रसेट गौरैया: भूरे मुकुट और आकर्षक पंखों वाली खूबसूरत चिड़िया

संजय कुमार / रसेट गौरैया (Passer rutilans) गौरैया परिवार का एक सुंदर पक्षी है, जो अपने आकर्षक रंग-रूप और विशिष्ट पहचान के कारण पक्षी प्रेमियों का ध्यान खींचता है। इसके सिर पर भूरे रंग का मुकुट जैसा हिस्सा और छाती पर दिखाई देने वाली भूरी आभा इसे दूसरी गौरैयाओं से अलग पहचान देती है। इसके…

संजय कुमार / रसेट गौरैया (Passer rutilans) गौरैया परिवार का एक सुंदर पक्षी है, जो अपने आकर्षक रंग-रूप और विशिष्ट पहचान के कारण पक्षी प्रेमियों का ध्यान खींचता है। इसके सिर पर भूरे रंग का मुकुट जैसा हिस्सा और छाती पर दिखाई देने वाली भूरी आभा इसे दूसरी गौरैयाओं से अलग पहचान देती है। इसके शरीर के रंगों में भूरापन, हल्के रंगों की छटा और पंखों की सुंदर बनावट देखने को मिलती है। प्राकृतिक वातावरण में यह छोटी-सी चिड़िया अपनी सादगी और खूबसूरती से मन मोह लेती है। उत्तराखंड के अल्मोड़ा में स्थित क्लब महिंद्रा बिनसर वैली, के जंगली इलाकें में दस की संख्या में 18 अक्तूबर 2026 को रसेट गौरैया दिखी और मेरे कैमरे में कैद हुई।

कहाँ पाई जाती है रसेट गौरैया?

रसेट गौरैया मुख्य रूप से हिमालयी क्षेत्रों और पूर्वोत्तर भारत की पहाड़ियों में पाई जाती है। भारत में इसका वितरण जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश सहित हिमालय तथा पूर्वोत्तर के पहाड़ी इलाकों में दर्ज किया गया है। यह नेपाल और भूटान में भी मिलती है।  यह आमतौर पर समुद्र तल से लगभग 500 से 2,700 मीटर की ऊंचाई वाले क्षेत्रों में देखी जाती है, हालांकि अलग-अलग इलाकों में इसकी ऊंचाई संबंधी सीमा बदल सकती है। हल्के जंगल, जंगलों के किनारे, पहाड़ी खेत, सीढ़ीदार खेती वाले क्षेत्र और गांवों के आसपास का वातावरण इसके पसंदीदा आवास हैं। यह बड़े शहरों की तुलना में कम विकसित पहाड़ी इलाकों में अधिक दिखाई देती है।

नर और मादा के रंग-रूप में अंतर

रसेट गौरैया में नर और मादा के रंग-रूप में अंतर देखा जा सकता है। सामान्यतः नर का रंग अधिक गहरा और चमकीला होता है। उसके सिर, पीठ और शरीर के अन्य हिस्सों पर रंगों का संयोजन अधिक स्पष्ट दिखाई देता है। इसके विपरीत, मादा का रंग अपेक्षाकृत हल्का और सादा होता है। यह अंतर प्रकृति में पक्षियों की पहचान करने में मदद करता है। नर गौरैया को अक्सर अधिक सक्रिय और चंचल व्यवहार करते हुए देखा जा सकता है, जबकि मादा का रंग अपेक्षाकृत कम चमकीला होने के कारण वह आसपास के वातावरण में आसानी से घुल-मिल जाती है। हालांकि, नर और मादा के स्वभाव में अंतर को हमेशा निश्चित नियम नहीं माना जा सकता, क्योंकि उनका व्यवहार मौसम, भोजन की उपलब्धता और प्रजनन के समय के अनुसार बदल सकता है।

भोजन और जीवनशैली

रसेट गौरैया का भोजन विविध होता है। यह मुख्य रूप से घास और अन्य पौधों के बीज, अनाज तथा छोटे फल खाती है। प्रजनन के समय इसके भोजन में कीड़े-मकोड़े भी शामिल होते हैं, जो बढ़ते बच्चों के लिए प्रोटीन का महत्वपूर्ण स्रोत हैं। भोजन की तलाश में यह जमीन पर उतरकर दाने चुगती है और खेतों तथा झाड़ियों के आसपास सक्रिय रहती है। इसकी आवाज दूसरी गौरैयाओं की तरह चहचहाने वाली होती है, लेकिन अपेक्षाकृत धीमी सुनाई दे सकती है।

घोंसला और प्रजनन

रसेट गौरैया पेड़ों के खोखलों, दीवारों के छेदों और इमारतों की सुरक्षित दरारों में घोंसला बना सकती है। पहाड़ी गांवों में घरों और खेती के आसपास इसके लिए उपयुक्त जगहें मिल जाती हैं। भारत के कुछ हिमालयी क्षेत्रों में इसका प्रजनन वसंत और गर्मियों के महीनों में होता है। नर और मादा दोनों अंडों की देखभाल तथा बच्चों को भोजन खिलाने में भाग लेते हैं।

संरक्षण की स्थिति

रसेट गौरैया की वैश्विक संरक्षण स्थिति फिलहाल कम चिंताजनक श्रेणी में है। फिर भी इसे प्राकृतिक आवासों की सुरक्षा की जरूरत नहीं है। जंगलों में बदलाव, पहाड़ी क्षेत्रों में अनियंत्रित निर्माण और खेती की बदलती पद्धतियां इसके भोजन तथा घोंसले बनाने के स्थानों को प्रभावित कर रही हैं। इसलिए प्राकृतिक वनस्पति, पुराने पेड़ों और सुरक्षित घोंसला स्थलों को बचाना जरूरी है।

रसेट गौरैया हमें याद दिलाती है कि गौरैया परिवार की हर प्रजाति की अपनी अलग पहचान और पारिस्थितिक भूमिका है। इसके सुंदर रंग-रूप के साथ-साथ पहाड़ी पारिस्थितिकी तंत्र में इसके योगदान को समझना भी जरूरी है।

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संयोजक

 हमारी गौरैया और इनवारमेंट वैरियर्स

Hamari Gauraiya and Environment Warriors

*सम्पादक -डॉ .लीना

*सहायक सम्पादक -निशांत रंजन

उद्देश्य

विश्व गौरैया दिवस: एक साझा संकल्प

20 मार्च 2010 को जब विश्व गौरैया दिवस की शुरुआत हुई, तो मकसद साफ था—इस नन्हीं जान को लुप्त होने से बचाना। इस मुहिम को मजबूती देते हुए दिल्ली सरकार ने 15 अगस्त 2012 और बिहार सरकार ने 16 अप्रैल 2013 को गौरैया को अपना राजकीय पक्षी घोषित किया। तब से लेकर आज तक, सरकारी संस्थाओं और निजी संगठनों के साझा प्रयासों से गौरैया की ‘घर वापसी’ का अभियान निरंतर जारी है।

घर-आँगन, खेत-खलिहान में चहकने-फुदकने वाली गौरैया की घटती संख्या को रोकना और उनकी आबादी को बढ़ाने के लिए एक सुरक्षित और अनुकूल वातावरण सुनिश्चित करना। उद्देश्य है सभी गौरैया संरक्षकों का …इसमें हमारी गौरैया और पर्यावरण योद्धा(Hamari Gauraiya and Environment Warriors) भी शामिल है।

प्रधानमंत्री द्वारा गौरैया को संरक्षित करने को लेकर ‘मन की बात’ में कई बार सन्देश दिया गया हैं :- “विश्व गौरैया दिवस (20 मार्च) पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नन्हीं गौरैया को हमारे पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए उनके संरक्षण पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि शहरीकरण और प्रदूषण के कारण घटती इनकी संख्या पर्यावरण असंतुलन का संकेत है, इसलिए घरों में दाना-पानी रखकर और घोंसले बनाकर इनके प्रति स्नेह और जिम्मेदारी निभाएं।“

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