(अंतरराष्ट्रीय गिद्ध जागरूकता दिवस प्रतिवर्ष सितंबर के पहले शनिवार को दुनिया भर में मनाया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य पारिस्थितिकी तंत्र में गिद्धों के महत्व के प्रति लोगों को जागरूक करना और उनके संरक्षण को बढ़ावा देना है।)
संजय कुमार / देश में पक्षियों के कई प्रकार की प्रजातियों पर संकट मंडराने की चिंता पर्यावरणविदों की ओर से समय समय पर आती रहती हैI आसमान में मंडराने वाले गिद्ध भी इनमें शामिल हैI जो अब बहुत कम दिखते हैंI गिद्ध विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गए हैं और भारत में गिद्धों की स्थिति चिंताजनक है I ऐसे में गिद्धों का संरक्षण का सवाल खड़ा होना लाजमी है I गिद्धों को संरक्षित करने की दिशा में भारत सरकार आगे आ भी चुकी है I सरकार ने वर्ष 2006 से ही इस दिशा में कारगर कदम उठाए हैं I गिद्धों की चिंताजनक स्थित्ति, मंथन वाला सवाल हैI ऐसा क्यों हो रहा है? इस पर पर्यावरणविदों का मंथन जारी है, ताकि विलुप्त होते गिद्ध को बचाने के लिए सही कदम उठाया जा सकें I वैसे गिद्धों की संख्या को बढाने और संरक्षण के लिए भारत सरकार ने 2020-2025 तक का एक प्लान भी बनाया हैI 16 नवंबर, 2020 को केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने गिद्धों के संरक्षण के लिए “भारत में गिद्ध संरक्षण के लिए कार्य योजना-2020-2025” शुरू कीI वहीँ राज्यों में भी पहल हो रही है ‘सेव वल्चर जोन’ बनाये जा रहे हैंI हालांकि कई राज्यों में ‘सेव वल्चर जोन’ अभी बनना बाकी हैI
कभी गांवों, कस्बों और जंगलों के आसमान में झुंड के झुंड मंडराते गिद्ध भारत के प्राकृतिक परिदृश्य का अभिन्न हिस्सा हुआ करते थे। किसी पशु की मृत्यु होते ही कुछ ही समय में गिद्धों का झुंड वहां पहुंच जाता था। वे मृत पशुओं के शवों को खाकर प्रकृति की सफाई करते और संक्रमण तथा बीमारियों के फैलाव को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। लेकिन आज वही गिद्ध कई इलाकों से लगभग गायब हो चुके हैं। इनके संरक्षण को लेकर चिंता इसलिए भी गंभीर है क्योंकि भारत में गिद्धों की कई प्रजातियां अभी भी बेहद कम संख्या में बची हैं।
गिद्ध केवल एक पक्षी नहीं, बल्कि पारिस्थितिकी तंत्र के महत्वपूर्ण सफाईकर्मी हैं। खुले में पड़े पशु शवों के तेजी से निस्तारण में उनकी भूमिका अहम है। गिद्धों की संख्या में गिरावट का असर केवल जैव विविधता पर नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ सकता है। बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी के अनुसार गिद्ध हर साल लाखों टन मृत जैविक पदार्थ का निस्तारण करते हैं।
गिद्धों की नौ प्रजातियां, कई गंभीर संकट में
भारत में गिद्धों की नौ प्रजातियां दर्ज की गई हैं। इनमें व्हाइट-रम्प्ड यानी ओरिएंटल व्हाइट-बैक्ड गिद्ध, इंडियन यानी लॉन्ग-बिल्ड गिद्ध, स्लेंडर-बिल्ड गिद्ध, रेड-हेडेड गिद्ध, इजिप्शियन गिद्ध, हिमालयन गिद्ध, बेयर्डेड गिद्ध, सिनेरियस गिद्ध और यूरेशियन ग्रिफॉन शामिल हैं। इनमें तीन प्रजातियां—व्हाइट-रम्प्ड, इंडियन और स्लेंडर-बिल्ड गिद्ध—वैश्विक स्तर पर गंभीर रूप से संकटग्रस्त हैं। रेड-हेडेड गिद्ध भी इसी श्रेणी में है, जबकि इजिप्शियन गिद्ध संकटग्रस्त श्रेणी में है। हिमालयन, बेयर्डेड और सिनेरियस गिद्धों की वैश्विक स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर है, लेकिन वे भी संरक्षण चिंता से बाहर नहीं हैं।
जहाँ तक गिद्धों की संख्या का सवाल है तोभारतीय वन्यजीव संस्थान के 2025 के अखिल भारतीय आकलन के अनुसार, देश में संकटग्रस्त गिद्धों की स्थिति बेहद चिंताजनक है। सर्वेक्षण में भारतीय गिद्ध के प्रजनन करने वाले वयस्कों की संख्या न्यूनतम 2,058 से अधिकतम 2,758 आंकी गई, जबकि सफेद-पीठ वाले गिद्ध के केवल 1,780 से 1,890 प्रजनन वयस्क पाए गए। स्लेंडर-बिल्ड गिद्ध की स्थिति और गंभीर है—सर्वेक्षण में महज 20 सक्रिय घोंसले मिले। यह आंकड़े बताते हैं कि कभी आसमान में बड़ी संख्या में दिखाई देने वाला गिद्ध अब अस्तित्व के गंभीर संकट से गुजर रहा है।
भारत के पक्षियों की स्थिति 2025 के अद्यतन आंकड़े बताते हैं कि संकट अभी टला नहीं है। भारतीय गिद्ध की दीर्घकालिक आबादी में करीब 93.91 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है और उसकी मौजूदा वार्षिक प्रवृत्ति भी गिरावट की ओर है। व्हाइट-रम्प्ड गिद्ध की दीर्घकालिक गिरावट करीब 97.06 प्रतिशत बताई गई है। इजिप्शियन गिद्ध की दीर्घकालिक गिरावट भी करीब 81.33 प्रतिशत दर्ज की गई है। ये आंकड़े इस बात की चेतावनी हैं कि गिद्ध संरक्षण में थोड़ी भी ढिलाई इन प्रजातियों को फिर गंभीर संकट की ओर धकेल सकती है।
2023-25 का पहला अखिल भारतीय आकलन नई तस्वीर दिखाता है

गिद्ध संरक्षण के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि भारत में किया गया 2023-25 का अखिल भारतीय गिद्ध आबादी आकलन है। भारतीय वन्यजीव संस्थान की इस व्यापक पहल में पहली बार देशभर में चार गंभीर रूप से संकटग्रस्त निवासी प्रजनन प्रजातियों—व्हाइट-रम्प्ड, इंडियन, स्लेंडर-बिल्ड और रेड-हेडेड गिद्ध—के प्रजनन वयस्कों का व्यवस्थित आकलन किया गया। इस अध्ययन में 17 राज्यों के 216 स्थलों पर 2,410 घोंसले दर्ज किए गए, जिनमें 1,994 सक्रिय घोंसले थे। भारतीय गिद्ध के 110 स्थलों पर 1,379 घोंसले दर्ज किए गए। इसके आधार पर भारतीय गिद्ध के प्रजनन वयस्कों की न्यूनतम संख्या 2,058 और अधिकतम 2,758 आंकी गई। वहीं व्हाइट-रम्प्ड गिद्ध के 12 राज्यों में 945 घोंसले दर्ज हुए और इसके प्रजनन वयस्कों की संख्या कम से कम 1,780 से अधिकतम 1,890 आंकी गई।
यह आकलन पुराने अनुमानों से अलग पद्धति पर आधारित है। इसलिए 2017 में उपलब्ध कराए गए तीन प्रजातियों के पुराने अनुमान—लॉन्ग-बिल्ड 26,500, स्लेंडर-बिल्ड 1,000 और व्हाइट-बैक्ड 6,000—को वर्तमान राष्ट्रीय आबादी का आंकड़ा मानना उचित नहीं होगा। सरकार ने भी संसद में स्पष्ट किया था कि अलग-अलग राज्यों में किए जाने वाले गिद्ध आकलन एक समान राष्ट्रीय डेटाबेस में समेकित नहीं थे।
डाइक्लोफिनेक ने मचाई सबसे बड़ी तबाही
भारत में गिद्धों की ऐतिहासिक गिरावट के सबसे बड़े कारणों में पशुओं के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दर्द निवारक दवा डाइक्लोफिनेक रही है। 1990 के दशक में गिद्धों की संख्या में असाधारण तेजी से गिरावट दर्ज की गई। बाद के वैज्ञानिक अध्ययनों ने पशुओं में इस्तेमाल होने वाले डाइक्लोफिनेक को इस विनाशकारी गिरावट से जोड़ा। डाइक्लोफिनेक से उपचारित पशु की मृत्यु के बाद जब उसका शव गिद्ध खाते हैं तो दवा के अवशेष उनके शरीर में पहुंच जाते हैं। इससे गिद्धों में गुर्दे की गंभीर समस्या और अंततः मृत्यु हो सकती है। इस संकट को देखते हुए भारत सरकार ने 2006 में पशु चिकित्सा में डाइक्लोफिनेक के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाया। यह भारत के गिद्ध संरक्षण अभियान में महत्वपूर्ण मोड़ था। लेकिन खतरा यहीं समाप्त नहीं हुआ। पशु चिकित्सा में इस्तेमाल होने वाली दूसरी गैर-स्टेरॉयडल एंटी-इंफ्लेमेटरी दवाओं यानी एनएसएआईडी को लेकर भी वैज्ञानिकों ने चिंता जताई है।
बीएनएचएस की 2024-25 की रिपोर्ट में हरियाणा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और चंडीगढ़ की 115 दवा दुकानों के सर्वेक्षण में पाया गया कि एनएसएआईडी रखने वाली दुकानों में बड़ी संख्या में गिद्धों के लिए संभावित रूप से जहरीली दवाएं उपलब्ध थीं। सर्वेक्षण में डाइक्लोफिनेक के अलावा एसीक्लोफिनेक और निमेसुलाइड की उपलब्धता भी सामने आई। इसके विपरीत, गिद्धों के लिए सुरक्षित मानी जाने वाली मेलॉक्सिकैम अपेक्षाकृत कम दुकानों पर उपलब्ध थी।
इसलिए विशेषज्ञों की चिंता अब केवल डाइक्लोफिनेक तक सीमित नहीं है। पशुओं के इलाज में इस्तेमाल होने वाली हर ऐसी दवा की निगरानी जरूरी है जो गिद्धों के लिए विषाक्त साबित हो सकती है।
वाइल्ड लाइफ ट्रस्ट ऑफ़ इण्डिया के संरक्षण प्रमुख डॉ.समीर कुमार सिन्हा कि माने तो बिहार के अलावे भी देश के कई राज्यों – खासकर असम में जहरीले कीटनाशकों के कारण भी बड़ी संख्या में गिद्ध मारे जाते हैंI ग्रामीण इलाकों में गाय-भैंस मर जाती है तो ग्रामीण जागरूकता के अभाव में चमड़ा निकलवा कर पशु शव पर कीटनाशक छिड़क देते हैंI कीटनाशक से संदूषित मांस खाने से गिद्ध या तो दम तोड़ देते हैं या फिर बेहोश हो जाते हैं तब उनके ऊपर कुत्ते जैसे हमलावर पशु हमला कर देते हैंI इस कारण गिद्धों के झुंडों का भी सफाया हो जाता हैI
बिहार में गिद्ध मुख्यतः पश्चिमी चंपारण के वाल्मीकि टाइगर रिजर्व एवं नेपाल से सटे क्षेत्रों में दिखाई देते हैंI डॉ. सिन्हा बताते हैं कि अति-संकटग्रस्त प्रजाति के गिद्ध जैसे – ओरिएंटल व्हाइट-बैकऔर स्लेंडर-बिल्डगिद्ध केवल वाल्मीकि के आस-पास के क्षेत्र में दिखाई देते हैं, जबकि अन्य क्षेत्रों में इजिप्शियन और हिमालयन ग्रिफन दिखाई देते हैं जिनकी स्थिति बेहतर हैI गिद्धों के संरक्षण के लिए ‘वल्चर सेफ ज़ोन’ की अवधारणा विकसित की गई हैI ये जोन पूरी तरह से डाईक्लोफिनेक रहित क्षेत्र होने के साथ ही साथ गिद्धों को अन्य खतरों से भी बचाते हैंI डॉ.सिन्हा बताते हैं कि बिहार के उत्तर में नेपाल तथा दक्षिण में झारखंड गिद्धों के लिए ‘वल्चर सेफ जोन’ हैंI बिहार में ऐसी व्यवस्था नहीं होने से हिमालय की तराई से दक्षिण की ओर प्रवास करने वाले गिद्धों पर डाईक्लोफिनेक और अन्य खतरे मंडराते हैं जिससे गिद्धों का संरक्षण सवालों के घेरे में हैI डॉ. सिन्हा मानते हैं कि नेपाल से बिहार होते झारखंड जाने के क्रम में हिमालयन गिद्धों को जो भी आहार मिलता है वह डाईक्लोफिनेक और कीटनाशकों से सुरक्षित है या नहीं इसका पता नहीं हैI इधर,11 फ़रवरी 2021 को बिहार के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग के मंत्री नीरज कुमार सिंह ने गिद्ध संरक्षण के लिए सुपौल जिले में गिद्ध संरक्षण क्षेत्र को विकसित करने के लिए सुयोग्य जमीन की खोज के लिए विभाग को निर्देश दिया हैंI
कीटनाशक और जहरीले शव भी बड़ा खतरा
गिद्धों के लिए दूसरा बड़ा खतरा जहरीले पशु शव हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में कई बार मृत पशुओं के शवों पर कीटनाशक या अन्य जहरीले रसायन डाल दिए जाते हैं। ऐसे शवों को खाने वाले गिद्धों के शरीर में विष पहुंच सकता है। कई बार गिद्ध जहरीला मांस खाने के बाद बेहोश अथवा कमजोर हो जाते हैं और उस अवस्था में कुत्तों तथा अन्य शिकारी जानवरों का शिकार बन जाते हैं। इस तरह एक जहरीला शव एक साथ कई गिद्धों की जान ले सकता है। यही कारण है कि गिद्ध संरक्षण के लिए केवल पक्षियों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। उनके भोजन को सुरक्षित बनाना भी उतना ही जरूरी है।
ट्रेन, बिजली की लाइन और आवास का संकट
गिद्धों के सामने खतरे अब दवाओं और जहर तक सीमित नहीं हैं। खुले क्षेत्र, पुराने पेड़, चट्टानी प्रजनन स्थल और सुरक्षित भोजन की उपलब्धता घटने से उनके प्राकृतिक आवास पर भी दबाव बढ़ रहा है।
बड़ी बिजली की लाइनों से टकराव और करंट लगने की घटनाएं भी बड़े शिकारी पक्षियों के लिए खतरा हैं। सड़क और रेल दुर्घटनाओं में मारे गए पशुओं के शव खाने के लिए गिद्ध जब रेलवे ट्रैक अथवा सड़क किनारे पहुंचते हैं तो वे स्वयं भी दुर्घटना का शिकार हो सकते हैं। 2020-25 की राष्ट्रीय कार्ययोजना में भी बिजली की लाइनों से टकराव और अन्य उभरते खतरों की निगरानी तथा राष्ट्रीय स्तर पर उनका डेटाबेस तैयार करने की जरूरत रेखांकित की गई थी। गिद्धों को नुक़सान ट्रेनों से भी हो रहा है।कई बार ट्रेन की चपेट में आने से जब पशु मर जाते हैं तब उनके शव को खाने के लिये गिद्ध आते है और फिर जब दूसरी ट्रेन गुजरती तब वे ट्रेन की चपेट में आ जाते हैं और घायल या मारे जाते हैं। नेचर क्लब फ़ाउंडेशन ने 21 फ़रवरी 21 को फ़ेसबुक पेज पर जानकारी दी है कि गोण्डा रेलवे स्टेशन पर दो दिन से पड़ा एक घायल गिद्ध मिली । सूचना मिलते ही वन विभाग पहुँचाया। इस गिद्ध को कोई ट्रेन बरुआचक रेलवे स्टेशन से फ़ंसा कर गोण्डा रेलवे स्टेशन ले आयी थी। बरुआचक रेलवे स्टेशन के पास पिछले सप्ताह ही आठ गिद्ध ट्रेन की टक्कर से मारे गये थे।
वल्चर सेफ जोन उम्मीद की किरण
गिद्धों को बचाने के लिए देश में वल्चर सेफ जोन विकसित करने की अवधारणा महत्वपूर्ण है। इसका उद्देश्य गिद्धों की प्रमुख कॉलोनियों के आसपास ऐसे क्षेत्र विकसित करना है जहां पशु शवों में जहरीली दवाओं की मौजूदगी न्यूनतम हो और गिद्धों को पर्याप्त तथा सुरक्षित भोजन मिल सके। राष्ट्रीय कार्ययोजना में प्रत्येक राज्य में कम से कम एक वल्चर सेफ जोन विकसित करने का लक्ष्य रखा गया था। आम तौर पर प्रमुख गिद्ध कॉलोनी के आसपास लगभग 100 किलोमीटर के दायरे में पशु चिकित्सा दवाओं की निगरानी, जागरूकता और सुरक्षित शव प्रबंधन जैसे उपायों पर जोर दिया गया। यह मॉडल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि गिद्ध एक जगह सीमित नहीं रहते। वे भोजन की तलाश में लंबी दूरी तय करते हैं। इसलिए केवल घोंसले वाले स्थान को सुरक्षित करना पर्याप्त नहीं, बल्कि उनके पूरे भोजन और आवास क्षेत्र को सुरक्षित करना जरूरी है।
सरकार ने 2006 से शुरू किया संरक्षण अभियान
भारत सरकार ने वर्ष 2006 में गिद्ध संरक्षण के लिए राष्ट्रीय कार्ययोजना शुरू की थी। इसके बाद गिद्ध संरक्षण प्रजनन कार्यक्रम को आगे बढ़ाया गया। गंभीर रूप से संकटग्रस्त प्रजातियों को कृत्रिम प्रजनन के माध्यम से सुरक्षित रखने के साथ भविष्य में उन्हें सुरक्षित प्राकृतिक आवास में छोड़ने की दिशा में काम किया गया। बाद में नवंबर 2020 में गिद्ध संरक्षण के लिए कार्य योजना 2020-2025 शुरू की गई। इसमें गिद्धों को जहरीली पशु-चिकित्सा दवाओं से बचाने, नए गिद्ध संरक्षण प्रजनन केंद्र स्थापित करने, वल्चर सेफ जोन विकसित करने, लाल सिर वाले और इजिप्शियन गिद्धों के संरक्षण प्रजनन तथा देश के विभिन्न हिस्सों में बचाव केंद्र स्थापित करने जैसे उपाय शामिल थे। इस योजना की अवधि 2025 में समाप्त हो चुकी है। इसलिए अब चुनौती यह है कि इसके अनुभवों और 2023-25 के अखिल भारतीय आकलन से मिली जानकारी के आधार पर अगले चरण की राष्ट्रीय रणनीति को और मजबूत किया जाए। वर्तमान में मंत्रालय की वेबसाइट पर भी 2020-2025 की कार्ययोजना को ही प्रमुख राष्ट्रीय योजना के रूप में सूचीबद्ध किया गया है।
प्रजनन केंद्रों से मिली उम्मीद
भारत में गिद्ध संरक्षण प्रजनन कार्यक्रम के तहत कई केंद्र स्थापित किए गए हैं। इनमें हरियाणा के पिंजौर, पश्चिम बंगाल के राजाभातखावा, असम के रानी और मध्य प्रदेश के भोपाल जैसे केंद्र महत्वपूर्ण हैं। इन केंद्रों में गंभीर रूप से संकटग्रस्त गिद्धों का संरक्षण प्रजनन किया जा रहा है। BNHS के अनुसार इन केंद्रों पर 2019 तक 600 से अधिक गिद्धों को सफलतापूर्वक पाला जा चुका था। हालांकि विशेषज्ञों के लिए असली चुनौती कैद में गिद्धों की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि जंगल में उनके लिए सुरक्षित परिस्थितियां बनाना है। यदि जिस पर्यावरण में इन पक्षियों को छोड़ा जाना है वहां जहरीली दवाएं और भोजन मौजूद रहेंगे, तो प्रजनन केंद्रों की मेहनत भी अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाएगी।
उत्तर भारत में स्थिति अब भी चिंता का विषय
गिद्धों के लिए उत्तर भारत विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। हिमालय की तराई से लेकर गंगा के मैदानों और मध्य भारत तक कई प्रजातियों के आवास और भोजन क्षेत्र फैले हुए हैं। स्टेट ऑफ़ इंडिया बर्ड 2025 के आंकड़े बताते हैं कि भारतीय और व्हाइट-रम्प्ड गिद्ध जैसे गंभीर रूप से संकटग्रस्त पक्षियों की दीर्घकालिक स्थिति अभी भी तेजी से गिरावट वाली है। उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में गिद्ध संरक्षण के लिए सुरक्षित भोजन, पशु चिकित्सा दवाओं की निगरानी और घोंसले वाले क्षेत्रों की सुरक्षा बेहद जरूरी है। बीएनएचएस के हालिया सर्वेक्षण में उत्तराखंड और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मानव उपयोग वाली दवाओं के पशु चिकित्सा उपयोग की आशंका भी सामने आई है, जो निगरानी की जरूरत को रेखांकित करती है।
गिद्ध बचेंगे तभी प्रकृति की सफाई व्यवस्था बचेगी
गिद्धों की कहानी केवल किसी एक पक्षी की कहानी नहीं है। यह मनुष्य और प्रकृति के बीच उस संबंध की कहानी है जिसमें एक पक्षी बिना किसी लागत के मृत पशुओं का निस्तारण करता है और पर्यावरण को स्वच्छ रखने में योगदान देता है। आज आवश्यकता है कि गिद्ध संरक्षण को केवल वन विभाग या वन्यजीव विशेषज्ञों तक सीमित न रखा जाए। पशुपालकों, पशु चिकित्सकों, दवा विक्रेताओं, स्थानीय समुदायों, नगर निकायों, रेलवे और बिजली विभागों को भी इस अभियान का हिस्सा बनाना होगा। सबसे जरूरी है कि गिद्धों के लिए सुरक्षित भोजन सुनिश्चित हो। पशुओं के इलाज में केवल गिद्ध-सुरक्षित दवाओं को बढ़ावा दिया जाए, जहरीली दवाओं की बिक्री और दुरुपयोग पर प्रभावी निगरानी हो, मृत पशुओं के शवों पर जहरीले रसायन न डाले जाएं और गिद्धों के प्रजनन तथा भोजन क्षेत्रों को सुरक्षित रखा जाए।
गिद्धों की वापसी संभव है, लेकिन इसके लिए आसमान में मंडराते इन सफाईकर्मियों के लिए जमीन पर सुरक्षित दुनिया बनानी होगी। यदि समय रहते उनके भोजन, आवास और प्रजनन स्थलों को सुरक्षित नहीं किया गया तो आने वाली पीढ़ियां गिद्धों को खुले आसमान में नहीं, केवल किताबों और तस्वीरों में देख पाएंगी। गिद्धों को बचाना केवल एक पक्षी को बचाना नहीं, बल्कि प्रकृति की उस सफाई व्यवस्था को बचाना है जिस पर मानव जीवन भी निर्भर है।
अंतरराष्ट्रीय गिद्ध जागरूकता दिवस
अंतरराष्ट्रीय गिद्ध जागरूकता दिवस प्रतिवर्ष सितंबर के पहले शनिवार को दुनिया भर में मनाया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य पारिस्थितिकी तंत्र में गिद्धों के महत्व के प्रति लोगों को जागरूक करना और उनके संरक्षण को बढ़ावा देना है। अंतरराष्ट्रीय गिद्ध दिवस मनाये जाने के पीछे वजह साफ़ है। गिद्धों को ‘प्रकृति का सफाईकर्मी’ कहा जाता है। ये मृत मवेशियों और जानवरों के शवों को खाकर पर्यावरण को स्वच्छ रखते हैं। इस दिन का उद्देश्य दुनिया के सबसे संकटग्रस्त पक्षी समूह के बारे में जागरूकता बढ़ाना और साथ ही हमारे पारिस्थितिक तंत्र में उनके महत्व को मनाना है। गिद्धों की छवि बेवजह खराब है। मृत्यु और लालच से जुड़े होने के कारण, कई लोग उन्हें क्रूर, गंदे और बदसूरत प्राणी मानते हैं। लोकप्रिय संस्कृति भी उन्हें उतना ही नकारात्मक रूप से देखती है, अक्सर उन्हें खलनायक की भूमिकाओं में चित्रित करती है। “गिद्धों की तरह मंडराना” या “संस्कृति का गिद्ध” जैसे आम मुहावरों के भी नकारात्मक अर्थ होते हैं।
सच तो यह है कि ये अद्भुत पक्षी प्राकृतिक जगत के गुमनाम नायक हैं। ये एकमात्र ऐसे स्थलीय जीव हैं जो पूरी तरह से मृत जानवरों का मांस खाते हैं, जिसका अर्थ है कि मृत जानवरों का मांस उनके आहार का मुख्य आधार है, और इस विशेषता के साथ कुछ महत्वपूर्ण पारिस्थितिक सेवाएं भी जुड़ी हुई हैं, जैसे कि बीमारियों के प्रसार को कम करना, मानव और आर्थिक स्वास्थ्य की रक्षा करना और जलवायु परिवर्तन को धीमा करना। दुर्भाग्यवश, गिद्धों को हमारी मदद की ज़रूरत है। हमारे पारिस्थितिक तंत्र के स्वास्थ्य की रक्षा के लिए, हमें गिद्धों के लिए आवाज उठानी होगी। और,इसके संरक्षण के लिए आगे आना होगा।
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