डॉल्फिन बचेंगी तो नदियाँ बचेंगी

“राष्ट्रीय डॉल्फिन दिवस: 5 अक्टूबर” राष्ट्रीय डॉल्फिन दिवस 5 अक्टूबर को मनाया जाता है। इसका उद्देश्य देश की डॉल्फिन प्रजातियों के संरक्षण, उनके प्राकृतिक आवास की सुरक्षा और नदियों के पारिस्थितिकी तंत्र के प्रति जन-जागरूकता बढ़ाना है। भारत में 5 अक्टूबर को राष्ट्रीय डॉल्फिन दिवस मनाने की सिफारिश राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की स्थायी समिति ने 2022 में की थी। डॉल्फिन को स्वस्थ जलीय पारिस्थितिकी तंत्र…

“राष्ट्रीय डॉल्फिन दिवस: 5 अक्टूबर”

राष्ट्रीय डॉल्फिन दिवस 5 अक्टूबर को मनाया जाता है। इसका उद्देश्य देश की डॉल्फिन प्रजातियों के संरक्षण, उनके प्राकृतिक आवास की सुरक्षा और नदियों के पारिस्थितिकी तंत्र के प्रति जन-जागरूकता बढ़ाना है। भारत में 5 अक्टूबर को राष्ट्रीय डॉल्फिन दिवस मनाने की सिफारिश राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की स्थायी समिति ने 2022 में की थी। डॉल्फिन को स्वस्थ जलीय पारिस्थितिकी तंत्र का महत्वपूर्ण संकेतक माना जाता है। भारत के लिए डॉल्फिन का महत्व इसलिए भी खास है क्योंकि गंगा नदी की गांगेय डॉल्फिन देश का राष्ट्रीय जलीय जीव है। यह स्तनधारी प्राणी मुख्य रूप से गंगा-ब्रह्मपुत्र-बराक नदी तंत्र में पाया जाता है। यह दृष्टिहीन होती है और अल्ट्रासोनिक ध्वनियों के जरिए अपने आसपास की वस्तुओं और शिकार का पता लगाती है।

भारत में 6,000 से अधिक नदी डॉल्फिन

डॉल्फिन संरक्षण के क्षेत्र में भारत ने हाल के वर्षों में महत्वपूर्ण वैज्ञानिक प्रयास किए हैं। 2021-23 में किए गए देशव्यापी आकलन में भारत में लगभग 6,327 नदी डॉल्फिन यानि गांगेय डॉल्फिन दर्ज की गई थीं। इनमें सबसे बड़ी संख्या उत्तर प्रदेश और बिहार में पाई गई, जबकि पश्चिम बंगाल और असम भी डॉल्फिन संरक्षण के लिहाज से महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं। जनवरी 2026 में सरकार ने नदी और समुद्री डॉल्फिन के दूसरे राष्ट्रव्यापी आकलन की शुरुआत उत्तर प्रदेश के बिजनौर से की। यह सर्वेक्षण प्रोजेक्ट डॉल्फिन के तहत भारतीय वन्यजीव संस्थान, राज्य वन विभागों और संरक्षण संगठनों के सहयोग से किया जा रहा है। इसमें हाइड्रोफोन जैसी तकनीकों से पानी के भीतर डॉल्फिन की गतिविधियों की निगरानी भी की जा रही है। इस बार सर्वेक्षण का दायरा और व्यापक किया गया है। गंगा के अलावा ब्रह्मपुत्र, गंगा की सहायक नदियों, सुंदरबन और ओडिशा के क्षेत्रों को भी शामिल किया जा रहा है। इरावदी डॉल्फिन और सिंधु नदी डॉल्फिन की स्थिति का भी आकलन किया जाएगा। इससे देश में डॉल्फिन की मौजूदा संख्या, उनके आवास और सामने मौजूद खतरों की अधिक वैज्ञानिक तस्वीर सामने आने की उम्मीद है। 

पहली बार सैटेलाइट टैगिंग

डॉल्फिन के व्यवहार और आवागमन को समझने के लिए भारत ने दिसंबर 2024 में गंगा नदी की डॉल्फिन की पहली सैटेलाइट टैगिंगकी। असम में एक नर डॉल्फिन को सैटेलाइट टैग लगाया गया। इससे वैज्ञानिकों को उसके मौसमी आवागमन, आवास के इस्तेमाल और नदी में उसकी गतिविधियों को समझने में मदद मिल रही है। 

डॉल्फिन के सामने कई चुनौतियां

हालांकि संरक्षण प्रयासों के बावजूद डॉल्फिन के सामने कई गंभीर खतरे हैं। मछली पकड़ने के जाल में फंसना, नदी में प्रदूषण, बांध और बैराज, जल प्रवाह में बदलाव, अत्यधिक मछली पकड़ना तथा नदी यातायात इसके प्रमुख खतरों में शामिल हैं। नदी के अलग-अलग हिस्सों में आबादी का बंट जाना भी इनके संरक्षण को चुनौतीपूर्ण बनाता है। गंगा नदी डॉल्फिन को वन्यजीव संरक्षण कानून के तहतअनुसूची-I में सर्वोच्च स्तर की कानूनी सुरक्षा प्राप्त है। सरकार ने इसके संरक्षण के लिए 2022-2047 की व्यापक कार्ययोजना भी तैयार की है। 

डॉल्फिन बचाना यानी नदी बचाना

डॉल्फिन केवल एक दुर्लभ वन्यजीव नहीं, बल्कि नदी के स्वास्थ्य का संकेतक है। किसी नदी में डॉल्फिन की मौजूदगी इस बात का संकेत देती है कि वहां पर्याप्त भोजन, उचित जल प्रवाह और अपेक्षाकृत बेहतर जलीय पर्यावरण मौजूद है। इसलिए डॉल्फिन का संरक्षण केवल एक प्रजाति को बचाने का प्रयास नहीं, बल्कि पूरे नदी पारिस्थितिकी तंत्र और उस पर निर्भर करोड़ों लोगों के भविष्य की सुरक्षा से जुड़ा है।

राष्ट्रीय डॉल्फिन दिवस इसी संदेश को जन-जन तक पहुंचाने का अवसर है नदियां स्वस्थ रहेंगी, तभी डॉल्फिन और नदी पर निर्भर जीवन भी सुरक्षित रहेगा।

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संयोजक

 हमारी गौरैया और इनवारमेंट वैरियर्स

Hamari Gauraiya and Environment Warriors

*सम्पादक -डॉ .लीना

*सहायक सम्पादक -निशांत रंजन

उद्देश्य

विश्व गौरैया दिवस: एक साझा संकल्प

20 मार्च 2010 को जब विश्व गौरैया दिवस की शुरुआत हुई, तो मकसद साफ था—इस नन्हीं जान को लुप्त होने से बचाना। इस मुहिम को मजबूती देते हुए दिल्ली सरकार ने 15 अगस्त 2012 और बिहार सरकार ने 16 अप्रैल 2013 को गौरैया को अपना राजकीय पक्षी घोषित किया। तब से लेकर आज तक, सरकारी संस्थाओं और निजी संगठनों के साझा प्रयासों से गौरैया की ‘घर वापसी’ का अभियान निरंतर जारी है।

घर-आँगन, खेत-खलिहान में चहकने-फुदकने वाली गौरैया की घटती संख्या को रोकना और उनकी आबादी को बढ़ाने के लिए एक सुरक्षित और अनुकूल वातावरण सुनिश्चित करना। उद्देश्य है सभी गौरैया संरक्षकों का …इसमें हमारी गौरैया और पर्यावरण योद्धा(Hamari Gauraiya and Environment Warriors) भी शामिल है।

प्रधानमंत्री द्वारा गौरैया को संरक्षित करने को लेकर ‘मन की बात’ में कई बार सन्देश दिया गया हैं :- “विश्व गौरैया दिवस (20 मार्च) पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नन्हीं गौरैया को हमारे पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए उनके संरक्षण पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि शहरीकरण और प्रदूषण के कारण घटती इनकी संख्या पर्यावरण असंतुलन का संकेत है, इसलिए घरों में दाना-पानी रखकर और घोंसले बनाकर इनके प्रति स्नेह और जिम्मेदारी निभाएं।“

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