संजय कुमार / घरेलू गौरैया की घटती आबादी एक देश की तस्वीर नहीं है बल्कि पूरा विश्व शामिल है खासकर जहाँ गौरैया बड़ी संख्या में रहती थी या रहती है। बात ब्रिटेन की जहाँ कभी ब्रिटेन की घरों की छतों तक इसकी चहचहाहट आम बात थी।लेकिन कुछ दशकों में इसकी संख्या में इतनी तेज़ गिरावट दर्ज की गई है कि आज यह संरक्षण की दृष्टि से चिंता का विषय बन चुकी है। ब्रिटेन में पक्षियों के संरक्षण से जुड़ी संस्थाओं और वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार वर्ष 1977 से 2018 के बीच घरेलू गौरैया की आबादी में लगभग 65 प्रतिशत की कमी आई है। यह गिरावट केवल किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रही, बल्कि ग्रामीण और शहरी-दोनों क्षेत्रों में अलग-अलग कारणों से देखी गई। गौरैया की घर वापसी को लेकर पहल भी शुरू है।
घरेलू गौरैया की घटती आबादी के मद्देनजर ग्रामीण क्षेत्रों में गिरावट खेती वाले और ग्रामीण इलाकों में देखे गए। घरेलू गौरैया की आबादी में कमी 1970 के दशक के उत्तरार्ध में शुरू हुई। 1990 के दशक के मध्य तक इनकी संख्या लगभग 60 प्रतिशत घट चुकी थी, जिसके बाद यह अपेक्षाकृत निम्न स्तर पर स्थिर हो गई। शोधकर्ताओं / वैज्ञानिकों का मानना है कि इस गिरावट का प्रमुख कारण कृषि पद्धतियों में आया व्यापक परिवर्तन था। आधुनिक कृषि तकनीकों, रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के बढ़ते प्रयोग, खरपतवार नियंत्रण तथा खेतों की पारंपरिक जैव-विविधता में कमी के कारण गौरैया के लिए उपलब्ध प्राकृतिक भोजन तेजी से घट गया। विशेष रूप से गौरैया के बच्चों को जीवित रहने के लिए जिन छोटे-छोटे कीटों और अन्य अकशेरुकी जीवों की आवश्यकता होती है, उनकी संख्या में भारी कमी आ गई। परिणामस्वरूप प्रजनन सफलता घटती गई और आबादी निरंतर कम होती चली गई।
जहाँ तक शहरी क्षेत्रों में गिरावट का सवाल है तो , शहरी क्षेत्रों में गौरैया की संख्या में गिरावट ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में पहले शुरू हुई। उपलब्ध साक्ष्यों के अनुसार 1950 के दशक से ही शहरों में इनकी आबादी धीरे-धीरे कम होने लगी थी। 1990 के दशक में यह गिरावट अत्यंत तीव्र हो गई और आज तक जारी है।शहरी क्षेत्रों में गौरैया की संख्या घटने के पीछे कई संभावित कारण रहे हैं। मसलन,बच्चों को खिलाने के लिए आवश्यक कीटों की कमी। आधुनिक भवन निर्माण शैली के कारण घोंसला बनाने के लिए उपयुक्त स्थानों का अभाव। अत्यधिक स्वच्छ और कंक्रीट आधारित शहरी वातावरण। बगीचों, झाड़ियों और प्राकृतिक हरित क्षेत्रों में कमी का होना शामिल रहा । हालांकि इन कारणों का समर्थन करने वाले प्रत्यक्ष वैज्ञानिक प्रमाण अभी सीमित हैं, फिर भी अधिकांश पक्षी विशेषज्ञ इन्हें शहरी गौरैया संकट के प्रमुख कारणों में शामिल करते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों के विपरीत शहरों में इनकी आबादी स्थिर नहीं हुई, बल्कि 21वीं सदी में भी लगातार घटती रही।
ब्रिटेन के ऐतिहासिक पृष्ठभूमि खंगाले तो, आधुनिक पक्षी-विज्ञान के विकसित होने से पहले ब्रिटेन में गौरैया की सटीक संख्या का कोई व्यवस्थित रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है। फिर भी ऐतिहासिक साक्ष्य बताते हैं कि 18वीं शताब्दी में “हाई फार्मिंग” अर्थात अधिक उत्पादन वाली कृषि व्यवस्था के विकास के बाद घरेलू गौरैया अत्यंत सामान्य पक्षी बन गई थी। उस समय किसानों की धारणा थी कि गौरैया बड़ी मात्रा में अनाज खाकर कृषि को नुकसान पहुँचाती है। परिणाम स्वरूप इसे कृषि का हानिकारक जीव घोषित किया गया। अनेक स्थानों पर गौरैया के अंडे और मारे गए पक्षियों के बदले पुरस्कार दिए जाते थे। इनके नियंत्रण के लिए “स्पैरो क्लब” बनाए गए, जिनका उद्देश्य गौरैयों की संख्या कम करना था। यह इनामी व्यवस्था 20वीं शताब्दी के प्रारंभिक वर्षों तक जारी रही।
घरेलू गौरैया की गिरावट में शहरीकरण और घोड़ों की भूमिका अहम् रही। 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में ब्रिटेन में तीव्र शहरीकरण हुआ। इस दौरान लगभग 7,50,000 हेक्टेयर कृषि भूमि शहरी विकास में परिवर्तित हो गई। आश्चर्यजनक रूप से इस परिवर्तन का गौरैया को प्रारंभिक दौर में लाभ मिला। उस समय परिवहन का प्रमुख साधन घोड़े थे। घोड़ों के चारे से गिरने अनाज , उनकी लीद में मौजूद बिना पचे बीज तथा सड़कों की अपेक्षाकृत खराब सफाई व्यवस्था गौरैयों के लिए भरपूर भोजन उपलब्ध कराती थी। अस्तबल और पुराने भवन घोंसले बनाने के लिए भी आदर्श स्थान थे। इसलिए शहरीकरण के बावजूद गौरैया की आबादी लंबे समय तक बनी रही। वहीँ, मोटर वाहनों के आगमन का प्रभाव देखें को मिला। 1920 के दशक में जब घोड़ों के स्थान पर मोटर वाहनों का उपयोग तेजी से बढ़ा, तब गौरैया को एक बड़ा झटका लगा। घोड़ों की संख्या कम होने के साथ ही उनके माध्यम से मिलने वाला आहार भी लगभग समाप्त हो गया। हालाँकि, इस परिवर्तन का उस समय व्यवस्थित वैज्ञानिक रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है, फिर भी विशेषज्ञों का मानना है कि शहरी क्षेत्रों में गौरैया की आबादी घटने का यह एक महत्वपूर्ण कारण था। 1930 के दशक तक इस परिवर्तन का अधिकांश प्रभाव दिखाई देने लगा। इसके बाद भी शहरों में गौरैयों की संख्या धीमी गति से घटती रही।
गौरैया की गिरावट को लेकर वैज्ञानिक निगरानी और जनसंख्या का आकलन को देखें तो ब्रिटिश ट्रस्ट फॉर ऑर्निथोलॉजी द्वारा एकत्रित आंकड़ों के विस्तृत विश्लेषण से पता चलता है कि 1970 के आसपास ब्रिटेन में घरेलू गौरैया की प्रजनन करने वाली आबादी लगभग 1.2 से 1.5 करोड़ जोड़ों के बीच थी। खेती वाले क्षेत्रों में पक्षियों की स्थिति जानने के लिए ब्रिटिश ट्रस्ट फॉर ऑर्निथोलॉजी ने कॉमन बर्ड सेंसस कार्यक्रम संचालित किया। 1962 से 2000 के बीच प्रत्येक वर्ष लगभग 200–300 कृषि और वन क्षेत्रों में प्रजनन करने वाले पक्षियों का सर्वेक्षण किया गया। हालांकि यह कार्यक्रम 1962 में प्रारंभ हुआ था, लेकिन शुरुआती वर्षों में घरेलू गौरैया का पर्याप्त रिकॉर्ड नहीं रखा गया। इसलिए इस प्रजाति की विश्वसनीय जनसंख्या सूचकांक 1970 के दशक से उपलब्ध होने लगे।
जहाँ तक वर्तमान स्थिति की बात है, आज ब्रिटेन में घरेलू गौरैया की प्रजनन करने वाली आबादी लगभग 60 लाख जोड़ों तक सीमित रह गई है। अर्थात 1970 के बाद से इनकी संख्या में लगभग 50 से 60 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। वर्तमान में लगभग दो-तिहाई गौरैया मानव-निर्मित क्षेत्रों में रहती हैं, जिनमें से लगभग आधी उपनगरीय इलाकों में पाई जाती हैं। इन क्षेत्रों में इनका घनत्व 2.2 से 3.2 पक्षी प्रति हेक्टेयर है, जबकि कृषि क्षेत्रों में यह केवल 0.25 से 0.45 पक्षी प्रति हेक्टेयर रह गया है। क्षेत्रीय स्तर पर सबसे अधिक गिरावट इंग्लैंड के दक्षिण-पूर्वी भाग में दर्ज की गई है, जबकि वेल्स और स्कॉटलैंड में कुछ क्षेत्रों में इनकी संख्या में वृद्धि भी देखी गई है।
घरेलू गौरैया की घटती आबादी केवल एक पक्षी प्रजाति के संकट की कहानी नहीं है, बल्कि यह पर्यावरणीय असंतुलन का भी संकेत है। गौरैया पारिस्थितिकी तंत्र में कीट नियंत्रण, बीजों के प्रसार और जैव-विविधता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसलिए इनके संरक्षण के लिए ऐसे उपाय आवश्यक हैं जिनसे प्राकृतिक भोजन उपलब्ध हो, शहरी क्षेत्रों में घोंसला बनाने के स्थान सुरक्षित रहें, हरित क्षेत्र बढ़ाए जाएँ तथा कृषि पद्धतियों में जैव-विविधता को प्रोत्साहित किया जाए। यदि समय रहते प्रभावी संरक्षण प्रयास नहीं किए गए, तो यह छोटी-सी चिड़िया भविष्य में और अधिक दुर्लभ होती चली जाएगी। (संदर्भ-Royal Society for the Protection of Birds (RSPB) – House Sparrow. British Trust for Ornithology (BTO) – Common Bird Census एवं House Sparrow Population Studies. Essex Wildlife Trust – House Sparrow Conservation Information.)
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