स्वस्थ जंगल, संतुलित पारिस्थितिकी तंत्र के प्रतीक हैं हाथी

“विश्व हाथी दिवस 12 अगस्त“ भारत दुनिया के 60 प्रतिशत एशियाई हाथियों का घर है। हिमालय की तलहटी से लेकर पश्चिमी और पूर्वी घाटों तक, हाथियों ने भारत के विविध प्राकृतिक परिदृश्यों में अपना घर बनाया है। हाथी केवल जंगल का सबसे विशाल जीव ही नहीं है, बल्कि भारतीय प्रकृति, संस्कृति और पारिस्थितिकी का अभिन्न…

विश्व हाथी दिवस 12 अगस्त

भारत दुनिया के 60 प्रतिशत एशियाई हाथियों का घर है। हिमालय की तलहटी से लेकर पश्चिमी और पूर्वी घाटों तक, हाथियों ने भारत के विविध प्राकृतिक परिदृश्यों में अपना घर बनाया है। हाथी केवल जंगल का सबसे विशाल जीव ही नहीं है, बल्कि भारतीय प्रकृति, संस्कृति और पारिस्थितिकी का अभिन्न हिस्सा भी है। हर वर्ष 12 अगस्त को “विश्व हाथी दिवस” मनाया जाता है। ताकि हाथियों के संरक्षण, उनके प्राकृतिक आवास की सुरक्षा और मानव-हाथी संघर्ष जैसी चुनौतियों के प्रति जागरूकता बढाया जा सके। भारत के संदर्भ में इस दिवस का महत्व और भी बढ़ जाता है, क्योंकि एशियाई हाथियों की दुनिया की सबसे बड़ी आबादी भारत में पाई जाती है।

जहाँ तक जनसँख्या का सवाल है तो भारत की पहली डीएनए-आधारित हाथी गणना (SAIEE 2021–25) के अनुसार, देश में जंगली हाथियों की कुल संख्या 22,446 है। हालांकि यह संख्या 2017 के पिछले अनुमान (27,312) से कम दिखती है। क्षेत्रवार हाथियों की संख्या को देखें तो पश्चिमी घाट में 11,934 हाथी (सबसे बड़ा क्षेत्र), उत्तर-पूर्वी पहाड़ियाँ और ब्रह्मपुत्र मैदान में 6,559 हाथी, शिवालिक पहाड़ियाँ और गंगा के मैदान में 2,062 हाथी और मध्य भारत-पूर्वी घाट में 1891 हाथी हैं।

विश्व हाथी दिवस की शुरुआत कनाडा की पेट्रीशिया सिम्स और थाईलैंड के एलिफेंट रीइंट्रोडक्शन फाउंडेशन ने संयुक्त रूप से 12 अगस्त, 2012 किया था, तब से पेट्रीशिया सिम्स इस पहल का नेतृत्व कर रही हैं। 100 से अधिक संगठनों के साथ साझेदारी में शुरू की गई इस पहल का उद्देश्य हाथियों के संरक्षण के बारे में वैश्विक जागरूकता बढ़ाना है, जिसमें प्रतिवर्ष विश्व हाथी दिवस के माध्यम से लाखों लोग अपना समर्थन देते हैं।

वहीँ , आईयूसीएन (IUCN) की रेड लिस्ट में हाथियों की विभिन्न प्रजातियों को उनके संकट के स्तर के आधार पर अलग-अलग श्रेणियों में रखा गया है। मुख्य रूप से इन्हें एशियाई हाथी और अफ्रीकी हाथियों के रूप में विभाजित किया गया है । एशियाई हाथी (Elephas maximus): स्थिति: लुप्तप्राय (Endangered) हैं इसका मुख्य कारण, आवास का नुकसान, वनों की कटाई और अवैध शिकार है। अफ्रीकी वन हाथी (Loxodonta cyclotis) की स्थिति: गंभीर रूप से लुप्तप्राय (Critically Endangered) है और मुख्य कारण है  अत्यधिक अवैध शिकार और आवास का विखंडन। जबकि अफ्रीकी सवाना हाथी (Loxodonta africana) की स्थिति: लुप्तप्राय (Endangered) है ।इसका मुख्य कारण, निवास स्थान का सिकुड़ना और मानव-पशु संघर्ष का होना है । बोर्नियन हाथी (एशियाई हाथी की उप-प्रजाति) की स्थिति: लुप्तप्राय (Endangered) है और मुख्य कारण है  पाम ऑयल की खेती और जंगलों का सिमट ।

जंगल के पारिस्थितिक प्रहरी

हाथी को अक्सर ‘जंगल का इंजीनियर’ कहा जाता है। अपनी गतिविधियों के माध्यम से वह वन पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित करता है। पेड़ों की शाखाएं तोड़ना, बीजों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाना, वनस्पतियों के बीच रास्ते बनाना और जलस्रोतों तक पहुंच के मार्ग तैयार करना—ये सभी गतिविधियां दूसरे वन्यजीवों के लिए भी उपयोगी होती हैं।

हाथियों द्वारा खाए गए अनेक फलों के बीज उनके मल के माध्यम से दूर-दराज के क्षेत्रों तक पहुंचते हैं। इस तरह वे जंगलों में वनस्पतियों के पुनर्जनन और जैव विविधता को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए हाथियों का संरक्षण केवल एक प्रजाति को बचाने का प्रयास नहीं, बल्कि पूरे वन पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा का विषय है।

भारत में हाथियों की समृद्ध विरासत

भारत में हाथियों का संबंध केवल वन्यजीव संरक्षण से नहीं, बल्कि इतिहास, संस्कृति और परंपरा से भी जुड़ा है। प्राचीन भारतीय साहित्य, कला और स्थापत्य में हाथियों का व्यापक उल्लेख मिलता है। आज भी देश के अनेक हिस्सों में हाथी धार्मिक और सांस्कृतिक आस्था का प्रतीक हैं। लेकिन जंगलों में हाथियों के सामने परिस्थितियां तेजी से बदल रही हैं। सड़क और रेल परियोजनाओं, खनन, औद्योगिक विस्तार, कृषि भूमि के फैलाव और अन्य विकास गतिविधियों के कारण हाथियों के पारंपरिक आवास और उनके आवागमन के रास्ते प्रभावित हुए हैं। परिणामस्वरूप कई स्थानों पर हाथियों और मनुष्यों के बीच टकराव बढ़ा है।

सबसे बड़ी चुनौती मानव-हाथी संघर्ष

भारत में हाथी संरक्षण की सबसे जटिल चुनौतियों में मानव-हाथी संघर्ष प्रमुख है। जब हाथियों के पारंपरिक आवास और गलियारे बाधित होते हैं तो वे भोजन और पानी की तलाश में मानव बस्तियों तथा कृषि क्षेत्रों की ओर पहुंच सकते हैं। इससे किसानों की फसल और संपत्ति को नुकसान होता है, वहीं कई बार मनुष्यों और हाथियों दोनों की जान भी खतरे में पड़ती है। इस समस्या का समाधान केवल हाथियों को जंगलों में सीमित रखने से नहीं हो सकता। इसके लिए हाथियों के पारंपरिक गलियारों की पहचान और संरक्षण, सुरक्षित वन संपर्क, उचित भूमि उपयोग योजना, समय रहते चेतावनी देने वाली तकनीक तथा स्थानीय समुदायों की भागीदारी आवश्यक है।

हाथी गलियारों की सुरक्षा जरूरी

हाथी एक स्थान पर स्थायी रूप से नहीं रहते। वे भोजन, पानी और प्रजनन जैसी आवश्यकताओं के लिए लंबी दूरी तय करते हैं। इसलिए उनके लिए सुरक्षित आवागमन मार्ग यानी एलिफेंट कॉरिडोर बेहद महत्वपूर्ण हैं। किसी गलियारे के बीच सड़क, रेलवे लाइन, बस्ती या अन्य अवरोध खड़ा होने पर हाथियों के प्राकृतिक आवागमन में बाधा आती है। ऐसे में संरक्षण की रणनीति केवल संरक्षित क्षेत्रों तक सीमित रखने के बजाय पूरे लैंडस्केप को ध्यान में रखकर बनानी होगी। रेलवे और सड़क परियोजनाओं में वन्यजीव-अनुकूल डिजाइन, अंडरपास और ओवरपास जैसे उपाय, संवेदनशील क्षेत्रों में गति नियंत्रण तथा हाथियों की आवाजाही की निगरानी दुर्घटनाओं को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

तकनीक और समुदाय बन सकते हैं समाधान

आधुनिक तकनीक हाथी संरक्षण में नई संभावनाएं पैदा कर रही है। कैमरा ट्रैप, ड्रोन, रेडियो कॉलर, सेंसर आधारित चेतावनी प्रणाली और मोबाइल आधारित अलर्ट के माध्यम से हाथियों की गतिविधियों की निगरानी की जा सकती है। यदि किसी गांव के आसपास हाथियों की मौजूदगी की सूचना समय रहते मिल जाए तो लोगों को सुरक्षित स्थानों पर जाने और फसलों की रक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाने का अवसर मिल सकता है। हालांकि तकनीक अकेले पर्याप्त नहीं है। स्थानीय ग्रामीणों और वन विभाग के बीच विश्वास तथा सहयोग इस पूरी व्यवस्था की सफलता की कुंजी है। जिन समुदायों पर हाथी संरक्षण का प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ता है, उन्हें संरक्षण व्यवस्था का सहभागी बनाया जाना चाहिए।

संरक्षण के साथ लोगों के हितों की रक्षा

हाथी संरक्षण तभी दीर्घकालिक रूप से सफल हो सकता है जब स्थानीय समुदायों के हितों की भी रक्षा हो। फसल नुकसान का त्वरित और पारदर्शी मुआवजा, सुरक्षित कृषि पद्धतियां, स्थानीय स्तर पर जागरूकता और संघर्ष प्रभावित परिवारों के लिए प्रभावी सहायता व्यवस्था जरूरी है। दरअसल, संरक्षण और विकास को आमने-सामने खड़ा करने के बजाय दोनों के बीच संतुलन बनाना आज की आवश्यकता है। विकास परियोजनाओं की योजना बनाते समय वन्यजीवों के प्राकृतिक आवागमन और महत्वपूर्ण आवासों को शुरुआत से ही ध्यान में रखा जाए तो भविष्य के संघर्षों को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

विश्व हाथी दिवस का संदेश

विश्व हाथी दिवस हमें यह याद दिलाता है कि हाथियों को बचाना केवल वन विभाग या वन्यजीव विशेषज्ञों की जिम्मेदारी नहीं है। यह समाज, सरकार, उद्योग, वैज्ञानिक समुदाय और स्थानीय आबादी—सभी की साझा जिम्मेदारी है। क्योंकि हाथी हमारा साथी है। लेकिन हम अपनी सुविधा के लिए अपने साथी के साथ ही ठीक व्यवहार नहीं करते। हाथी दांत आदि के लिए उसकी हत्या कर देते हैं । भारत के लिए हाथी संरक्षण का अर्थ अपनी जैव विविधता, जंगलों और प्राकृतिक विरासत की रक्षा करना है। हाथी सुरक्षित रहेंगे तो उनके साथ जुड़े जंगल और उनमें रहने वाली असंख्य वनस्पति एवं जीव-जंतु प्रजातियां भी सुरक्षित रहेंगी। आज आवश्यकता इस बात की है कि हाथी को केवल जंगल में दिखाई देने वाले एक विशाल वन्यजीव के रूप में न देखा जाए, बल्कि उसे स्वस्थ जंगल और संतुलित पारिस्थितिकी तंत्र के प्रतीक के रूप में समझा जाए। विश्व हाथी दिवस पर यही संकल्प हो, भारत की आने वाली पीढ़ियों के लिए सबसे महत्वपूर्ण विरासत साबित हो सकता है हाथियों के लिए सुरक्षित जंगल, सुरक्षित गलियारे और मनुष्य तथा हाथी के बीच सह-अस्तित्व की राह।

-संजय कुमार

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संयोजक

 हमारी गौरैया और इनवारमेंट वैरियर्स

Hamari Gauraiya and Environment Warriors

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*सहायक सम्पादक -निशांत रंजन

उद्देश्य

विश्व गौरैया दिवस: एक साझा संकल्प

20 मार्च 2010 को जब विश्व गौरैया दिवस की शुरुआत हुई, तो मकसद साफ था—इस नन्हीं जान को लुप्त होने से बचाना। इस मुहिम को मजबूती देते हुए दिल्ली सरकार ने 15 अगस्त 2012 और बिहार सरकार ने 16 अप्रैल 2013 को गौरैया को अपना राजकीय पक्षी घोषित किया। तब से लेकर आज तक, सरकारी संस्थाओं और निजी संगठनों के साझा प्रयासों से गौरैया की ‘घर वापसी’ का अभियान निरंतर जारी है।

घर-आँगन, खेत-खलिहान में चहकने-फुदकने वाली गौरैया की घटती संख्या को रोकना और उनकी आबादी को बढ़ाने के लिए एक सुरक्षित और अनुकूल वातावरण सुनिश्चित करना। उद्देश्य है सभी गौरैया संरक्षकों का …इसमें हमारी गौरैया और पर्यावरण योद्धा(Hamari Gauraiya and Environment Warriors) भी शामिल है।

प्रधानमंत्री द्वारा गौरैया को संरक्षित करने को लेकर ‘मन की बात’ में कई बार सन्देश दिया गया हैं :- “विश्व गौरैया दिवस (20 मार्च) पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नन्हीं गौरैया को हमारे पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए उनके संरक्षण पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि शहरीकरण और प्रदूषण के कारण घटती इनकी संख्या पर्यावरण असंतुलन का संकेत है, इसलिए घरों में दाना-पानी रखकर और घोंसले बनाकर इनके प्रति स्नेह और जिम्मेदारी निभाएं।

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