भारत में गौरैया : सभी मनमोहक-आकर्षक  

संजय कुमार / भारत में गौरैया परिवार Passeridae की कुल सात  प्रजातियाँ पाई जाती हैं। यों तो भारत में घरेलू गौरैया का ही बोल बाला है। भारत के सात तरह की गौरैया में – घरेलू गौरैया, ट्री स्पैरो, सिंध गौरैया, रसेट गौरैया, पीली-गर्दन, डेड सी स्पैरो और स्पैनिश गौरैया पाई जाती हैं। गौरैया विश्वभर में…

संजय कुमार / भारत में गौरैया परिवार Passeridae की कुल सात  प्रजातियाँ पाई जाती हैं। यों तो भारत में घरेलू गौरैया का ही बोल बाला है। भारत के सात तरह की गौरैया में – घरेलू गौरैया, ट्री स्पैरो, सिंध गौरैया, रसेट गौरैया, पीली-गर्दन, डेड सी स्पैरो और स्पैनिश गौरैया पाई जाती हैं। गौरैया विश्वभर में पाई जाने वाली छोटी चिड़ियों में से एक हैं, जो  आसानी से पहचानी जाती हैं। गाँव-शहरों, खेत-खलिहान से लेकर जंगलों और रेगिस्तानों में पाई जाने वाली गौरैया विविधता को लिए हुए है। घरेलू गौरैया बहुत ही आम है। भारत सात प्रजातियां पाई जाती है,जो कई नामों से पुकारी जाती है। यों विश्व भर में 25 से 50 प्रजातियां इसकी है। शोधकर्ता अलग-अलग आंकड़े भी देते हैं। इसमें सबसे आम और खास है घरेलू गौरैया ।

घरेलू  गौरैया  विश्व के सबसे व्यापक और परिचित छोटे पक्षियों में से एक है, जो आमतौर पर मानव बस्तियों के पास पाई जाती है। जहाँ-जहाँ इन्सान है या गया वहां घरेलू गौरैया कई महाद्वीपों में शहरों, गांवों और कृषि भूमि वाले आवासों में फलती-फूलती रही है। छोटी, गोल-मटोल गौरैया जिसकी चोंच मोटी और शंकु के आकार की होती है। नर गौरैया के सिर पर धूसर रंग का मुकुट, गले पर काला धब्बा और गर्दन पर भूरा रंग होता है। जबकि मादा गौरैया पूरी तरह से भूरे रंग की होती हैं जिन पर हल्की धारियां होती हैं। यह नर से थोड़ी छोटी होती है।

अक्सर इमारतों के झुंड में देखे जाते हैं। घरेलू गौरैया शहरी केंद्रों, ग्रामीण गांवों और खेतों सहित मनुष्यों के निकट के क्षेत्रों को पसंद करती है। यह अक्सर भवन के मुंडेर पर बैठती है। खोह,दरारों आदि में घोंसला बनाती है। घरेलू गौरैया सामाजिक पक्षी हैं घर-आँगन,खेत, बगीचों और खुले में आहार खोजती रहती है। घरेलू गौरैया हमेशा ची ची यानि अपनी  चहचहाहट से उपस्थिति दर्ज करती रहती है । आहार में मुख्य रूप से बीज, अनाज और छोटे कीड़ों को बनाती है।

रसेट स्पैरो (पासर रुटिलन) इसकी विशेषता यह है कि भूरे रंग के मुकुट (सर) और छाती से सजी रसेट गौरैया देखने में बेहद खूबसूरत होती है। नर गौरैया चंचल होते हैं जबकि मादा गौरैया थोड़ा शांत होती  है। भारत के उत्तरी और उत्तरपूर्वी क्षेत्रों में पाई जाने वाली ये यह गौरैया हिमालय की तलहटी को अपना घर मानती हैं।इसके पंख बहुत सुन्दर और आकर्षक होते हैं। नर के पंख मादा से चमकीले होते हैं।

सिंध स्पैरो (पासर पाइरहोनोटस) :  की पीठ दालचीनी जैसे भूरे रंग की होती है और उससे विपरीत भूरे रंग के सिर होता है। नर गौरैया के गले पर एक काला धब्बा होता है, जबकि मादा गौरैया का रूप अधिक सफ़ेद यानि सादा होता है। सिंध गौरैया पश्चिमी भारत के शुष्क क्षेत्रों, जिनमें गुजरात और राजस्थान के कुछ हिस्से शामिल हैं, में पाई जाती हैं और गर्म और शुष्क जलवायु के लिए अच्छी तरह से अनुकूलित हैं।

स्पेनिश गौरैया (Passer hispaniolensis):  अपने गर्म भूरे रंग के पंखों और हल्की धारियों के साथ आकर्षक लगती है। नर गौरैया के सिर पर गहरे भूरे रंग की टोपी और गले पर एक विशिष्ट काला धब्बा होता है।  हालांकि यह घरेलू गौरैया जैसी आम नहीं है, स्पेनिश गौरैया उत्तरी और पश्चिमी भारत के कुछ हिस्सों में, विशेष रूप से प्रवास काल के दौरान पाई जा सकती है।

यूरेशियन ट्री स्पैरो (पैसर मोंटानस):  घरेलू गौरैया से मिलती-जुलती है । यूरेशियन वृक्ष गौरैया के सिर पर भूरा रंग और पीठ पर गहरे भूरे रंग का धब्बा होता है, साथ ही गालों पर विशिष्ट सफेद निशान भी होता है। इसका देखने में बेहद आकर्षक लगता है। यह मुख्य रूप से एशिया में, जिसमें भारत के कुछ हिस्से भी शामिल हैं, पाया जाता है। यूरेशियन वृक्ष गौरैया जंगलों, पार्कों और शहरी क्षेत्रों में अक्सर देखा जाता है, और पेड़ों के खोह और दरारों में घोंसला बनाता है।

पीले गले वाली गौरैया (पेट्रोनिया ज़ैंथोकोलिस) यानि सोनकंठी गौरैया के नाम से पता चलता है, पीले गले वाली गौरैया के गले पर चमकीला पीला धब्बा होता है, जो इसके सादे पंखों में एक आकर्षक रंग भर देता है। नर और मादा दिखने में लगभग एक जैसे होते हैं,दोनों के गले पर पीला धब्बा होता है। विशिष्ट भूरे रंग के कंधे के धब्बे के कारण इसे चेस्टनट शोल्डर्ड पेट्रोनिया के नाम से भी जाना जाता है। गौरैया की यह प्रजाति मुख्य रूप से भारत के उत्तरी और मध्य क्षेत्रों में पाई जाती है, और चट्टानी इलाकों, खड़ी पहाड़ियों और झाड़ीदार आवासों को पसंद करती है। कभी-कभी इंसानी इलाकों में भी दिखती है। पीली गर्दन वाली गौरैया ही वह वजह है जिसके कारण महान पक्षी विज्ञानी डॉ. सलीम अली को भारत का पक्षीमैन बनाया ।

“डेड सी स्पैरो” – (Dead Sea Sparrow Passer moabiticus) की पहचान में नर का सिर भूरा होता है। आँख के चारों ओर कालाऔर  गाल हल्का पीला होता है। जबकि मादा हल्की भूरी भूरी होती है। यह  घरेलू गौरैया से छोटी होती है, साइज लगभग12 सेमी। यह भारत में सिर्फ पश्चिमी राजस्थान के बाड़मेर, जैसलमेर में पाई जाती है। नदी-नाले के किनारे झाड़ी में सामूहिक घोंसला बनती है। झुण्ड में रहती है और सामाजिक पक्षी है।

(फोट/ स्रोत- बर्ड्स ऑफ द वर्ल्ड, Birdfact,birdsofgujarat, ebird)

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संयोजक

 हमारी गौरैया और इनवारमेंट वैरियर्स

Hamari Gauraiya and Environment Warriors

*सम्पादक -डॉ .लीना

*सहायक सम्पादक -निशांत रंजन

उद्देश्य

विश्व गौरैया दिवस: एक साझा संकल्प

20 मार्च 2010 को जब विश्व गौरैया दिवस की शुरुआत हुई, तो मकसद साफ था—इस नन्हीं जान को लुप्त होने से बचाना। इस मुहिम को मजबूती देते हुए दिल्ली सरकार ने 15 अगस्त 2012 और बिहार सरकार ने 16 अप्रैल 2013 को गौरैया को अपना राजकीय पक्षी घोषित किया। तब से लेकर आज तक, सरकारी संस्थाओं और निजी संगठनों के साझा प्रयासों से गौरैया की ‘घर वापसी’ का अभियान निरंतर जारी है।

घर-आँगन, खेत-खलिहान में चहकने-फुदकने वाली गौरैया की घटती संख्या को रोकना और उनकी आबादी को बढ़ाने के लिए एक सुरक्षित और अनुकूल वातावरण सुनिश्चित करना। उद्देश्य है सभी गौरैया संरक्षकों का …इसमें हमारी गौरैया और पर्यावरण योद्धा(Hamari Gauraiya and Environment Warriors) भी शामिल है।

प्रधानमंत्री द्वारा गौरैया को संरक्षित करने को लेकर ‘मन की बात’ में कई बार सन्देश दिया गया हैं :- “विश्व गौरैया दिवस (20 मार्च) पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नन्हीं गौरैया को हमारे पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए उनके संरक्षण पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि शहरीकरण और प्रदूषण के कारण घटती इनकी संख्या पर्यावरण असंतुलन का संकेत है, इसलिए घरों में दाना-पानी रखकर और घोंसले बनाकर इनके प्रति स्नेह और जिम्मेदारी निभाएं।

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