गौरैया के लिए लगायें झाड़ीनुमा पेड़

संजय कुमार/ गौरैया को झाड़ी पसंद है, इसलिए क़ि उसके लिये छुपने, आराम और सुरक्षा के लिये बेहतर जगह है। झाड़ी में वह शिकारी पशु-पक्षियों जैसे  बिल्ली, सांप, बाज आदि के हमले से आसानी से अपना बचवा करती है। बाड़, देशी झाड़ियाँ, बोगनवेलिया, कनेल, सूरजमुखी, कॉसमॉस, मेहंदी, मधुमालती, करौंदा आदि की झाड़ी इनको खास पसंद…

संजय कुमार/ गौरैया को झाड़ी पसंद है, इसलिए क़ि उसके लिये छुपने, आराम और सुरक्षा के लिये बेहतर जगह है। झाड़ी में वह शिकारी पशु-पक्षियों जैसे  बिल्ली, सांप, बाज आदि के हमले से आसानी से अपना बचवा करती है। बाड़, देशी झाड़ियाँ, बोगनवेलिया, कनेल, सूरजमुखी, कॉसमॉस, मेहंदी, मधुमालती, करौंदा आदि की झाड़ी इनको खास पसंद है, जो इनका प्राकृतिक बसेरा है । झाड़ी में छोटे कीड़े-मकोड़े मिल जाते हैं जो इनके बच्चों का आहार होता है। घनी पत्तियों के बीच इनको धूप और तेज बारिश से बचाव भी मिलता है।

पहले घरों के साथ-साथ बाग-बगीचा-बाड़ी का होना आम बात थी। जहाँ साग-सब्जी,फल-फूल उगाये जाते थे। बाड़ को हेज और पेड़ों से बनाया जाता था। जहाँ चिड़ियों का बसेरा होता था, लेकिन अब बढ़ती जनसंख्या की वजह से बाग-बगीचा-बाड़ी का कंसेप्ट ख़त्म हो गया। बहुत कम ही घर बचे हैं जो बाग-बगीचा-बाड़ी को लिए हुये हैं।गाँव में भी कमोवेश कम हुये हैं। अगर आप गौरैया को बुलाना चाहते हैं तो घर के आसपास मेहंदी, करौंदा, चांदनी आदि की झाड़ी लगा दें। साथ में एक पानी का कटोरा और थोड़ा दाना (आहर)  भी रख दें। दोनों पक्षियों खासकर गौरैया को आकर्षित करते हैं.

घरेलू गौरैया की आबादी को अपने बगीचे में आकर्षित करने और उन्हें सुरक्षित माहौल देने के लिए आप अपनी सुविधा से पौधों और बाड़ का चुनाव कर सकते हैं। गौरैया घने पौधों को पसंद करती है ताकि वे हमलावार पक्षी, बिल्लियों और शिकारियों से बच सकें और अपना घोंसला बना सकें। यों तो घरेलू गौरैया अपना घोंसला इंसान के घरों में बनाती है, लेकिन झाड़ या लंबे घास के बीच भी बना लेती है। देशी झाड़ियाँ जो घनी होती है,जो गौरैया के लिए सबसे अच्छी होती हैं। बोगनवेलिया, कनेल  और करौंदा जैसी झाड़ियाँ बहुत उपयुक्त हैं क्योंकि इनमें कांटे होते हैं, जो गौरैया को प्राकृतिक सुरक्षा प्रदान करते हैं। गौरैया को अनाज और बीज खाना पसंद है। अपने बगीचे में सूरजमुखी, कॉसमॉस  और मैरीगोल्ड लगाएं। इनके सूखने के बाद इनके बीज पक्षियों का बेहतरीन भोजन बनते हैं। यदि संभव हो, तो बाजरा, ज्वार या रागी जैसे छोटे अनाज के पौधे लगाएं। साथ ही, बगीचे के एक कोने में थोड़ी लंबी घास रहने दें, क्योंकि वे घास के बीजों को खाना बहुत पसंद करती हैं। बाड़ न केवल बगीचे को परिभाषित करती है, बल्कि यह गौरैया के लिए एक ‘हाईवे’ की तरह काम करती है जहाँ वे छिपकर एक जगह से दूसरी जगह जा सकती हैं। मेंहदी का बाड़ सबसे बेहतरीन विकल्प है। यह बहुत घनी होती है और इसे आसानी से छाँटा  जा सकता है। इसमें गौरैया सुरक्षित महसूस करती हैं। कैरिसा में छोटे-छोटे कांटे होते हैं, जो गौरैया को बिल्लियों और अन्य बड़े पक्षियों से बचाने में बहुत प्रभावी हैं। थूजा  एक सदाबहार पौधा है जो काफी घना हो जाता है और पक्षियों के छिपने के लिए सुरक्षित जगह बनाता है। मधुकामनी का यह पौधा न केवल दिखने में सुंदर है और इसमें खुशबू भी आती है, बल्कि इसकी घनी पत्तियां छोटे पक्षियों के लिए एक आदर्श आश्रय स्थल हैं। गौरैया अपने बच्चों को खिलाने के लिए अक्सर छोटे कीड़ों का उपयोग करती है। बगीचे में रसायनों का प्रयोग न करें ताकि प्राकृतिक रूप से कीड़े उपलब्ध रहें।

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संयोजक

 हमारी गौरैया और इनवारमेंट वैरियर्स

Hamari Gauraiya and Environment Warriors

*सम्पादक -डॉ .लीना

*सहायक सम्पादक -निशांत रंजन

उद्देश्य

विश्व गौरैया दिवस: एक साझा संकल्प

20 मार्च 2010 को जब विश्व गौरैया दिवस की शुरुआत हुई, तो मकसद साफ था—इस नन्हीं जान को लुप्त होने से बचाना। इस मुहिम को मजबूती देते हुए दिल्ली सरकार ने 15 अगस्त 2012 और बिहार सरकार ने 16 अप्रैल 2013 को गौरैया को अपना राजकीय पक्षी घोषित किया। तब से लेकर आज तक, सरकारी संस्थाओं और निजी संगठनों के साझा प्रयासों से गौरैया की ‘घर वापसी’ का अभियान निरंतर जारी है।

घर-आँगन, खेत-खलिहान में चहकने-फुदकने वाली गौरैया की घटती संख्या को रोकना और उनकी आबादी को बढ़ाने के लिए एक सुरक्षित और अनुकूल वातावरण सुनिश्चित करना। उद्देश्य है सभी गौरैया संरक्षकों का …इसमें हमारी गौरैया और पर्यावरण योद्धा(Hamari Gauraiya and Environment Warriors) भी शामिल है।

प्रधानमंत्री द्वारा गौरैया को संरक्षित करने को लेकर ‘मन की बात’ में कई बार सन्देश दिया गया हैं :- “विश्व गौरैया दिवस (20 मार्च) पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नन्हीं गौरैया को हमारे पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए उनके संरक्षण पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि शहरीकरण और प्रदूषण के कारण घटती इनकी संख्या पर्यावरण असंतुलन का संकेत है, इसलिए घरों में दाना-पानी रखकर और घोंसले बनाकर इनके प्रति स्नेह और जिम्मेदारी निभाएं।

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