प्रवास बदल रही है घरलू गौरैया

संजय कुमार / हमारे घर आंगन में चहकने-फुदकने वाली घरेलू गौरैया नन्ही चिड़ियाँ बचपन की साथी आज कई गाँव और शहर  के घर-आँगन से रूठ कर कहीं और चली गयी है। आमतौर पर दिखने वाली गौरैया कही बड़ी तादाद में दिखती है। कहीं बमुश्किल से दिखती है, तो कहीं बिलकुल नहीं। देश की राजधानी दिल्ली…

संजय कुमार / हमारे घर आंगन में चहकने-फुदकने वाली घरेलू गौरैया नन्ही चिड़ियाँ बचपन की साथी आज कई गाँव और शहर  के घर-आँगन से रूठ कर कहीं और चली गयी है। आमतौर पर दिखने वाली गौरैया कही बड़ी तादाद में दिखती है। कहीं बमुश्किल से दिखती है, तो कहीं बिलकुल नहीं।

देश की राजधानी दिल्ली और बिहार की राजकीय पक्षी गौरैया की स्थिति भी दिल्ली -बिहार में कुछ ऐसी ही है। यों कहें कि देशभर में हाल एक सामान्य हैं। खासकर शहरी इलाकों में। ग्रामीण क्षेत्रों में कहीं है तो कहीं नहीं। कबूतरों का साम्राज्य फैलता ही जा रहा है। लोगों द्वारा कबूतरों को दाना पानी देने से इनकी संख्या जहां बढ़ती जा रही है, वहीं कौआ, मैना, बुलबुल, तोता सहित अन्य पक्षी जो हमारे आसपास रहती थी वे भी सिमटते जा रहे हैं।

विश्व भर में गौरैया पक्षी की आबादी में गिरावट शहरीकरण, प्रदूषण, कंक्रीट के बढ़ते जंगल, कीटनाशक का प्रयोग सहित कई कारणों से हो रहा  है, वहीँ इसको बचाने के प्रयास भी जारी है और सकारात्मक परिणाम भी मिल रहा है। हालांकि, कुछ खास इलाकों में, विशेष रूप से जहां प्राकृतिक या संरक्षित वातावरण उपलब्ध हैं, गौरैया अभी भी बड़ी संख्या पाई जाती हैं। निजी प्रयास से कईयों के घरों या आसपास ये मौजूद हैं।

गौरैया की विलुप्ति को देखते हुए 20 मार्च 2010 में विश्व गौरैया दिवस का आगाज कर उसके संरक्षण का बिगुल फूंका गया था। गौरैया संरक्षण के मद्देनजर दिल्ली सरकार ने 2012 और बिहार सरकार ने 2013 में गौरैया को राजकीय पक्षी घोषित किया। सरकारी, गैर सरकारी और निजी पहल से दिल्ली के साथ-साथ देश भर में संरक्षण मुहिम चला, जो आज भी जारी है। दिल्ली में गौरैया की घर वापसी के लिए पहल में अहम है ‘गौरैया ग्राम’। गढ़ी मांडू वन क्षेत्र में स्थित यह दिल्ली का पहला ऐसा ग्राम है जो गौरैया को समर्पित है। ‘गौरैया ग्राम’, को दिल्ली सरकार और बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी ने गौरैया के संरक्षण के लिए विकसित किया गया है। ‘गौरैया ग्राम’ जैसे संरक्षण प्रयासों को देश भर में लागू करने की जरूरत है। इन क्षेत्रों में गौरैया की संख्या बढ़ रही है। जबलपुर से कान्हा टाइगर रिजर्व यात्रा के दौरान कई शहरों में गौरैया अच्छी संख्या में दिखी। अंडमान के कई टापू पर दिखी थी। ऐसा नहीं है कि यह पूरी तरह से विलुप्त हो गयी है। केरल से कन्याकुमारी तक अभी इसका वजूद है, लेकिन जो तादाद पहले थी उसमें कमी जरुर दिखती है, तभी तो घरेलू गौरैया आईयूसीएन की ‘लाल सूची’ में शामिल है, हालांकि इसकी स्थिति सबसे कम चिंताजनक है। 

गौरैया ने जिन कारणों से इंसानों से मुंह फेरा है उसे समझना होगा। घरेलू गौरैया ने अपना आशियाना बदला है। प्राकृतिक वातावरण को अपना रही है। बड़ी संख्या में बिहार के दियारा क्षेत्र में घरेलू गौरैया का सुरक्षित पर्यावास बनता जा रहा है। जो भी अद्भुत नज़ारे से लबरेज है। यों तो खेतों में लंबे घास या झाड में गौरैया प्रवास करती है। लेकिन, दियारा की  मिटटी के टीले में अबाबील पक्षी जहाँ खोह बना कर रहती है, उसी में या उसी तरह के खोह में गौरैया ने पर्यावास बनाया है। पिछले दिनों हारजोडी, मधेपुरा में बर्ड वाचिंग के दौरान पक्षी विशेषज्ञ ज्ञानचंद्र ज्ञानी ने गौरैया को मिटटी के टीले में वास करते देखा। वहीँ भागलपुर के गौरीपुर बहियार, बिहपुर बबूल के कई पेड़ पर सैकड़ों गौरैया झुंड में बैठा दिखना शुभ संकेत हैं। वैसे रेलवे स्टेशन भी गौरैया का पसंदीदा आवासीय क्षेत्र है। गुजरात के उधना रेलवे स्टेशन को स्पैरो जोन बना दिया गया है जबकि देश के कई रेलवे स्टेशन हैं जहाँ बड़ी संख्या में गौरैया रहती है। यों तो घरेलू गौरैया इंसान के आसपास रहती और घोंसला बनाती है। साथ ही दियारा क्षेत्र में घास-झाड में भी वास करती है। लेकिन, मिट्टी के खोह में रहना, अपने आप में अद्भुत और रोचक है। घरेलू गौरैया का दियारा क्षेत्र में बड़ी तदाद मिलना सवाल खड़ा करता है, साथ ही शोध का अवसर भी देता है। इंसान के इलाके से दूर दियारा क्षेत्र में गौरैया के मिलने के पीछे सुरक्षित पर्यावास, आहार का मिलना, नदी से पानी और आहार जहां मिलता है वहीं बेहतर जलवायु का होना भी अहम पक्ष हो सकता हैं।

गौरैया की संख्या में कमी के पीछे कई कारण हैं जिन पर लगातार शोध हो रहे हैं। गौरैया की संख्या में कमी के पीछे के कारणों में, बढ़ता आवासीय संकट, खेतों में कीटनाशक का प्रयोग, आहार की कमी, खेतों में कीटनाशक का व्यापक प्रयोग, जीवनशैली में बदलाव, जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, शिकार, गौरैया को बीमारी और भी कारण हो सकते हैं। अगर ग्रामीण क्षेत्रों में देखें तो घरेलू गौरैया की संख्या में कमी का प्रमुख कारण कृषि पद्धतियों में बदलाव, कीटनाशक का प्रयोग, सर्दियों में पराली का नुकसान और अनाज भंडारण में सुधार आदि है। इससे गौरैया को बहुमूल्य खाद्य स्रोतों से वंचित होना पड़ रहा है। वहीँ, शहरी क्षेत्र में गौरैया की आबादी में गिरावट के कारणों को पूरी तरह से समझा नहीं जा सका है। इस बात के प्रमाण हैं कि कम उपयुक्त आहार स्थल, कम घोंसले के स्थान और बिल्लियों/हमलावर चिड़ियों का बढ़ता शिकार, सभी इसमें भूमिका निभाते हैं।

शहरों- गाँवों में देखा गया है कि जहां गाय-गोबर है। पेंड-पौधे हैं। रहने के लिए घरों में रौशनदान-खोह आदि है, तो वहाँ गौरैया है। लेकिन, वहीं कंक्रीट के जंगल यानि अपार्टमेंट के इर्द-गिर्द भी गौरैया है। वजह, वहाँ दाना- पानी-आवास-पेड़ और संतुलित पर्यावरण और सुरक्षा है। जहां, यह सब नहीं वहाँ से गौरैया गायब है। अपार्टमेंट रहने वाली पटना की आशा प्रसाद की छोटी सी बालकोनी में दाना-पानी-आवास की व्यवस्था ने गौरैया सहित दर्जनों चिड़ियों को आश्रय दे रखा है। ऐसे कई नज़ारे हैं जहाँ गौरैया मजे से रहती आती है। पुराने मोहल्ले में पेंड नहीं होने के बावजूद गौरैया रह रही है। जहां दाना-पानी-आवास-पेड़, संतुलित पर्यावरण और सुरक्षा नहीं मिल रहा है, गौरैया दूसरे इलाके में चली जा रही है। पटना में गंगा पथ बेहतर उदहारण है। यहां, पुल के नीचे, नदी किनारे गौरैया को देखा जा सकता है। यहाँ दाना-पानी-आवास,संतुलित पर्यावरण और सुरक्षा उन्हे मिल रहा है।     

नदी किनारा या वेटलैन्ड गौरैया को भा रहा है। यहाँ उसे आहार भरपूर मिलता है खासकर बच्चों को आहार में देने के लिए कीड़ों की आवश्यकता होती है। दियारा में घरेलू गौरैया जहाँ मिटटी के खोह को अपना आवास बना रही है वही, दियारा क्षेत्र में उगे घास और झाडी में भी ये रहती हैं। गौरैया की कमी के पीछे कई कारणों को हम जानते /खोजते रहते हैं। विलुप्त गौरैया की घर वापसी के लिए लोग घरों में दाना-पानी रख रहे हैं क्रत्रिम बॉक्स लगा रहे हैं। कहीं, गौरैया आ रही है तो कहीं नहीं। सब जानते हैं कि गौरैया जो इन्सान के आपपास वास करती है वह उससे दूर दियारा में चली गयी जहाँ इन्सान कोसो दूर हैं। राधोपुर दियारा में बड़ी संख्या में गौरैया खेतों में दिखी थी। गौरैया का मिलना अच्छे संकेत हो सकते हैं। बहरहाल, यह विषय हो सकता है कि घर आँगन की घरेलू गौरैया का आहार-आवास की कमी या कीटनाशक का प्रभाव आदि कारणों के बीच इंसान को छोड़ सुदूर नदी किनारे या खेतों-जंगलों में जाना कहीं यह तो नहीं बताता है कि पर्यावरण खतरे में हैं?

यदि आप गौरैया को देखना, जुड़ना चाहते हैं, तो फिर से पहल करनी होगी । विशेष रूप से जिन-जिन कारणों से गौरैया गायब हुई है उन्हें  ठीक करना होगा। आवासीय संकट से उबारने के लिए कृत्रिम बॉक्स और झाड़ीनुमा पेड़ लगाने होंगे साथ ही दाना-पानी की व्यवस्था करनी होगी। स्थानीय स्तर पर गौरैया संरक्षण के लिए कीटनाशक-मुक्त बगीचे भी बनाए, जो गौरैया को अपनी ओर खींचता है। बिहार सहित देश के कई हिस्सों में कई लोगों ने बालकनी, छत या घर के आसपास पेड़-पौधे लगाये तो गौरैया सहित दूसरी चिड़ियाँ आई। तो आइए गौरैया की घर वापसी के लिए प्रयासों को पंख लगाऐं, ताकि पंख फड़फड़ाते घर द्वार पर गौरैया चींचीं करती हमारे घर-आगंन में आएं।

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संयोजक

 हमारी गौरैया और इनवारमेंट वैरियर्स

Hamari Gauraiya and Environment Warriors

*सम्पादक -डॉ .लीना

*सहायक सम्पादक -निशांत रंजन

उद्देश्य

विश्व गौरैया दिवस: एक साझा संकल्प

20 मार्च 2010 को जब विश्व गौरैया दिवस की शुरुआत हुई, तो मकसद साफ था—इस नन्हीं जान को लुप्त होने से बचाना। इस मुहिम को मजबूती देते हुए दिल्ली सरकार ने 15 अगस्त 2012 और बिहार सरकार ने 16 अप्रैल 2013 को गौरैया को अपना राजकीय पक्षी घोषित किया। तब से लेकर आज तक, सरकारी संस्थाओं और निजी संगठनों के साझा प्रयासों से गौरैया की ‘घर वापसी’ का अभियान निरंतर जारी है।

घर-आँगन, खेत-खलिहान में चहकने-फुदकने वाली गौरैया की घटती संख्या को रोकना और उनकी आबादी को बढ़ाने के लिए एक सुरक्षित और अनुकूल वातावरण सुनिश्चित करना। उद्देश्य है सभी गौरैया संरक्षकों का …इसमें हमारी गौरैया और पर्यावरण योद्धा(Hamari Gauraiya and Environment Warriors) भी शामिल है।

प्रधानमंत्री द्वारा गौरैया को संरक्षित करने को लेकर ‘मन की बात’ में कई बार सन्देश दिया गया हैं :- “विश्व गौरैया दिवस (20 मार्च) पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नन्हीं गौरैया को हमारे पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए उनके संरक्षण पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि शहरीकरण और प्रदूषण के कारण घटती इनकी संख्या पर्यावरण असंतुलन का संकेत है, इसलिए घरों में दाना-पानी रखकर और घोंसले बनाकर इनके प्रति स्नेह और जिम्मेदारी निभाएं।“

हमारी पहल: पूर्णतः निस्वार्थ और जनहित में

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