संजय कुमार/ घरेलू गौरैया एक बेहद छोटी और फुर्तीली चिड़िया है। वजन सिर्फ 24-30 ग्राम। उसके शरीर में लगभग 2000 पंख होते हैं और सारे पंख मिलाकर सिर्फ 2.5 से 3 ग्राम के होते हैं । शरीर में दो डायना होता है, प्रत्येक में 16-16 पंख और पूँछ में दस पंख,जो उसकी जीवनशैली, सुरक्षा और उड़ान के लिए बेहद खास तरीके से बने हैं। प्रकृति ने तीन ग्राम के पंखों में पूरा ‘एयरोनॉटिक्स लैब’ फिट कर दिया है,जो उसके उड़ान को आसान और खास बनाते हैं ।
गौरैया के पंख मुख्य रूप से भूरे, मटमैले, काले और सफेद रंग के मिश्रण लिये होते हैं।यह ‘सादा’ रंग ही उसकी सबसे बड़ी ताकत है। सूखी टहनियों, मिट्टी, झाड़ियों और ईंट की दीवार में बैठी गौरैया एकदम घुल-मिल जाती है। इसी छलावरण की वजह से वह बाज, शिकरा, बिल्ली जैसे शिकारी बचती है। भारत के पक्षीमैन डॉ. सलीम अली ने लिखा है, “गौरैया के पंख देखो, प्रकृति का किफायती डिजाइन। न भड़कीला, न डरावना, फिर भी दुनिया जीत लेती है।
नर और मादा गौरैया की पंख से पहचान होती है। नर और मादा गौरैया के पंखों में साफ अंतर होता है। नर गौरैया की पीठ पर गहरे भूरे रंग की धारियां होती हैं। गले पर काला ‘बिब’ यानी धब्बा होता है। गाल चटक सफेद। जितना बड़ा और गहरा बिब, उतना ताकतवर नर होता है। मादा इसी बिब को देखकर अपना साथी चुनती है।यह उसके स्वस्थ और बलशाली होने का प्संकेत है । अमूमन देखा गया है जिस नर गौरैया का बिब हल्का होता है वह कमजोर या बीमार सा दिखता है।
मादा गौरैया के पंख हल्के भूरे और मटमैले होते हैं।गले में न काला बिब, न चटक गाल। आँख के ऊपर बस हल्की पीली लाइन होती है, यह उसके लिए सुरक्षा रंग माना जाता है। घोंसले में बच्चों के साथ बैठती है तो दुश्मन की नजर से बचती है।
गौरैया के पंख शरीर के अनुपात में छोटे और थोड़े गोलाकार होते हैं। यह बनावट उसे घनी झाड़ियों, तंग गलियों और इंसानी बस्तियों के बीच बिजली की तरह मुड़ने में मदद करती है। पंख की बनावट की वजह से उड़ते हुए सीधे होल,खोह जहाँ इनका घोंसला होता है सीधे प्रवेश कर जाते हैं। अपने छोटे पंखों के कारण गौरैया बहुत लंबी दूरी की निरंतर उड़ान नहीं भर पाती है।लेकिन छोटी छोटी उड़ान के जरिये लंबी उड़ान पूरी कर लेती है । इसकी उड़ान ‘फड़फड़ाने वाली’ होती है।उड़ती है तो पंख से आवाज होती है।यह तेजी से एक सेकंड में 13 बार पंख फड़फड़ाकर थोड़ी दूर जाती है और फिर पंखों को सिकोड़कर हवा में तैरती है। इसी से वह खिड़की की ग्रिल, बिजली के तार और मटके के किनारे पर उड़ने के दौरान उतर कर बैठ जाती है ।

शोध बताते हैं कि गौरैया के शरीर पर छोटे बड़े लगभग 3000 पंख होते हैं।सब का काम अपना अपना होता है । पूँछ मजबूत और लंबे होते हैं। हवा का दबाव झेलकर उड़ने, मुड़ने और ब्रेक लगाने में मदद करते हैं। पूँछ के 12 पंख ‘रडर’ का काम करते हैं। रॉक चैट पक्षी की तरह बैठने के दौरान पूंछ को तेजी से नीचे नहीं कर पाती,हाँ जब गुस्से या ख़ुश होती है तो पूंछ को पटकती है।
मुख्य पंखों के नीचे, त्वचा के करीब छोटे और बेहद मुलायम पंख होते हैं। इनका मुख्य काम शरीर का तापमान नियंत्रित रखना होता है।सर्दी और गर्मी में इसकी भूमिका बढ़ जाती है । सर्दियों में गर्म रखते हैं तो वहीं गर्मियों में इन्सुलेशन देते हैं। अपने पंखों की वजह से गौरैया 10°C में भी जिंदा रह लेती है।
गौरैया अपने पंखों की देखभाल खुद करती है। अपनी चोंच से पंख संवारती रहती है। उसकी पूँछ के पास ‘प्रीन ग्लैंड’ नाम की ग्रंथि भी होती है। इससे तेल निकलता है। गौरैया इस तेल को चोंच से पूरे पंखों पर लगाती है। इससे पंख वॉटरप्रूफ और चमकदार बने रहते हैं।बारिश में भीगने के बाद भी अंदर का डाउन सूखा रहता है। अक्सर गौरैया को सूखी मिट्टी या धूल में पंख फड़फड़ाते देखा जाता है। इसे ‘डस्ट बाथ’ धूल स्नान कहते हैं। ऐसा करने से पंखों में छुपे जूँ, परजीवी और अतिरिक्त तेल साफ हो जाता है। यह उसका ‘ड्राई क्लीनिंग’ सिस्टम है।
नर गौरैया जब गुस्से में होता है या अपने साथी को रिझा ररहा होता है, तो वह पंखों को फैलाकर और पूँछ को ऊपर उठाकर खास तरह का नृत्य करता है। नर, मादा के सामने पंख फुलाकर, पूँछ पटककर ‘चीप-चीप’ गाता है।मादा गौरैया नर के नृत्य से प्रभावित होती है ।
गौरैया के पंख सिर्फ उड़ने के लिए नहीं हैं। ये उसका रेनकोट हैं, हीटर हैं, पहचान पत्र हैं और प्रेम-पत्र भी। तीन ग्राम वजनी पंखों में पूरी जिंदगी लिये घूमती ह।पंख उसके शरीर का तकनीकी पक्ष है ।













