डायनासोर का साथी रहा कछुआ भी कहीं गायब न हो जाये

“विश्व कछुआ दिवस 23 मई “ संजय कुमार/ जी हां, कछुए इस धरती पर तब से हैं जब डायनासोर हुआ करते थे। कछुओं ने डायनासोर के साथ उल्कापिंड की टक्कर झेली, बर्फ युग देखा, महाद्वीपों को टूटते-बनते देखा। प्रकृति के खेल में आज डायनासोर नहीं हैं, लेकिन सच यह है कि इन्सान की वजह से…

“विश्व कछुआ दिवस 23 मई “

संजय कुमार/ जी हां, कछुए इस धरती पर तब से हैं जब डायनासोर हुआ करते थे। कछुओं ने डायनासोर के साथ उल्कापिंड की टक्कर झेली, बर्फ युग देखा, महाद्वीपों को टूटते-बनते देखा। प्रकृति के खेल में आज डायनासोर नहीं हैं, लेकिन सच यह है कि इन्सान की वजह से कछुआ तबाह हो रहे है। आज विश्व कछुआ दिवस है। और, सच्चाई यह है कि यह प्राचीन योद्धा अब अपनी आखिरी लड़ाई लड़ रहा है। यह 22 करोड़ साल पुराना प्रकृति का साथी है।

हम समुन्द्र में प्लास्टिक फेंक और शिकार कर उसे गायब कर रहे हैं । नदी का कछुआ जहां सालों से अंडे देते आए, वहीं आज नदी सुख गया है,प्रदूषण का भेंट चढ़ चुका है या रिसॉर्ट या इमारते खड़ी हो गई है । नदी रेत खनन ने उनके बसेरे को उजाड़ दिए हैं तो वही तालाबों के दोहन से कछुआ दुनिया छोड़ रहे है।

भाग्य बदलने,मांस,दवा आदि के लिए हर साल कछुए तस्करी की भेंट चढ़ जाते हैं। जबकि कछुआ सिर्फ एक जीव है वह किसी का भाग्य नहीं बदलता, न ही उसके मांस को खाने से इंसान के शरीर को कोई फायदा पहुँचता है। कछुआ संरक्षण को लेकर वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 के बावजूद कालाबाजारी रुकी नहीं है।

समुद्री कछुआ को पल्साटिक से खतरा हो रहा है। वह प्लास्टिक की थैली और जेलीफिश में फर्क नहीं कर पाता। वो थैली खाता है, दम घुटने से मर जाता है।

वहीँ ग्लोबल वार्मिंग ने रेत का तापमान बढ़ा दिया है। इससे प्रजनन पर प्रभाव पर हरा है । देखें तो कछुआ कोई शोपीस नहीं है। कई लोग दुकान और घरों में इसे रखते हैं। दरअसल में ये हमारे इकोसिस्टम का हिस्सा है और ‘सफाई कर्मचारी’ है।नदियों का फिल्टर हैं । तालाब के कछुए सड़े-गले जीव और पौधे खाकर पानी साफ रखते हैं। ग्रीन सी टर्टल समुद्री घास को चरता है। ये घास मछलियों की नर्सरी है। घास मरी तो मछली गई।

भारत में कछुए वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 के अनुसूची -I में हैं। इसमें कड़े प्रवधान है । कछुआ को नुकसान पहुँचाने के दौरान पकड़े गए तो 7 साल की जेल है । वैसे कछुओं को संरक्षण की पहल चल रही है जैसे ओडिशा में सबसे बड़ा ‘ओलिव रिडले’ कछुओं का अड्डा है।भारत में कछुओं की लगभग 29 प्रजातियां पाई जाती हैं, जिनमें मीठे पानी के कछुए और समुद्री कछुए शामिल हैं। भारत में साल 1975 में ही कछुआ संरक्षण परियोजना की शुरुआत हो गई थी। नवंबर 1999 में कछुओं के संरक्षण के लिए एक बड़ा कदम उठाया गया, जब पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम के सहयोग से राष्ट्रीय समुद्री कछुआ संरक्षण परियोजना शुरू की। इसका मुख्य मकसद लुप्तप्रायः प्रजातियों के कछुओं की रक्षा करना है। इस परियोजना के अंतर्गत ओडिशा के तटों और अन्य तटीय क्षेत्रों में कछुओं के अंडों को शिकारियों से बचाया जाता है और सुरक्षित रूप से समुद्र में छोड़ने की व्यवस्था की जाती है। तो आइये कछुआ को बचने का संकल्प लें ।

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संयोजक

 हमारी गौरैया और इनवारमेंट वैरियर्स

Hamari Gauraiya and Environment Warriors

*सम्पादक -डॉ .लीना

*सहायक सम्पादक -निशांत रंजन

उद्देश्य

विश्व गौरैया दिवस: एक साझा संकल्प

20 मार्च 2010 को जब विश्व गौरैया दिवस की शुरुआत हुई, तो मकसद साफ था—इस नन्हीं जान को लुप्त होने से बचाना। इस मुहिम को मजबूती देते हुए दिल्ली सरकार ने 15 अगस्त 2012 और बिहार सरकार ने 16 अप्रैल 2013 को गौरैया को अपना राजकीय पक्षी घोषित किया। तब से लेकर आज तक, सरकारी संस्थाओं और निजी संगठनों के साझा प्रयासों से गौरैया की ‘घर वापसी’ का अभियान निरंतर जारी है।

घर-आँगन, खेत-खलिहान में चहकने-फुदकने वाली गौरैया की घटती संख्या को रोकना और उनकी आबादी को बढ़ाने के लिए एक सुरक्षित और अनुकूल वातावरण सुनिश्चित करना। उद्देश्य है सभी गौरैया संरक्षकों का …इसमें हमारी गौरैया और पर्यावरण योद्धा(Hamari Gauraiya and Environment Warriors) भी शामिल है।

प्रधानमंत्री द्वारा गौरैया को संरक्षित करने को लेकर ‘मन की बात’ में कई बार सन्देश दिया गया हैं :- “विश्व गौरैया दिवस (20 मार्च) पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नन्हीं गौरैया को हमारे पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए उनके संरक्षण पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि शहरीकरण और प्रदूषण के कारण घटती इनकी संख्या पर्यावरण असंतुलन का संकेत है, इसलिए घरों में दाना-पानी रखकर और घोंसले बनाकर इनके प्रति स्नेह और जिम्मेदारी निभाएं।

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