जलवायु परिवर्तन से गौरैया को खतरा

संजय कुमार / गौरैया  की  संख्या  में  कमी  या विलुप्ति  के  पीछे  के कारणों में आहार की  कमी, बढ़ता  आवासीय  संकट, कीटनाशक का व्यापक प्रयोग, जीवनशैली  में  बदलाव, प्रदूषण  और  मोबाइल फोन टावर से निकलने वाले  रेडिएशन  को  दोषी  बताया  जाता रहा है, वहीँ एक बड़ा कारण जलवायु परिवर्तन भी है। केवल गौरैया ही नहीं,…

संजय कुमार / गौरैया  की  संख्या  में  कमी  या विलुप्ति  के  पीछे  के कारणों में आहार की  कमी, बढ़ता  आवासीय  संकट, कीटनाशक का व्यापक प्रयोग, जीवनशैली  में  बदलाव, प्रदूषण  और  मोबाइल फोन टावर से निकलने वाले  रेडिएशन  को  दोषी  बताया  जाता रहा है, वहीँ एक बड़ा कारण जलवायु परिवर्तन भी है। केवल गौरैया ही नहीं, दूसरे पक्षियों को भी इसने प्रभावित किया है।

जलवायु परिवर्तन की चपेट में आज लगभग पूरी दुनिया है। इसने सिर्फ इंसानों को ही अपना निशाना नहीं बनाया है। बल्कि, इसका असर जीवों, पेड़-पौधों, और इकोसिस्टम पर भी पड़ रहा है। रिसर्च के मुताबिक पिछले 50 वर्षों के दौरान जलवायु परिवर्तन ने दुनिया भर में पक्षियों को प्रभावित किया है। इसकी वजह से पक्षियों के बच्चों की जन्मदर में गिरावट आई है।

गौरैया पर भी जलवायु परिवर्तन का असर देखने को मिलता है। गौरैया का प्रजनन काल अप्रैल से अगस्त तक अमूमन होता है। जलवायु परिवर्तन की वहज से प्रजनन काल में आगे पीछे भी देखा जा रहा है।  बल्कि कई सालों से गौरैया के बच्चे बिहार के कई इलाकों में कम दिखें तो कही नहीं। अमूमन बरसात आते ही झुण्ड में नए बच्चे युवा होकर दिखने लगते हैं। हमारी गौरैया और इनवारमेंटल वारियर्स के सदस्यों ने बिहार के कई इलाकों में सर्वे के दौरान नवम्बर माह में गौरैया के बच्चे को देखा। गौरैया मौसम में उतार चढ़ाव यानि जलवायु परिवर्तन का असर साफ़ दिखा था। भीषण गरमी और सर्दी ने उन पर कहर बरपाया है, कई इलाकों से यह गायब या कम हो गयी। मौसम में प्रतिकूल मौसम होने से ये अचानक अपने अधिवास से गायब हो जाती है। जैसे ही मौसम अनुकूल हो जाता है ये फिर अचानक से अपने पुराने अधिवास पर आ जाती है। इसके पीछे का कारण उन्हें मालूम होता है कि वहां उनके दाना-पानी और आवास की व्यवस्था है। हालाँकि लौटने वाली गौरैयों  की संख्या में कमी  देखी जाती है। जाहिर है वे पलायन कर गयी या हादसे का शिकार हो गयी। गौरैया ज्यादा गरमी या ठंड बर्दास्त नहीं कर पाती है। गौरैया संरक्षण में लगे लोगों को अक्सर मौसम की मार से घायल गौरैया मिलती रहती है, जिसे उपचार के बाद उड़ा दिया जाता है इअक मामलों में उनकी मौत हो जाती है। हर मौसम में जहाँ का जलवायु गौरैया के लिए अनुकूल होता है देर सबेर रहने जरुर आ जाती है।

जर्नल प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज (पनास) में प्रकाशित रिपोर्ट में शोधकर्ताओं ने दुनिया भर में पक्षियों की 104 प्रजातियों पर पिछले 50 वर्षों तक अध्ययन किया है। नतीजे में बताया गया कि जलवायु में आता बदलाव पक्षियों की प्रजनन दर में कमी की वजह बन रहा है। आशंका भी जताई गयी कि प्रजनन दर में आती यह कमी बड़े और प्रवासी पक्षियों को कहीं ज्यादा प्रभावित करेंगे। रिसर्च के मुताबिक अध्ययन किए गए 56.7 फीसदी पक्षियों की प्रजनन दर में गिरावट दर्ज की गई थी, वजह बढ़ता तापमान था।

बात गौरैया कि तो ऑर्निथोलॉजिकल एप्लिकेशन में एक नए अध्ययन से पता चलता है कि जलवायु परिवर्तन के कारण कुछ गौरैया प्रजातियाँ सदी के भीतर विलुप्त हो जाएँगी। साइनस न्यूज़ टुडे की 19 अक्तूबर 2021 की रिपोर्ट को देखें तो दुनिया में जैव विविधता (Biodiversity) बेहद तेजी से खत्म हो रही है। हम अपने आसपास के कई जीवों को याद करें, तो पाएंगे कि जो कभी बहुतायत में थे लेकिन वे अब नहीं के बराबर दिखते हैं। इनमें घरेलू गौरैया चिड़िया भी शामिल हैं।

नन्ही गौरैया हमारे घर आंगन, खेत-खलिहान में चहचहाती थी लेकिन अब नहीं के बारबर दिखती हैं। घर आँगन एवं खेत-खलिहान में बदलाव हुआ और उसे हमने बाहर कर दिया। रहने-खाने और आवास से उसे दूर किया। मौसम की मार से खपरैल का घर और आँगन-बगीचे में लगे पेड़ पौधे उसे बचाते थे लेकिन अब नहीं। दरअसल, ऐसा केवल हमारे यहां नहीं बल्कि पूरी दुनिया में हो रहा है। एक रिपोर्टे के मुताबिक धरती पर जीवों की 90 लाख प्रजातियां और इनमें से 10 लाख प्रजातियों के इसी सदी में विलुप्त हो जाने का खतरा है। अक्तूबर 2021 में आयोजित संयुक्त राष्ट्र के 15वें जैव विविधता सम्मेलन (सीओपी15) में इन बातों पर चिंता जताई गई थी। तो वहीँ इंटरनेशनल यूनियन फॉर कॉनसरवेशन ऑफ़ नेचर(IUCN) – ने 2008 में गौरैया सहित कई पक्षियों को  रेड लिस्ट में डाला था। इसके पीछे जलवायु परिवर्तन के कई कारकों को उत्प्रेरक के बताया गया, जिसने दुनिया के आठ में से एक पक्षी को विलुप्त होने के खतरे में डाल दिया। आईयूसीएन के अनुसार पक्षी के ऊपर जलवायु परिवर्तन के कारण भारी दबाव में हैं।

अगर बात करें कि जलवायु परिवर्तन आखिर है क्या? तो इससे जानना जरुरी है। जलवायु परिवर्तन का तात्पर्य तापमान और मौसम के पैटर्न में दीर्घकालिक बदलाव से है। सूर्य की गतिविधि में बदलाव या बड़े ज्वालामुखी विस्फोटों के कारण ऐसे बदलाव प्राकृतिक हो सकते हैं। लेकिन इसमें 1800 के दशक से,  मानव गतिविधियाँ भी जलवायु परिवर्तन में शामिल हो गयी हैं । मानवीय विकास ने तस्वीर बदली है ।  मुख्य रूप से कोयला, तेल और गैस जैसे जीवाश्म ईंधन के जलने के कारण। जीवाश्म ईंधन जलाने से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन उत्पन्न होता है जो पृथ्वी के चारों ओर लिपटे कंबल की तरह काम करता है, जो सूर्य की गर्मी को घेरे में लेता है और तापमान बढ़ाता है। जलवायु परिवर्तन का कारण बनने वाली मुख्य ग्रीनहाउस गैसों में कार्बन डाइऑक्साइड और मीथेन शामिल हैं। उदाहरण के लिए, ये कार चलाने के लिए गैसोलीन या किसी इमारत को गर्म करने के लिए कोयले का उपयोग करने से आते हैं। भूमि साफ़ करने और जंगलों को काटने से भी कार्बन डाइऑक्साइड निकल सकता है। कृषि, तेल और गैस संचालन मीथेन उत्सर्जन के प्रमुख स्रोत हैं। ऊर्जा, उद्योग, परिवहन, भवन, कृषि और भूमि उपयोग  ग्रीनहाउस गैसों का कारण बनने वाले  मुख्य क्षेत्रों में से हैं।

जलवायु वैज्ञानिकों की माने तो, पिछले 200 वर्षों में लगभग सभी वैश्विक तापन के लिए मनुष्य जिम्मेदार हैं। मानवीय गतिविधियाँ ग्रीनहाउस गैसों का कारण बन रही हैं जो कम से कम पिछले दो हज़ार वर्षों में किसी भी समय की तुलना में दुनिया को तेज़ी से गर्म कर रही हैं। जलवायु परिवर्तन के परिणामों में अब अन्य के अलावा, तीव्र सूखा, पानी की कमी, भीषण आग, समुद्र का बढ़ता स्तर, बाढ़, ध्रुवीय बर्फ का पिघलना, विनाशकारी तूफान और घटती जैव विविधता शामिल हैं। हम विभिन्न तरीकों से जलवायु परिवर्तन का अनुभव कर रहे हैं।

जलवायु परिवर्तन के लिए  जिम्मेदार मनुष्य को जागरूक होना होगा। वरना गौरैया सहित अन्य पशु पक्षि जिस तरह से विलुप्ति की ओर बढ़ रहे है वैसे ही के दिन इन्सान का भी नंबर आएगा क्योंकि जलवायु परिवर्तन की जद में वह भी है।

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संयोजक

 हमारी गौरैया और इनवारमेंट वैरियर्स

Hamari Gauraiya and Environment Warriors

*सम्पादक -डॉ .लीना

*सहायक सम्पादक -निशांत रंजन

उद्देश्य

विश्व गौरैया दिवस: एक साझा संकल्प

20 मार्च 2010 को जब विश्व गौरैया दिवस की शुरुआत हुई, तो मकसद साफ था—इस नन्हीं जान को लुप्त होने से बचाना। इस मुहिम को मजबूती देते हुए दिल्ली सरकार ने 15 अगस्त 2012 और बिहार सरकार ने 16 अप्रैल 2013 को गौरैया को अपना राजकीय पक्षी घोषित किया। तब से लेकर आज तक, सरकारी संस्थाओं और निजी संगठनों के साझा प्रयासों से गौरैया की ‘घर वापसी’ का अभियान निरंतर जारी है।

घर-आँगन, खेत-खलिहान में चहकने-फुदकने वाली गौरैया की घटती संख्या को रोकना और उनकी आबादी को बढ़ाने के लिए एक सुरक्षित और अनुकूल वातावरण सुनिश्चित करना। उद्देश्य है सभी गौरैया संरक्षकों का …इसमें हमारी गौरैया और पर्यावरण योद्धा(Hamari Gauraiya and Environment Warriors) भी शामिल है।

प्रधानमंत्री द्वारा गौरैया को संरक्षित करने को लेकर ‘मन की बात’ में कई बार सन्देश दिया गया हैं :- “विश्व गौरैया दिवस (20 मार्च) पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नन्हीं गौरैया को हमारे पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए उनके संरक्षण पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि शहरीकरण और प्रदूषण के कारण घटती इनकी संख्या पर्यावरण असंतुलन का संकेत है, इसलिए घरों में दाना-पानी रखकर और घोंसले बनाकर इनके प्रति स्नेह और जिम्मेदारी निभाएं।

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