संजय कुमार/ प्रकृति ने इस धरती पर अनेकों अद्भुत और रहस्यमयी जीवों को जगह दी है, जिनमें से कई ऐसे हैं जिनके बारे में हम बहुत कम जानते हैं। ऐसा ही एक अत्यंत रोचक, मासूम सा दिखने वाला और रात्रिचर स्तनधारी वन्यजीव है एशियन पाम सिवेट (Asian Palm Civet), जिसे आम बोलचाल में कस्तूरी बिलाव भी कहा जाता है। अंग्रेजी में इसे ‘कॉमन पाम सिवेट’ के नाम से जाना जाता है और इसका वैज्ञानिक नाम पैराडॉक्सुरस हर्माफ्रोडिटस (Paradoxurus hermaphroditus) है।

देखने में यह जीव भले ही घरेलू बिल्ली जैसा प्रतीत होता है, लेकिन बिल्ली से इसकी कोई सीधी पारिवारिक समानता नहीं है। यह ‘विवर्रिडाए’ यानी सिवेट परिवार से संबंध रखता है। हाल ही में उत्तराखंड के अल्मोड़ा स्थित बिनसर वन्यजीव अभयारण्य के जंगलों में इसे दिन के वक्त पेड़ों की ऊँची टहनियों पर आराम करते हुए देखा गया। चूँकि यह एक रात्रिचर जीव है, इसलिए यह आमतौर पर दिन का अधिकांश समय पेड़ों की ऊँचाई पर सुरक्षित टहनियों या कोटरों में सोकर बिताता है।
अनूठी शारीरिक बनावट और पहचान
इसकी शारीरिक संरचना इसकी वृक्षवासी जीवनशैली के पूरी तरह अनुकूल होती है। इसका शरीर लंबा, पैर अपेक्षाकृत छोटे और पूँछ लंबी होती है। इसके शरीर पर धूसर, भूरे या काले रंग का घना और खुरदुरा रोआँदार फर-बाल होता है। इसके चेहरे की बनावट इसे खास बनाती है; आँखों के आसपास गहरे रंग के विशिष्ट निशान और गुलाबी थूथन के पास हल्के रंग के बाल होते हैं, जो बिल्ली की मूंछों की तरह प्रतीत होते हैं।
रात्रि का मुसाफिर है
एशियन पाम सिवेट मुख्य रूप से रात्रिचर है, जो रात के अंधेरे में अपने भोजन की तलाश में निकलता है। दिन के समय यह पेड़ों के खोखलों, घनी वनस्पतियों या अन्य सुरक्षित ठिकानों पर आराम करता है। यह पेड़ों पर चढ़ने में बेहद कुशल होने के साथ-साथ जमीन पर भी आसानी से चल सकता है।
यह एक सर्वाहारी जीव है, जिसके भोजन में विविधता पाई जाती है। इसके मुख्य आहार में चीकू, केला, आम, अंजीर और अन्य जंगली फल शामिल हैं। इसके अलावा यह कीड़े-मकोड़े, छोटे कृंतक, पक्षियों के अंडे और अन्य छोटे जीवों का भी शिकार करता है। (विशेषज्ञों के अनुसार, दुनिया की सबसे महंगी कॉफी ‘कॉपी लुवाक’ के बीन्स को संसाधित करने में भी इसी जीव की प्रजाति की अहम भूमिका होती है।
भौगोलिक विस्तार और आवास
एशियन पाम सिवेट भारत के लगभग विभिन्न हिस्सों—विशेषकर हिमालयी क्षेत्रों, पूर्वोत्तर और दक्षिण भारत के जंगलों—में व्यापक रूप से पाया जाता है। भारत के अलावा नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, श्रीलंका और दक्षिण-पूर्व एशिया के कई देशों में भी इसका वितरण है। यह घने जंगलों के साथ-साथ बाग-बगीचों, वृक्षों से घिरे ग्रामीण इलाकों और यहाँ तक कि कुछ शहरी हरित क्षेत्रों में भी मानवीय उपस्थिति के बीच खुद को ढालने की क्षमता रखता है।
पर्यावरण और पारिस्थितिकी तंत्र में महत्व
इस वन्यजीव का महत्व केवल इसकी अनोखी बनावट तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रकृति के संतुलन में अहम भूमिका निभाता है। फल खाने के बाद यह बीजों को अपने मल के जरिए दूसरी जगहों पर पहुँचाता है, जिससे वनों के पुनरुत्पादन और नए पौधों के उगने में बड़ी मदद मिलती है। इसके अलावा, यह जंगल की खाद्य श्रृंखला का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है; यह छोटे जीवों की आबादी को नियंत्रित रखता है और स्वयं भी जंगल के बड़े शिकारियों तेंदुए आदि का भोजन बनता है।
मंडराते खतरे और चुनौतियाँ
पेड़ इस जीव का मुख्य आशियाना हैं, लेकिन अंधाधुंध वनों की कटाई और आवास के विखंडन के कारण यह लगातार गंभीर चुनौतियों से घिर रहा है। जब प्राकृतिक आवास सिकुड़ जाते हैं, तब यह भोजन की तलाश में मानवीय बस्तियों, घरों या बगीचों तक पहुँच जाता है, जिसके चलते कई बार मनुष्यों से इसका संघर्ष हो जाता है। इसके अलावा, शहरीकरण और सड़कों के फैलाव के कारण यह अक्सर रात में वाहनों की चपेट में आकर अपनी जान गंवा बैठता है। कुछ क्षेत्रों में अवैध शिकार का भी सामना इसे करना पड़ता है।
‘कस्तूरी’ नाम को लेकर भ्रम
‘कस्तूरी बिलाव’ नाम अक्सर आम लोगों में एक बड़ा भ्रम पैदा करता है। स्पष्ट रहे कि इससे किसी प्रकार की वास्तविक कस्तूरी प्राप्त नहीं होती है। एशियन पाम सिवेट को कुछ स्थानीय क्षेत्रों में कस्तूरी बिलाव कहा जाता है, लेकिन यह ‘कस्तूरी मृग’ से पूरी तरह भिन्न और अलग प्रजाति है। हाँ, इसके शरीर में विशेष गंध उत्पन्न करने वाली ग्रंथियां होती हैं, जिनका उपयोग यह अपनी टेरिटरी (क्षेत्र) चिह्नित करने और गंध के माध्यम से संवाद करने के लिए करता है। इसे कस्तूरी मृग के समान मानना वैज्ञानिक रूप से गलत है।
संरक्षण और निष्कर्ष
एशियन पाम सिवेट की वैश्विक संरक्षण स्थिति पर नजर डालें तो अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (आईयूसीएन) की रेड लिस्ट के अनुसार यह ‘कम संकटग्रस्त’ श्रेणी में आता है, हालांकि स्थानीय स्तर पर वनों के विनाश के कारण इनकी संख्या प्रभावित हो रही है। देश और क्षेत्र विशेष के आधार पर इसकी स्थिति भिन्न हो सकती है। यह वन्यजीव हमारे वनों की सेहत का एक मौन संदेशवाहक है। आवश्यकता इस बात की है कि हम इसके प्राकृतिक आवासों का संरक्षण करें, ताकि यह रोचक जीव हमारे जंगलों की शान बना रहे।
**














