पहाड़ों में गुम हो रही गौरैया की चीं-चीं

ध्वनि प्रदूषण और पर्यावरणीय बदलावों से गुम हो रही है गौरैया सहित अन्य चिड़ियों की आवाज संजय कुमार/ घरेलू गौरैया का कम दिखाई देना या कुछ इलाकों से उसका गायब हो जाना केवल मैदानी क्षेत्रों की समस्या नहीं है। पहाड़ी इलाकों में भी गौरैया और अन्य पक्षियों की मौजूदगी और उनके प्राकृतिक आवास को लेकर…

ध्वनि प्रदूषण और पर्यावरणीय बदलावों से गुम हो रही है गौरैया सहित अन्य चिड़ियों की आवाज

संजय कुमार/ घरेलू गौरैया का कम दिखाई देना या कुछ इलाकों से उसका गायब हो जाना केवल मैदानी क्षेत्रों की समस्या नहीं है। पहाड़ी इलाकों में भी गौरैया और अन्य पक्षियों की मौजूदगी और उनके प्राकृतिक आवास को लेकर चिंताएं बढ़ रही हैं। उत्तराखंड के अल्मोड़ा और बिनसर क्षेत्र में पक्षी अवलोकन के दौरान अल्मोड़ा-बागेश्वर रोड, भैंसोरी, घाटी में स्थित क्लब महिंद्रा बिनसर वैली रिज़ॉर्ट के जंगल किनारे घरेलू गौरैया और लाल गौरैया का दिखाई देना जहां राहत देता है, वहीं कैंचीधाम क्षेत्र में कभी घरों और आसपास के इलाकों में सुनाई देने वाली गौरैया की चीं-चीं का कम हो जाना कई सवाल खड़े करता है।

बढ़ती वाहनों की आवाजाही, ध्वनि प्रदूषण, पर्यटन का दबाव और पर्यावरण में हो रहे बदलावों के बीच गौरैया सहित अन्य पक्षियों के कलरव से गूंजने वाली पहाड़ियों का प्राकृतिक वातावरण प्रभावित होने की आशंका है। कैंचीधाम से पंगोट तक के क्षेत्र में पक्षियों की विविधता को लेकर पक्षी प्रेमियों और वन्यजीव विशेषज्ञों की चिंता इस बात की ओर इशारा करती है कि पहाड़ों का शांत वातावरण भी अब मानवीय गतिविधियों के दबाव से अछूता नहीं है।

पर्यटन का बढ़ता दबाव और पक्षियों के आवास पर असर

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, कैंचीधाम क्षेत्र में घरों के आसपास आसानी से दिखाई देने वाली गौरैया अब पहले की तुलना में कम नजर आती है। कुछ अन्य पक्षियों की मौजूदगी में भी कमी महसूस किए जाने की बात सामने आई है। हालांकि, किसी पक्षी प्रजाति की संख्या में वास्तविक गिरावट या उसके पलायन की पुष्टि के लिए नियमित और वैज्ञानिक सर्वेक्षण जरूरी है।

कैंचीधाम और पंगोट के आसपास का पहाड़ी क्षेत्र पक्षी विविधता के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जाता है। यहां के जंगल, पेड़-पौधे, झाड़ियां और जलस्रोत विभिन्न पक्षियों को भोजन, आश्रय और प्रजनन के लिए अनुकूल परिस्थितियां उपलब्ध कराते हैं। इस क्षेत्र में लंबे समय से पक्षी अवलोकन की गतिविधियां होती रही हैं। गौरैया के अलावा लाफिंग थ्रश सहित अनेक पक्षी प्रजातियां इस प्राकृतिक परिवेश का हिस्सा रही हैं। बिनसर में गौरैया को झड़ी के बीच आहार तलाशते देखा, फूल-बीच खाती गौरैया दिखी।   लेकिन जैसे-जैसे सड़क यातायात, पर्यटकों की संख्या और मानवीय गतिविधियां बदी हैं, वैसे-वैसे वन क्षेत्रों के आसपास रहने वाले जीव-जंतुओं के लिए चुनौतियां भी बढ़ी हैं। वाहनों का शोर, सड़कों के किनारे बढ़ती गतिविधियां और प्राकृतिक आवास में बदलाव पक्षियों के व्यवहार को प्रभावित कर रही हैं।

गौरैया की चहचहाहट कम होने के पीछे क्या हैं कारण?

पक्षी अवलोकन से जुड़े जगजीवन सिंह की माने तो, कैंचीधाम आने वाले लोग पहले बाबा नीब करौरी महाराज के दर्शन के साथ यहां की प्राकृतिक सुंदरता और पक्षियों की चहचहाहट का आनंद भी लेते थे। समय के साथ क्षेत्र में पर्यटन का दबाव बढ़ा है। ऐसे में वाहनों की आवाजाही और मानवीय गतिविधियों का पक्षियों के प्राकृतिक आवास पर पड़ने वाला असर चिंता का विषय है।

गौरैया आमतौर पर मनुष्य के आसपास रहना पसंद करती है। घरों की छतों, रोशनदानों, छज्जों, झाड़ियों के आसपास उसे घोंसला बनाने तथा भोजन जुटाने के अवसर मिलते हैं। लेकिन केवल मनुष्य की मौजूदगी गौरैया के बने रहने के लिए पर्याप्त नहीं है। उसे सुरक्षित घोंसले, कीटों और अन्य उपयुक्त भोजन, पानी तथा अपेक्षाकृत शांत वातावरण की भी आवश्यकता होती है।

यदि किसी क्षेत्र में पुराने भवनों की बनावट बदल जाती है, घोंसले बनाने की जगहें कम हो जाती हैं, हरियाली घटती है या भोजन की उपलब्धता प्रभावित होती है, तो गौरैया की संख्या पर असर पड़ सकता है। इसके साथ ही लगातार शोर और मानवीय हस्तक्षेप पक्षियों के व्यवहार में बदलाव ला सकते हैं। इसलिए गौरैया के कम दिखाई देने के पीछे किसी एक कारण को जिम्मेदार मानने के बजाय सभी संभावित कारणों की जांच जरूरी है।

ध्वनि प्रदूषण से प्रभावित हो सकता है पक्षियों का जीवन

पक्षियों के लिए आवाज केवल आपस में संवाद करने का माध्यम नहीं है, बल्कि साथी को आकर्षित करने, अपने क्षेत्र की पहचान बताने, खतरे का संकेत देने और समूह के दूसरे सदस्यों से संपर्क बनाए रखने में भी इसकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

वाहनों के हॉर्न, इंजन की आवाज, तेज संगीत और लगातार होने वाला मानवीय शोर पक्षियों की प्राकृतिक आवाजों को दबा सकता है। ऐसी परिस्थितियों में कुछ पक्षियों को एक-दूसरे की आवाज पहचानने या संवाद करने में कठिनाई होती है। लगातार शोर पक्षियों के प्रजनन व्यवहार, घोंसले के आसपास की गतिविधियों और आवास के चयन को प्रभावित करता है।

हालांकि, कैंचीधाम में गौरैया की मौजूदगी कम होने का सीधा कारण ध्वनि प्रदूषण ही है, ऐसा निष्कर्ष निकालने के लिए स्थानीय स्तर पर ठोस आंकड़ों और वैज्ञानिक अध्ययन की जरूरत है। इसके बावजूद, बढ़ते शोर को नियंत्रित करना पक्षियों के साथ-साथ मनुष्यों के स्वास्थ्य और पूरे पर्यावरण के लिए भी आवश्यक है।

उत्तराखंड में गौरैया की स्थिति भी एक जैसी नहीं

भारतीय वन्यजीव संस्थान के वर्ष 2024–25 के राज्यव्यापी सर्वेक्षण से संबंधित उपलब्ध जानकारी के अनुसार, उत्तराखंड की विभिन्न तहसीलों में गौरैया की मौजूदगी में काफी अंतर दर्ज किया गया। बताया गया कि नौ तहसीलों में प्रति 100 मीटर ट्रांसेक्ट पर गौरैया की औसत संख्या एक से कम रही, जबकि दस तहसीलों में यह संख्या पांच से अधिक दर्ज की गई।

ये आंकड़े संकेत देते हैं कि गौरैया की स्थिति पूरे राज्य में एक जैसी नहीं है। कुछ क्षेत्रों में उसकी मौजूदगी बेहतर हो सकती है, जबकि दूसरे इलाकों में वह कम दिखाई दे सकती है। हालांकि, इन आंकड़ों का सही अर्थ समझने के लिए सर्वेक्षण की पद्धति, नमूना क्षेत्रों, गणना की अवधि और पूरी रिपोर्ट का अध्ययन जरूरी है। केवल अलग-अलग तहसीलों के आंकड़ों के आधार पर पूरे राज्य में गौरैया की संख्या घटने या बढ़ने का अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।

बिनसर जैसे प्राकृतिक क्षेत्रों में गौरैया और दूसरी पक्षी प्रजातियों का दिखाई देना इस बात का संकेत है कि उपयुक्त आवास मिलने पर पक्षियों के लिए अनुकूल परिस्थितियां मौजूद रह सकती हैं। ऐसे क्षेत्रों में नियमित पक्षी गणना और आवास की निगरानी से यह समझने में मदद मिल सकती है कि कौन-सी प्रजातियां कहां और किन परिस्थितियों में पाई जा रही हैं। हालाँकि उत्तराखंड में गौरैया पूरी तरह गायब नहीं हुई है। उपलब्ध शोध बताते हैं कि ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में इसके लिए अपेक्षाकृत बेहतर परिस्थितियां मौजूद हैं, जबकि घने शहरी इलाकों में इसकी उपलब्धता कम हो सकती है। हालांकि, राज्य की गौरैया आबादी में समय के साथ कितनी वृद्धि या गिरावट हुई है, इसका निष्कर्ष निकालने के लिए लगातार और तुलनीय सर्वेक्षण जरूरी हैं।

पहाड़ों की खामोशी को समझना होगा

पहाड़ों की पहचान केवल उनकी हरियाली, ऊंची चोटियों और प्राकृतिक सुंदरता से नहीं है। सुबह पक्षियों की चहचहाहट, जंगलों में गूंजती आवाजें और घरों के आसपास फुदकती गौरैया भी इस पर्यावरण की पहचान हैं। यदि इन आवाजों का कम होना केवल संयोग नहीं, बल्कि आवास में बदलाव और बढ़ते मानवीय दबाव का संकेत है, तो इसे समय रहते समझना जरूरी है।

इसके लिए पर्यटन स्थलों पर अनावश्यक हॉर्न बजाने और तेज संगीत पर नियंत्रण, प्राकृतिक जलस्रोतों की सुरक्षा, स्थानीय पेड़-पौधों और झाड़ियों का संरक्षण तथा पक्षियों के घोंसले बनाने की जगहों को बचाने जैसे कदम उठाए जा सकते हैं। सड़क निर्माण और पर्यटन संबंधी योजनाओं में स्थानीय जैव विविधता को भी प्राथमिकता मिलनी चाहिए।

वन विभाग, स्थानीय प्रशासन, पक्षी प्रेमियों और पर्यटन व्यवसाय से जुड़े लोगों को मिलकर नियमित पक्षी गणना करनी चाहिए। कैंचीधाम, पंगोट और बिनसर जैसे क्षेत्रों में एक ही मौसम में नहीं, बल्कि वर्ष के अलग-अलग समय पर पक्षियों की मौजूदगी का अध्ययन किया जाना चाहिए। इससे यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि किसी प्रजाति की संख्या वास्तव में घट रही है, वह मौसम के अनुसार स्थान बदल रही है या उसके दिखाई देने की परिस्थितियों में बदलाव आया है।

गौरैया की चीं-चीं का कम होना केवल एक पक्षी के दिखाई न देने की बात नहीं है। यह हमारे आसपास के पर्यावरण में हो रहे बदलावों को समझने का अवसर भी है। पहाड़ों की प्राकृतिक शांति और जैव विविधता को बचाना है, तो विकास और पर्यटन के साथ प्रकृति के संतुलन का ध्यान रखना होगा।

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संयोजक

 हमारी गौरैया और इनवारमेंट वैरियर्स

Hamari Gauraiya and Environment Warriors

*सम्पादक -डॉ .लीना

*सहायक सम्पादक -निशांत रंजन

उद्देश्य

विश्व गौरैया दिवस: एक साझा संकल्प

20 मार्च 2010 को जब विश्व गौरैया दिवस की शुरुआत हुई, तो मकसद साफ था—इस नन्हीं जान को लुप्त होने से बचाना। इस मुहिम को मजबूती देते हुए दिल्ली सरकार ने 15 अगस्त 2012 और बिहार सरकार ने 16 अप्रैल 2013 को गौरैया को अपना राजकीय पक्षी घोषित किया। तब से लेकर आज तक, सरकारी संस्थाओं और निजी संगठनों के साझा प्रयासों से गौरैया की ‘घर वापसी’ का अभियान निरंतर जारी है।

घर-आँगन, खेत-खलिहान में चहकने-फुदकने वाली गौरैया की घटती संख्या को रोकना और उनकी आबादी को बढ़ाने के लिए एक सुरक्षित और अनुकूल वातावरण सुनिश्चित करना। उद्देश्य है सभी गौरैया संरक्षकों का …इसमें हमारी गौरैया और पर्यावरण योद्धा(Hamari Gauraiya and Environment Warriors) भी शामिल है।

प्रधानमंत्री द्वारा गौरैया को संरक्षित करने को लेकर ‘मन की बात’ में कई बार सन्देश दिया गया हैं :- “विश्व गौरैया दिवस (20 मार्च) पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नन्हीं गौरैया को हमारे पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए उनके संरक्षण पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि शहरीकरण और प्रदूषण के कारण घटती इनकी संख्या पर्यावरण असंतुलन का संकेत है, इसलिए घरों में दाना-पानी रखकर और घोंसले बनाकर इनके प्रति स्नेह और जिम्मेदारी निभाएं।“

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