षी प्रेमी, वैज्ञानिकों एंव सरंक्षणविद सामने आये तो सरकारें भी जुडी। डाक विभाग ने गौरैया संरक्षण को लेकर लोगों को जागरूक करने के लिए डाक टिकट जारी कर महत्वपूर्ण सन्देश देने का काम किया है। डाक टिकट ‘गौरैया और रॉक कबूतर’ को एक साथ रखा गया है लेकिन दोनों टिकट को प्रयोग करने के दौरान अलग-अलग किया जा सकता है या फिर एक साथ भी अगर दस रूपये का टिकट लिफाफे पर लगाना हो तो लगा सकते हैं।

‘गौरैया और रॉक कबूतर’ दोनों इन्सान के घर या आसपास रहते हैं। इसलिए सन्देश को व्यापक बनाने के लिए विषयवस्तु का पूरा ख्याल रखा गया है। टिकट प्रस्तुति के पृष्टभूमि पर खपरैल का घर है। ऊपर कबूतर वाला टिकट है, नीचे गौरैया वाली। टिकट गौरैया पर फोकस है। बंद और खुली खिड़की, आंगन में पानी का बर्तन, बिखरा हुआ आनाज, गौरैया की पसंदीदा बोगनवेलिया का पेड़, घर के खोह में घोंसला और उसमें गौरैया के अंडे। मूल टिकट में नर मादा गौरैया को पानी के बर्तन पर बैठा दिखाया गया है। लेकिन, टिकट की प्रस्तुति को गौरैया के संरक्षण के ख्याल से संजोया गया है। यानि, गौरैया के सामने आहार, पानी और आवसीय संकट को रेखांकित किया गया है।

 डाक टिकट में एक नर और मादा गौरैया को एक घड़े पर बैठे हुए दर्शाया गया है, साथ ही जमीन पर पानी भरा सकोरा भी रखा है जो गौरैया के लिए पानी रखने का संकेत देता है। वहीँ, गौरैया के सामने आहार संकट को दूर करने के लिए अनाज भी रखने का सन्देश दिया गया है। टिकट प्रस्तुति पर जमीन पर अनाज डाला हुआ है और गौरैया जोड़ा दाना चुग रहा  है। तीसरा दृश्य अहम् है। इसमें आवासीय संकट को दिखाया गया है।

 गौरैया इन्सान के घर के अंदर-बाहर खिड़की, रौशनदान, फूस एवं खपरैल आदि से प्रवेश कर जहाँ जगह मिलता है वहीँ तिनका रख कर घोंसला बना लेती है। लेकिन बदलते परिवेश में हमने फूस एवं खपरैल घर की जगह कंक्रीट को अपना लिया खिड़की / रौशनदान को बंद कर दिया। घरों में गौरैया के प्रवेश पर रोक लग गयी। गौरैया के सामने आवासीय संकट खड़ा हो गया। डाक टिकट की प्रस्तुति पर घर की  बंद और खुली खिड़की के जरिये बताया गया है कि हम इन्सान ने घरों में रहने वाली गौरैया के लिए खिड़की दरवाजा को बंद कर दिया है उसे खोलना होगा। दीवार के खोह में गौरैया का घोंसला अंड्डे के साथ दिखाया गया है। गौरैया हमेशा घर में नहीं रहती वह पेड़/ पौधों खासकर बबूल, नीबू, समी, बोगनवेलिया आदि जिसमें कांटे एवं झाडीनुमा हो उस पर बैठती है। डाक टिकट की प्रस्तुति पर बोगनवेलिया का पेड़ है। कहा जा सकता है कि पूरी तरह से गौरैया संरक्षण को समर्पित है यह डाक टिकट जिसकी कीमत मात्र पाँच रुपये हैं। हालाँकि ये डाक भारत के सभी डाकघरों में नहीं मिलते।

 मूल गौरैया डाक टिकट की खोज बड़ी लंबी रही। पर्यावरण योद्धा की टीम द्वारा  लगभग पूरे देश मे खोजने का कार्य किया गया। इस टिकट के लिए गौरैया और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े पटना के निशांत रंजन पटना में, राहुल कुमार ने प्रयागराज के डाकघरों तथा डाक टिकट प्रदर्शनियों में खोजने का काम किया तो आकाश दत्त  ने दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में। राहुल  कुमार ने मुम्बई सर्किल में कोशिश की तो रवि राज ने राजस्थान के जैसलमेर और बीकानेर के पोस्ट ऑफिस की खाक छानी । गुजरात और बंगाल में भी हमारी लम्बी तलाश चली, लेकिन अंत में सफलता इंदौर, मध्यप्रदेश के एक क्राफ्ट की दुकान में हाथ लगी। वह भी 20 गुणा अधिक मूल्य पर। खोजबीन में हुआ ख़र्च अलग। निशांत रंजन ने दस रूपये के दोनों टिकट को रूपये 145 और  डाक खर्च रूपये 50 (कुल 205 रूपये) में मंगवाया। वे कहते हैं लेकिन, जब यह डाक टिकट हाथ में लिया तो सच में बहुत सकून मिला, ऐसा लगा कि कोई अनमोल वस्तु हाथ लगी हो। हमारे लिए तो सच में यह अनमोल था, क्योंकि हमारा काम लोगों तक गौरैया से जुड़ी हर एक छोटी छोटी बारीक़ बातों को पहुँचाना हैं, जिसमें यह एक महत्वपूर्ण कड़ी हैं। अगर उचित दाम में मिलता तो वे गौरैया वाले डाक टिकट लगे पत्रों को किसी को भेजते ताकि सरक्षण का सन्देश आगे जाता। डाक विभाग को समय समय पर यह देखना चाहिए कि ऐसे विषय से जुड़े टिकट देश के हर डाक घर में उपलब्ध हो।

गौरैया डाक टिकट को डाक विभाग ने लिफाफे / पोस्टकार्ड पर भी प्रयोग किया है। जहाँ एक ओर ई-मेल और मोबाइल ने पत्रों के चलन को काफ़ी हद तक कम सीमित कर दिया है फिर भी डाक का अपना बजूद अभी भी बना हुआ है। आज भी लोग डाक पत्र को लेकर संवेदनशील है। कई तो डाक टिकट संग्रह भी करते हैं। अगर आपको गौरैया डाक टिकट मिले तो अपने परिचित को खत जरुर लिखे ताकि गौरैया संरक्षण का सन्देश दूर दूर तक जाये तभी गौरैया डाक टिकट का मकसद पूरा होगा। यकीनन डाक टिकट के सन्देश को देख लोग दाना –पानी और आवासीय व्यवस्था के साथ गौरैया को थोड़ा सा प्यार देने की पहल करेंगे।

**

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

संयोजक

 हमारी गौरैया और इनवारमेंट वैरियर्स

Hamari Gauraiya and Environment Warriors

*सम्पादक -डॉ .लीना

*सहायक सम्पादक -निशांत रंजन

उद्देश्य

विश्व गौरैया दिवस: एक साझा संकल्प

20 मार्च 2010 को जब विश्व गौरैया दिवस की शुरुआत हुई, तो मकसद साफ था—इस नन्हीं जान को लुप्त होने से बचाना। इस मुहिम को मजबूती देते हुए दिल्ली सरकार ने 15 अगस्त 2012 और बिहार सरकार ने 16 अप्रैल 2013 को गौरैया को अपना राजकीय पक्षी घोषित किया। तब से लेकर आज तक, सरकारी संस्थाओं और निजी संगठनों के साझा प्रयासों से गौरैया की ‘घर वापसी’ का अभियान निरंतर जारी है।

घर-आँगन, खेत-खलिहान में चहकने-फुदकने वाली गौरैया की घटती संख्या को रोकना और उनकी आबादी को बढ़ाने के लिए एक सुरक्षित और अनुकूल वातावरण सुनिश्चित करना। उद्देश्य है सभी गौरैया संरक्षकों का …इसमें हमारी गौरैया और पर्यावरण योद्धा(Hamari Gauraiya and Environment Warriors) भी शामिल है।

प्रधानमंत्री द्वारा गौरैया को संरक्षित करने को लेकर ‘मन की बात’ में कई बार सन्देश दिया गया हैं :- “विश्व गौरैया दिवस (20 मार्च) पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नन्हीं गौरैया को हमारे पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए उनके संरक्षण पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि शहरीकरण और प्रदूषण के कारण घटती इनकी संख्या पर्यावरण असंतुलन का संकेत है, इसलिए घरों में दाना-पानी रखकर और घोंसले बनाकर इनके प्रति स्नेह और जिम्मेदारी निभाएं।“

हमारी पहल: पूर्णतः निस्वार्थ और जनहित में

यह वेबसाइट पूरी तरह से अवैतनिक,जनहित और सामाजिक सरोकार को समर्पित है। हमारा मंच किसी व्यक्ति या संगठन के लाभ के लिए नहीं, बल्कि केवल गौरैया और पर्यावरण संरक्षण की आवाज बनने के लिए है।

हमें आप लिख सकते हैं …आप हमें  📩 ईमेल करें: ilovesparrow68@gmail.com

🐦 आपकी भागीदारी जरूरी है: अगर आपके पास गौरैया और पर्यावरण संरक्षण संरक्षण से जुड़े अनुभव, प्रेरक कहानियाँ, कविताएँ, गीत या शोधपरक आलेख हैं, तो हमें ज़रूर भेजें।

www.ilovesparrow.com वेबसाईट का उद्देश्य साफ़ है घर -घर गौरैया संरक्षण की पहल हो..साथ ही पर्यावरण का भी संरक्षण हो।

सम्पादक : डॉ लीना, सहायक सम्पादक : निशांत रंजन