गौरैया,आँगन की रौनक”
– डॉ.अश्वनी
नन्ही सी चिड़िया, प्यारी सी गौरैया,
आँगन की रौनक, खुशियों की छैया।
चहचहाती थी जो हर सुबह-सवेरे,
अब क्यों हो गई दूर हमसे धीरे-धीरे?
छतों के कोने, दीवारों की दरार,
वहीं था उसका छोटा सा संसार।
पर कंक्रीट के जंगल, मोबाइल की तरंग,
ले गई उसकी खुशियों के सब रंग।
आओ मिलकर एक प्रयास करें,
उसके लिए फिर से आस बनें।
पानी के दाने, थोड़ी सी छाँव,
लौट आएगी गौरैया हमारे गाँव।
सीखा रही जीवन
नन्ही सी गौरैया बैठी आँगन में,
सीखा रही जीवन अपने ही दामन में।
न धन की चाह, न ऊँचा उड़ान का घमंड,
छोटे से जीवन में भी कितना है आनंद।
तिनका-तिनका जोड़कर घर बनाती है,
हर मुश्किल में भी मुस्कुराती है।
न किसी से ईर्ष्या, न कोई शिकायत,
सादगी में ही उसकी है असली इबादत।
आँधी आए, तूफ़ान भी घेर ले,
फिर भी हिम्मत से अपने पंख फैला ले।
गिरकर उठना, यही उसका ज्ञान,
हर दिन जीना, यही है पहचान।
ऐ इंसान, क्यों दौड़ता है यूँ बेवजह,
रुककर देख, जीवन है कितना सजा।
गौरैया से सीख ले ये छोटी सी बात,
सुख सादगी में है, न कि दौलत की सौगात।
















