संजय कुमार/ गौरैया को भी आजादी पसंद है? सुबह की पहली किरण के साथ जब गाँव – शहर पूरी तरह जागा भी नहीं होता, तब गौरैया की ची…ची की आवाज सुनायी पड़ने लगती है। छत की मुंडेर, बिजली के तार और पेड़ की डाल आदि पर नन्ही गौरैया अपनी मौजूदगी दर्ज ची…ची…चूं-चूं, चूं-चूं..चीर-चीर..चीप-चीप कराती है। हमारे घर-आंगन, गांव-गलियों और शहरों के पुराने दिनों की बेहद परिचित आवाज। कभी वह इतनी आम थी कि उसकी ओर किसी का ध्यान ही नहीं जाता था। लेकिन आज जब कई इलाकों में उसकी चहचहाहट कम सुनाई देती है, तो लगता है कि हमने इस छोटी-सी चिड़िया की आजादी छिना तो नहीं ली या उसे समझने में कहीं बड़ी भूल की है।
गौरैया को भी आजादी चाहिये। गौरैया को भी आजादी पसंद है। बिल्कुल हमारी तरह। उसे खुले आसमान में उड़ने की आजादी चाहिए। सुबह होते ही वह एक छत से दूसरी छत, पेड़ से तार और तार से खेत-खलिहान तक उड़ती चली जाती है। उसकी उड़ान में कोई मंजिल तय नहीं होती, कोई टिकट नहीं होता, कोई सीमा नहीं होती। बस आसमान होता है और पंखों में भरी आजादी। वह कुछ देर किसी छज्जे पर बैठती है, फिर अचानक उड़ जाती है। कभी आंगन में उतरती है, कभी सड़क किनारे बिखरे दानों में अपना भोजन तलाशती है और अगले ही पल किसी पेड़ की शाख पर जा बैठती है। गौरैया की सबसे बड़ी खूबी यही है कि वह अपने जीवन को अपनी शर्तों पर जीती है।
घर भी अपनी पसंद का
गौरैया को घर बनाने के लिए किसी आलीशान जगह की जरूरत नहीं होती। उसे जहां थोड़ी-सी सुरक्षा और अपनापन महसूस होता है, वहीं अपना संसार बसा लेती है। पुराने घर का छज्जा हो, छत का कोई कोना, पंखे के ऊपर की जगह, दीवार की दरार या बोगनवेलिया की घनी झाड़ी—उसे जहां सुरक्षित जगह मिलती है, वहीं तिनका-तिनका जोड़कर अपना घर बना लेती है। उसके लिए घर सिर्फ ईंट-पत्थर की संरचना नहीं है। घर वह जगह है जहां उसके बच्चे सुरक्षित रह सकें, जहां सुबह की रोशनी पहुंचे और जहां वह बिना डर के लौट सके। लेकिन हमने अपने घर बदल लिए। पुराने आंगन की जगह बंद कमरे आ गए। छज्जों और रोशनदानों की जगह कांच की खिड़कियां आ गईं। दीवारों की दरारें भर दी गईं। बगीचे और झाड़ियां कम होती गईं। हमारे आधुनिक घर सुंदर और सुविधाजनक जरूर हुए, लेकिन गौरैया के लिए उनमें जगह कम होती गई।
भोजन की भी अपनी आजादी
गौरैया किसी एक जगह या किसी एक व्यक्ति पर निर्भर नहीं रहती। जहां दाना मिला, वहीं चुग लिया। खेत में, खलिहान में, गली के किनारे, घर के आंगन में या कभी-कभी किसी इंसान की थाली या हथेली से भी। वह किसी के खिलाने की मोहताज नहीं। वह अपने भोजन की तलाश खुद करती है। अनाज के छोटे दाने, बीज और उसके आसपास उपलब्ध भोजन उसके जीवन का हिस्सा हैं। ग्रामीण जीवन में अनाज की सफाई के दौरान बिखरते दाने कभी गौरैया के लिए सहज भोजन हुआ करते थे। घरों के आसपास बने छोटे-बड़े बगीचे और खुली जगहें भी उसके लिए भोजन का स्रोत थीं। आज जब भोजन के प्राकृतिक स्रोत घट रहे हैं, खेती और शहरी जीवन का स्वरूप बदल रहा है और खुले स्थान लगातार कम हो रहे हैं, तो गौरैया के सामने भी भोजन जुटाने की चुनौती बढ़ी है।
अकेली नहीं, झुंड में खुश
गौरैया को अकेलापन भी पसंद नहीं। वह झुंड में रहती है। साथियों के साथ चहकती-फुदकती है, एक-दूसरे से झगड़ती है, फिर साथ बैठ जाती है। कभी धूप सेंकती है तो कभी पानी के पास कई गौरैया एक साथ तफरी करते हैं दिखाई देती हैं, जैसे हम बचपन में पानी देख किया करते थे। उनकी दुनिया छोटी है, लेकिन उसमें रिश्ते हैं, संवाद है और साथ रहने की खुशी है,आजादी है। शायद यही बात गौरैया हमें सबसे ज्यादा सिखाती है—खुशी सिर्फ संसाधनों में नहीं, साथ रहने में भी है।
हमने उसकी दुनिया छोटी कर दी
सवाल यह है कि जो गौरैया कभी हमारे घरों की सहज सदस्य हुआ करती थी, वह आज कई जगहों पर कम क्यों दिखाई देती है? इसका कोई एक कारण नहीं है। बदलता शहरी परिवेश, पुराने घरों और खुले स्थानों का कम होना, हरियाली में कमी, भोजन और घोंसले के प्राकृतिक स्थानों का घटना, प्रदूषण तथा मानव गतिविधियों में बढ़ोतरी जैसे अनेक कारण उसके जीवन को प्रभावित करते हैं। कभी हमने उसे पकड़ने की कोशिश की, कभी पिंजरे में बंद करने की। हमने शायद यह समझा कि उसे अपने पास रखकर हम उसे सुरक्षित कर लेंगे। लेकिन गौरैया को सुरक्षा से ज्यादा आजादी चाहिए थी। यानि उसकी आजादी में हस्तक्षेप किया। जिस दिन हमने उसके खुले आकाश पर अधिकार जमाने की कोशिश की, उसी दिन उसने हमसे दूरी बनानी शुरू कर दी। गौरैया का जीवन तो खुले आकाश में है—पेड़ की शाख पर, छत की मुंडेर पर, खेत की मेड़ पर और उस वातावरण में जहां वह अपने लिए भोजन और आश्रय तलाश सके।
गौरैया का जाना सिर्फ एक चिड़िया का जाना नहीं
गौरैया की संख्या या उसकी मौजूदगी को केवल एक पक्षी की कहानी मानना शायद सही नहीं होगा। किसी इलाके से गौरैया का कम होना उस पूरे परिवेश में आए बदलाव का संकेत भी हो सकता है। गौरैया एक संस्कृति है। जीवन है जो हमें जीवन की राह जीना सिखाती है ।जब हमारे घरों के आसपास पेड़ कम होते हैं, झाड़ियां हटती हैं, खुले स्थान खत्म होते हैं और प्राकृतिक भोजन के स्रोत घटते हैं, तो इसका असर केवल गौरैया पर नहीं पड़ता। उस पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर असर पड़ता है, जिसमें मनुष्य भी शामिल है। इसलिए गौरैया को बचाने की कोशिश वास्तव में अपने आसपास के प्राकृतिक वातावरण को बचाने की कोशिश है।
थोड़ी-सी जगह, थोड़ी-सी संवेदना
गौरैया की आजादी के लिए हमेशा बड़े अभियानों की जरूरत नहीं है। छोटे प्रयास भी उसके लिए बड़ी मदद बन सकते हैं। घर की बालकनी या छत पर पानी का छोटा पात्र रखना, पक्षियों के लिए दाना रखना, पेड़-पौधे और झाड़ियां लगाना तथा जहां संभव हो वहां घोंसले के लिए सुरक्षित स्थान उपलब्ध कराना उसके लिए उपयोगी हो सकता है। उसके घोंसले को केवल इसलिए नष्ट न करें कि वह हमारे लिए असुविधा पैदा कर रहा है। उसके बच्चों को केवल इसलिए न छेड़ें कि वे हमारे घर के आसपास हैं। और सबसे बढ़कर, उड़न को न रोकें। गौरैया हमें खुले आसमान की कीमत याद दिलाती है। वह बताती है कि किसी भी जीव के लिए घर वही है जहां वह बिना डर के रहे और जीवन वही है जिसे वह अपनी उड़ान के साथ जी सके।
—















