बाघ है तो जंगल है, जो जैव विविधिता के लिये अहम्

संजय कुमार/ अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस पर दुनिया भर में बाघों के संरक्षण का संदेश दिया जा रहा है। भारत ने प्रोजेक्ट टाइगर के जरिए बाघों की संख्या बढ़ाने में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है, लेकिन चुनौतियां अभी भी बरकरार हैं। बाघ के संरक्षण की इस मुहिम ने तस्वीर भी बदली है। दुनिया के करीब 70…

संजय कुमार/ अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस पर दुनिया भर में बाघों के संरक्षण का संदेश दिया जा रहा है। भारत ने प्रोजेक्ट टाइगर के जरिए बाघों की संख्या बढ़ाने में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है, लेकिन चुनौतियां अभी भी बरकरार हैं। बाघ के संरक्षण की इस मुहिम ने तस्वीर भी बदली है। दुनिया के करीब 70 प्रतिशत बाघ भारत में हैं।
वर्ष 2006 तक भारत में जंगलों में केवल 1,411 बाघ बचे थे। यह संख्या आजादी के समय मौजूद लगभग 40,000 बाघों की तुलना में एक चिंताजनक गिरावट थी। वहीँ, 1972 में बाघ के शिकार पर प्रतिबंध लगाया गया और 1973 में प्रोजेक्ट टाइगर की शुरुआत हुई। इसकी शुरुआत 9 बाघ संरक्षित क्षेत्रों यानी रिजर्वस के साथ हुई और शुरुआती दौर में इसके सकारात्मक परिणाम दिखाई दिए। लेकिन शिकार, कमजोर निगरानी व्यवस्था और आंकड़ों के गलत संग्रह के कारण कई चुनौतियां सामने आईं। प्रोजेक्ट टाइगर परियोजना को एक व्यापक, पारिस्थितिकी-आधारित दृष्टिकोण के साथ फिर से मजबूती से शुरु किया गया। इसके बाद इसके परिणाम सामने आने लगे। 2022 तक भारत में बाघों की संख्या बढ़कर 3,682 हो गई, जो 58 बाघ संरक्षित क्षेत्रों में फैली हुई है और ये बाघ संरक्षित क्षेत्र 82,000 वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्र में फैले हैं।
शिकार, प्राकृतिक आवास का खत्म होना और अवैध वन्यजीव व्यापार बाघों की आबादी के अस्तित्व पर मंडरा रहे खतरे का बडा कारण हैं। जैव विविधता के लिए जरुरी बाघ में से 95 प्रतिशत से अधिक को हम खो चुके हैं। जबकि एक शताब्दी पूर्व, एशिया भर में अनुमानित 10 लाख जंगली बाघ विचरण करते थे। आज, वे अपने ऐतिहासिक क्षेत्र के 8 प्रतिशत से भी कम हिस्से में पाए जाते हैं। तीन उप-प्रजातियां—बाली, जावन और कैस्पियन बाघ—विलुप्त हो चुकी हैं। बाघों की आबादी में गिरावट के प्रमुख कारण अवैध शिकार, वन्यजीवों का अवैध व्यापार, आवास का क्षरण और विखंडन, मानव-वन्यजीव संघर्ष तथा जलवायु परिवर्तन हैं।

सामूहिक कार्रवाई की तत्काल आवश्यकता को पहचानते हुए, 13 बाघ रेंज देशों के नेता 2010 में सेंट पीटर्सबर्ग बाघ शिखर सम्मेलन में एक साथ आए और वैश्विक बाघ पुनर्प्राप्ति कार्यक्रम (जीटीआरपी) की शुरुआत की। इस शिखर सम्मेलन में वैश्विक बाघ दिवस की भी स्थापना की गई और इसका लक्ष्य 2022 तक वैश्विक जंगली बाघों की आबादी को दोगुना करना निर्धारित किया गया । साथ ही, इसे प्रतिवर्ष 29 जुलाई को मनाने का भी लक्ष्‍य रखा गया। तब से, वैश्विक बाघ दिवस बाघ संरक्षण के बारे में जागरूकता बढ़ाने, अंतरराष्ट्रीय सहयोग को मजबूत करने, सार्वजनिक भागीदारी को प्रोत्साहित करने और बाघों एवं उनके आवासों की रक्षा में हुई प्रगति की समीक्षा करने के लिए एक वैश्विक मंच के रूप में कार्य कर रहा है।
अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस, हर साल 29 जुलाई को पूरी दुनिया में मनाया जाता है। इसका मकसद साफ है बाघों के संरक्षण के प्रति लोगों को जागरूक करना और इस शानदार जीव को विलुप्त होने से बचाना। अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस हमें उस वन्य जीव की याद दिलाता है जो अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहा है।

केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री, भूपेंद्र यादव ने ग्लोबल टाइगर डे पर नई दिल्ली में नेशनल टाइगर कंज़र्वेशन अथॉरिटी द्वारा आयोजित ग्लोबल टाइगर डे 2026 समारोह में भारत की संरक्षण कामयाबियों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि टाइगर्स (3682) और टाइगर रिज़र्व (58) की संख्या में ज़बरदस्त बढ़ोतरी हुई है। पिछले 12 सालों में एलिफेंट रिज़र्व, नेशनल पार्क, वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी, प्रोटेक्टेड एरिया, कम्युनिटी रिज़र्व और वेटलैंड्स की संख्या भी बढ़ी है। मौके पर एनटीसीए इको-टूरिज्म वेबपेज लॉन्च किया गया। इसमें टाइगर रिज़र्व से जुड़ी जानकारी को एक इंटीग्रेटेड प्लेटफॉर्म लाया गया है। यह सफारी और रहने की जगह की बुकिंग के लिए सभी टाइगर रिज़र्व की असली वेबसाइटों के सीधे लिंक देगा।(लिंक: https://ntca.gov.in/eco-tourism/)।

बाघ केवल राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक नहीं हैं, बल्कि वे पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षक भी हैं। बाघ जंगलों के संतुलन को बनाए रखते हैं और जैव विविधता की भी रक्षा करते हैं। लेकिन खतरे अब भी मौजूद हैं। प्राकृतिक आवास का नुकसान, अवैध शिकार, मानव-वन्यजीव संघर्ष और जंगलों में कमी होने जैसी चुनौतियां लगातार बनी हुई हैं।

बाघ है तो जंगल है तो जैव विविधिता पर्यावरण है और हम सुरक्षित हैं। बाघ को बचाने में वनकर्मियों, वैज्ञानिकों और संरक्षणकर्ताओं की भूमिका अहम् है ऐसे में आम भागीदारी भी अहम् है हमें टाइगर डे पर यह संकल्प लेना हो कि हम इनके प्राकृतिक आवासों को बचाएंगे और संरक्षण देंगे।

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संयोजक

 हमारी गौरैया और इनवारमेंट वैरियर्स

Hamari Gauraiya and Environment Warriors

*सम्पादक -डॉ .लीना

*सहायक सम्पादक -निशांत रंजन

उद्देश्य

विश्व गौरैया दिवस: एक साझा संकल्प

20 मार्च 2010 को जब विश्व गौरैया दिवस की शुरुआत हुई, तो मकसद साफ था—इस नन्हीं जान को लुप्त होने से बचाना। इस मुहिम को मजबूती देते हुए दिल्ली सरकार ने 15 अगस्त 2012 और बिहार सरकार ने 16 अप्रैल 2013 को गौरैया को अपना राजकीय पक्षी घोषित किया। तब से लेकर आज तक, सरकारी संस्थाओं और निजी संगठनों के साझा प्रयासों से गौरैया की ‘घर वापसी’ का अभियान निरंतर जारी है।

घर-आँगन, खेत-खलिहान में चहकने-फुदकने वाली गौरैया की घटती संख्या को रोकना और उनकी आबादी को बढ़ाने के लिए एक सुरक्षित और अनुकूल वातावरण सुनिश्चित करना। उद्देश्य है सभी गौरैया संरक्षकों का …इसमें हमारी गौरैया और पर्यावरण योद्धा(Hamari Gauraiya and Environment Warriors) भी शामिल है।

प्रधानमंत्री द्वारा गौरैया को संरक्षित करने को लेकर ‘मन की बात’ में कई बार सन्देश दिया गया हैं :- “विश्व गौरैया दिवस (20 मार्च) पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नन्हीं गौरैया को हमारे पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए उनके संरक्षण पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि शहरीकरण और प्रदूषण के कारण घटती इनकी संख्या पर्यावरण असंतुलन का संकेत है, इसलिए घरों में दाना-पानी रखकर और घोंसले बनाकर इनके प्रति स्नेह और जिम्मेदारी निभाएं।

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