विश्व की गौरैया: विविधता और अस्तित्व का संसार

विश्व की गौरैया: विविधता और अस्तित्व का संसार संजय कुमार / गौरैया (Sparrow) दुनिया भर में पाई जाने वाली उन चुनिंदा छोटी चिड़ियों में से एक है, जो इंसान के सबसे करीब रही हैं। गाँव की चौपाल हो, शहर की बालकनी, खेत-खलिहान हों या फिर जंगल और रेगिस्तान गौरैया ने हर माहौल को अपना घर…

विश्व की गौरैया: विविधता और अस्तित्व का संसार

संजय कुमार / गौरैया (Sparrow) दुनिया भर में पाई जाने वाली उन चुनिंदा छोटी चिड़ियों में से एक है, जो इंसान के सबसे करीब रही हैं। गाँव की चौपाल हो, शहर की बालकनी, खेत-खलिहान हों या फिर जंगल और रेगिस्तान गौरैया ने हर माहौल को अपना घर बनाया है। बस इन्सान साथ होने चाहिए। विभिन्न शोधकर्ताओं के आंकड़ों के अनुसार जैव-विविधता से भरपूर इस नन्हीं चिड़िया की दुनिया भर में 25 से 50 प्रजातियां पाई जाती हैं, जिनमें से  भारत में सात  प्रमुख प्रजातियां देखने को मिलती हैं।

दुनिया भर में गौरैया ‘पैसेरिडी’ (Passeridae) परिवार के अंतर्गत आती है। आइए, विश्व और भारत में पाई जाने वाली गौरैया की कुछ बेहद खास प्रजातियों और उनकी विशेषताओं पर एक नज़र डालते हैं। लेकिन, बचपन की यादों से जुड़ी यह चिड़िया अब धीरे-धीरे गाँव-शहरों से गायब हो रही है।इनमें से कुछ प्रमुख प्रजातियों में प्रमुख है ‘हाउस स्पैरो / घरेलू गौरैया’ जो पासर डोमेस्टिकस (Passer domesticus) परिवार से आती है।

इसकी पहचान बहुत आसन है, नर के सीने पर काला धब्बा, सिर स्लेटी जबकि मादा हल्की भूरी रंग की होती है। यह यूरोप, एशिया, अफ्रीका, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया आदि जगहों में पाई जाती है। यह इंसानों के साथ सबसे ज्यादा रहने वाली चिड़िया है। खास बात यह है कि 1950 के दशक में इसे अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, अफ्रीका में लाकर छोड़ा गया था। आज ये 6 महाद्वीपों में है।

‘यूरेशियन ट्री स्पैरो’ पासर मोंटानस (Passer montanus) परिवार की है। मादा और नर एक जैसे होते हैं। गाल पर काला धब्बा, चॉकलेटी सिर होता है। यूरोप से लेकर जापान तक, भारत में हिमालय और उत्तर-पूर्व में मिलती है। यह शहर की बजाय खेतों और पेड़ों में रहना पसंद करती है। इसलिए इसे ट्री स्पैरो कहते हैं।

‘स्पेनिश स्पैरो’ पासेर हिस्पैनियोलेंसिस (Passer hispaniolensis) परिवार की है जिसकी पहचान हाउस स्पैरो जैसी है, पर नर के नीचे ज्यादा काली धारियां होती है। यह भूमध्य सागर क्षेत्र, मध्य एशिया, भारत में सर्दियों में प्रवासी करती है।

‘सिंध स्पैरो / डेड सी स्पैरो’  पैसर पाइरोनोटस (Passer pyrrhonotus) परिवार की है जो बहुत हल्के रंग की होती है। यह पाकिस्तान, भारत के राजस्थान, गुजरात में नदी किनारे पायी जाती है।

भारत में पाई जाने वाली अन्य प्रजातियां में ‘रुसेट स्पैरो’ पासर रुटिलान्स (Passer rutilans) परिवार की है जो  हिमालय में 1500 मीटर  से ऊपर पायी जाती है।

जबकि ‘कश्मीर स्पैरो’ / ब्लैंफोर्ड स्पैरो’  पैसर ब्लैंडफोर्डी (Passer blandfordi) परिवार की है जो उत्तर-पूर्व भारत, म्यांमार के पहाड़ में पायी जाती है ।

वहीँ ‘सोकात्रा स्पैरो’  पैसर इंसुलारिस (Passer insularis) परिवार से हैं जो  यमन के पास सोकात्रा द्वीप में भी पायी जाती है।

फोटो साभार ebird.org

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संयोजक

 हमारी गौरैया और इनवारमेंट वैरियर्स

Hamari Gauraiya and Environment Warriors

*सम्पादक -डॉ .लीना

*सहायक सम्पादक -निशांत रंजन

उद्देश्य

विश्व गौरैया दिवस: एक साझा संकल्प

20 मार्च 2010 को जब विश्व गौरैया दिवस की शुरुआत हुई, तो मकसद साफ था—इस नन्हीं जान को लुप्त होने से बचाना। इस मुहिम को मजबूती देते हुए दिल्ली सरकार ने 15 अगस्त 2012 और बिहार सरकार ने 16 अप्रैल 2013 को गौरैया को अपना राजकीय पक्षी घोषित किया। तब से लेकर आज तक, सरकारी संस्थाओं और निजी संगठनों के साझा प्रयासों से गौरैया की ‘घर वापसी’ का अभियान निरंतर जारी है।

घर-आँगन, खेत-खलिहान में चहकने-फुदकने वाली गौरैया की घटती संख्या को रोकना और उनकी आबादी को बढ़ाने के लिए एक सुरक्षित और अनुकूल वातावरण सुनिश्चित करना। उद्देश्य है सभी गौरैया संरक्षकों का …इसमें हमारी गौरैया और पर्यावरण योद्धा(Hamari Gauraiya and Environment Warriors) भी शामिल है।

प्रधानमंत्री द्वारा गौरैया को संरक्षित करने को लेकर ‘मन की बात’ में कई बार सन्देश दिया गया हैं :- “विश्व गौरैया दिवस (20 मार्च) पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नन्हीं गौरैया को हमारे पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए उनके संरक्षण पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि शहरीकरण और प्रदूषण के कारण घटती इनकी संख्या पर्यावरण असंतुलन का संकेत है, इसलिए घरों में दाना-पानी रखकर और घोंसले बनाकर इनके प्रति स्नेह और जिम्मेदारी निभाएं।

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