गौरैया ख़ुद तय करती है कहाँ रहना है उसे

संजय कुमार / सारण जिले के गरखा में सैकड़ों की तादाद में गौरैया का होना लोगों को चौंकाता है। क्योंकि इस इलाके में गौरैया संरक्षण को लेकर न तो कृत्रिम घोंसला है और न ही दानाघर लगा हुआ है और न ही कोई अभियान। गौरैया ग्रामीण परिवेश में रह रही है, जहाँ उसे प्रकृति से…

संजय कुमार / सारण जिले के गरखा में सैकड़ों की तादाद में गौरैया का होना लोगों को चौंकाता है। क्योंकि इस इलाके में गौरैया संरक्षण को लेकर न तो कृत्रिम घोंसला है और न ही दानाघर लगा हुआ है और न ही कोई अभियान। गौरैया ग्रामीण परिवेश में रह रही है, जहाँ उसे प्रकृति से आवास और आहार-पानी मिल रहा है। गरखा के मिथलेश जी बताते हैं, उनके घर के आसपास दो सौ से ज़्यादा गौरैया रहती है। घर के पास बांस का भरपूर पेड़ और पास में छोटा सा पोखर जो के मौजूद रहने से गौरैया के सामने आवास और आहार-पानी की समस्या नहीं है। खेत-खलिहान होने से आहार भी सहज मिल जाता है।

केवल गरखा ही नहीं अभी भी कई गांव-शहर हैं जहाँ गौरैया प्राकृतिक रूप से रह रही हैं। उसे कृत्रिम घोंसला और दाना घर की जरूरत नहीं। यह सच भी है गौरैया पहले प्राकृतिक परिवेश को चुनती है। प्रकृति के संग रहना उसे अच्छा लगता है। गरखा गांव में बांस के घने पेड़ उसे पूरी सुरक्षा देते हैं। गरखा के अलावे दियारा और उतर बिहार के खेतों में उगने वाले झाड़ी/ कांस के घास को गौरैयों ने बसेरा बनाये रखी हैं।

गौरैया को प्रकृति वाला माहौल सबसे ज्यादा अच्छा लगता है। पेड़-पौधे और झाड़ियां घोंसला बनाने के लिए, छिपने के लिए और शिकारी से बचने के लिए अहम  होता है। नीम, पीपल, बोगनवेलिया की झाड़ियां गौरैया की फेवरेट जगहों  में से हैं। घास और बीज गौरैया को खेत, बगीचे, घास के मैदान – यहां उसे खाने के लिए बीज, कीड़े और घास मिल जाते।

एक ओर जहाँ हम कहते हैं कंक्रीट के जंगल, मोबाइल टावर का रेडिएशन, पेड़ कटना और कीटनाशक की वजह से गौरैया को अपना “प्राकृतिक घर” नहीं मिल पा रहा। लेकिन, देखें तो कई शहर-गांव की इस तस्वीर के बीच गौरैया मौजूद है, तो कहीं नहीं। पूरे मामले में गौरैया ख़ुद तय करती है कि उसे कहाँ रहना है लेकिन एक बात तय है वहीं जाती है जहाँ इंसान हो, आहार-पानी हो, सुरक्षित आवास हो। तभी तो कंक्रीट के जंगल यानी मोहल्लों/ घरों के बीच रहती है। जहाँ न पेड़ हैं न उसके अनुकूल परिवेश ? शोध का विषय है और देखें तो साफ़ है गौरैया को परिवेश पसंद है तो रहेगी, नहीं तो नहीं। कई लोगों ने कृत्रिम घोंसला लगाया लेकिन गौरैया नहीं आई। कई ने लगाया और गौरैया आई। वजह साफ़ है जहाँ इन्सान रहे गौरैया जरुर रहने आती है। प्रकृति से जुड़कर ही गौरैया खुश रहती है, और गौरैया के चहकने से हमारी सुबह खुशनुमा हो जाती है।

गौरैया जो करे करने दीजिये । घर आँगन से गायब गौरैया की घर वापसी पहल अभियान चलते रहना चाहिये । दाना-पानी रखने,घोंसला-पेड़ लगाने और थोडा सा प्यार देना रुकना नहीं चाहिये क्योंकि कई जगहों पर प्रयास से तस्वीर बदली है ।

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संयोजक

 हमारी गौरैया और इनवारमेंट वैरियर्स

Hamari Gauraiya and Environment Warriors

*सम्पादक -डॉ .लीना

*सहायक सम्पादक -निशांत रंजन

उद्देश्य

विश्व गौरैया दिवस: एक साझा संकल्प

20 मार्च 2010 को जब विश्व गौरैया दिवस की शुरुआत हुई, तो मकसद साफ था—इस नन्हीं जान को लुप्त होने से बचाना। इस मुहिम को मजबूती देते हुए दिल्ली सरकार ने 15 अगस्त 2012 और बिहार सरकार ने 16 अप्रैल 2013 को गौरैया को अपना राजकीय पक्षी घोषित किया। तब से लेकर आज तक, सरकारी संस्थाओं और निजी संगठनों के साझा प्रयासों से गौरैया की ‘घर वापसी’ का अभियान निरंतर जारी है।

घर-आँगन, खेत-खलिहान में चहकने-फुदकने वाली गौरैया की घटती संख्या को रोकना और उनकी आबादी को बढ़ाने के लिए एक सुरक्षित और अनुकूल वातावरण सुनिश्चित करना। उद्देश्य है सभी गौरैया संरक्षकों का …इसमें हमारी गौरैया और पर्यावरण योद्धा(Hamari Gauraiya and Environment Warriors) भी शामिल है।

प्रधानमंत्री द्वारा गौरैया को संरक्षित करने को लेकर ‘मन की बात’ में कई बार सन्देश दिया गया हैं :- “विश्व गौरैया दिवस (20 मार्च) पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नन्हीं गौरैया को हमारे पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए उनके संरक्षण पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि शहरीकरण और प्रदूषण के कारण घटती इनकी संख्या पर्यावरण असंतुलन का संकेत है, इसलिए घरों में दाना-पानी रखकर और घोंसले बनाकर इनके प्रति स्नेह और जिम्मेदारी निभाएं।

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