‘एक ही चिड़िया,दो अलग जिंदगी’ गाँव-शहर की घरेलू गौरैया

संजय कुमार/ घरेलू गौरैया जो पासर डोमेस्टिकस परिवार की एक छोटी पक्षी है, दुनिया के अधिकांश हिस्सों में ग्रामीण और शहरी इलाकों में पायी जाती है। भले ही एक चिड़ियाँ है लेकिन गाँव और शहर की गौरैया की अलग-अलग जिन्दगी है। बदलते परिवेश में पिछले दो दशक में गांव और शहर की गौरैया की लाइफस्टाइल…

संजय कुमार/ घरेलू गौरैया जो पासर डोमेस्टिकस परिवार की एक छोटी पक्षी है, दुनिया के अधिकांश हिस्सों में ग्रामीण और शहरी इलाकों में पायी जाती है। भले ही एक चिड़ियाँ है लेकिन गाँव और शहर की गौरैया की अलग-अलग जिन्दगी है। बदलते परिवेश में पिछले दो दशक में गांव और शहर की गौरैया की लाइफस्टाइल बिल्कुल अलग हो गई है। कई गाँव-शहर से गौरैया गायब हो रही है तो कई गांव-शहर में अभी भी मौजूद है।

गांव की गौरैया के रहन सहन को देखें तो सदियों से वह अपना घर / घोंसला कच्ची दीवार, फूस-खपरैल,छप्पर वाले घरों में बनाना पसंद करती रही है। मिट्टी के घर में खोह उसे ज्यादा पसंद आता है, लेकिन गाँव में फूस-खपरैल के घरों ने अपना स्वरूप बदला लिया और कंक्रीट के घर बन जाने से उसका आशियाना उजड़ गया है । पहले घरों के दरवाजे-खिड़कियाँ खुली रहती थी, आँगन हुआ करता था लेकिन समय बदला, कई घरों में यह सब बंद हो गया। सदियों पहले शहर में जो खपरैल के घर थे वे आज कंक्रीट में बदल गए। जो आँगन थे वह बंद हो गये। शीशे की बिल्डिंग बन गयी। जिस रोशनदान से प्रवेश कर छज्जे, बिजली के बोर्ड, फोटो फ्रेम, बाथरूम के पाइप आदि में शहरी गौरैया घोंसला बनाती आज वह एसी के नीचे, दुकानों के शटर के गैप में घोंसला बना रही है। वहीँ प्लास्टर वाली दीवार ने खोह भी खत्म कर दिए। गौरैया के चूजों को पहले दस-पंद्रह  दिन सिर्फ कीड़े चाहिए। गांव में खेत, गोबर, घास में कीड़े-मकोड़े भरपूर मिल जाते हैं। शहर में मुश्किल से यह मिलता है। पहले मोहल्लों में गाय पालन और कचरा केंद्र से गौरैया को कीड़ों के साथ अन्य आहार भी मिल जाता था लेकिन अब कई शहरों से यह गायब है ।

गाँव की गौरैया के लिए सब कुछ खुला रहता है, खेत-खलिहान गौरैया के आहार के केंद्र हैं, लेकिन इसमें भी बदलाव आया है । कीटनाशकों के प्रयोग से कीड़ों की भारी कमी कम ने आहार संकट पैदा कर दिया है । खलिहान में रखे फसल से गौरैया दाना चुग लेती थी आज खेत से सीधे तैयार हो कर स्टील की अनाज कोठी में चले जा रहे हैं। जो अनाज गिरता उसे गौरैया चुग कर परिवार को पाल रही है। शहरों में राशन की दूकान कम होती जा रही है। गौरैया दूकान के पास आकर अनाज चुगती है लेकिन यह सिमटता जा रहा है। पानी का अभाव भी गाँव और शहर में होने से गौरैया को प्यासा रहना पड़ता है। गाँव में तालाब, पोखर, कुंआ  कम हो रहे हैं। शहरों में कंक्रीट के सड़क के किनारे जमा होने वाले पानी अब चिड़ियों को नसीब नहीं होता है। शहर की गौरैया प्रदूषण भी से परेशान होती रहती है यहाँ धूल-मिट्टी, धुआं, ध्वनि, रात में प्रकाश आदि से उनका जीना मुश्किल हो गया है। गाँव की गौरैया कुछ हद तक प्रदूषण से बची हुई है। शहर की गौरैया कंक्रीट के जंगल में रहती है जबकि गांव की गौरैया आजाद और खुले में रहती है।

About the Author

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

संयोजक

 हमारी गौरैया और इनवारमेंट वैरियर्स

Hamari Gauraiya and Environment Warriors

*सम्पादक -डॉ .लीना

*सहायक सम्पादक -निशांत रंजन

उद्देश्य

विश्व गौरैया दिवस: एक साझा संकल्प

20 मार्च 2010 को जब विश्व गौरैया दिवस की शुरुआत हुई, तो मकसद साफ था—इस नन्हीं जान को लुप्त होने से बचाना। इस मुहिम को मजबूती देते हुए दिल्ली सरकार ने 15 अगस्त 2012 और बिहार सरकार ने 16 अप्रैल 2013 को गौरैया को अपना राजकीय पक्षी घोषित किया। तब से लेकर आज तक, सरकारी संस्थाओं और निजी संगठनों के साझा प्रयासों से गौरैया की ‘घर वापसी’ का अभियान निरंतर जारी है।

घर-आँगन, खेत-खलिहान में चहकने-फुदकने वाली गौरैया की घटती संख्या को रोकना और उनकी आबादी को बढ़ाने के लिए एक सुरक्षित और अनुकूल वातावरण सुनिश्चित करना। उद्देश्य है सभी गौरैया संरक्षकों का …इसमें हमारी गौरैया और पर्यावरण योद्धा(Hamari Gauraiya and Environment Warriors) भी शामिल है।

प्रधानमंत्री द्वारा गौरैया को संरक्षित करने को लेकर ‘मन की बात’ में कई बार सन्देश दिया गया हैं :- “विश्व गौरैया दिवस (20 मार्च) पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नन्हीं गौरैया को हमारे पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए उनके संरक्षण पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि शहरीकरण और प्रदूषण के कारण घटती इनकी संख्या पर्यावरण असंतुलन का संकेत है, इसलिए घरों में दाना-पानी रखकर और घोंसले बनाकर इनके प्रति स्नेह और जिम्मेदारी निभाएं।

हमारी पहल: पूर्णतः निस्वार्थ और जनहित में

यह वेबसाइट पूरी तरह से अवैतनिक,जनहित और सामाजिक सरोकार को समर्पित है। हमारा मंच किसी व्यक्ति या संगठन के लाभ के लिए नहीं, बल्कि केवल गौरैया और पर्यावरण संरक्षण की आवाज बनने के लिए है।

हमें आप लिख सकते हैं …आप हमें  📩 ईमेल करें: ilovesparrow68@gmail.com

🐦 आपकी भागीदारी जरूरी है: अगर आपके पास गौरैया और पर्यावरण संरक्षण संरक्षण से जुड़े अनुभव, प्रेरक कहानियाँ, कविताएँ, गीत या शोधपरक आलेख हैं, तो हमें ज़रूर भेजें।

www.ilovesparrow.com वेबसाईट का उद्देश्य साफ़ है घर -घर गौरैया संरक्षण की पहल हो..साथ ही पर्यावरण का भी संरक्षण हो।

सम्पादक : डॉ लीना, सहायक सम्पादक : निशांत रंजन