बाघ अभ्यारण्य में पहली बाघिन को छोड़ा गया

“इस बाघ T138 को बिहार के वाल्मीकि टाइगर रिज़र्व से बक्सा लाया गया है“नई दिल्ली / भारत में बाघ संरक्षण की दिशा में एक अहम कदम उठाते हुए, 2 अक्तूबर को बुक्सा बाघ अभ्यारण्य (पश्चिम बंगाल) में एक बाघिन को छोड़ा गया। यह भारत के ‘वन्यजीव सप्ताह 2026’ की एक उपयुक्त शुरुआत है। इसके साथ…

“इस बाघ T138 को बिहार के वाल्मीकि टाइगर रिज़र्व से बक्सा लाया गया है“
नई दिल्ली / भारत में बाघ संरक्षण की दिशा में एक अहम कदम उठाते हुए, 2 अक्तूबर को बुक्सा बाघ अभ्यारण्य (पश्चिम बंगाल) में एक बाघिन को छोड़ा गया। यह भारत के ‘वन्यजीव सप्ताह 2026’ की एक उपयुक्त शुरुआत है। इसके साथ ही, बाघों को फिर से बसाने के एक चरणबद्ध कार्यक्रम ‘बाघ पुनर्वास कार्यक्रम’ की शुरुआत हुई है, जिसका मकसद ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण इस इलाके में बाघों की आबादी को बहाल करना है जो खुद से फल-फूल सके और लंबे समय तक बनी रहे। मौके पर केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव और पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री उपस्थिति थे। इस बाघ T138 को बिहार के वाल्मीकि टाइगर रिज़र्व से बक्सा लाया गया है।

बाघिन को छोड़ने के बाद सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में, केन्द्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव ने कहा कि प्रधानमंत्री के परिदृश्य संरक्षण और प्रजातियों की सुरक्षा के प्रयासों से प्रेरित होकर, आज बुक्सा में बाघों को पुनः बसाने का महत्वपूर्ण वादा पूरा हो गया है। बुक्सा ऐतिहासिक रूप से उत्तर बंगाल का एक महत्वपूर्ण बाघ क्षेत्र रहा है। 1983 में इसे बाघ अभयारण्य घोषित किया गया था और यह एक बड़े पारिस्थितिक परिदृश्य का हिस्सा है, जो भूटान और असम के जंगलों और संरक्षित क्षेत्रों से जुड़ा हुआ है। हालाँकि, पिछले कुछ दशकों में, आवास के क्षरण और विखंडन, भूमि उपयोग में बदलाव और शिकार की कमी ने एक स्थायी बाघ आबादी को बनाए रखने के लिए आवश्यक पारिस्थितिक स्थितियों को प्रभावित किया। इसके परिणामस्वरूप, अभयारण्य में  लंबे समय तक बाघों की कोई स्थिर आबादी नहीं रही।

बुक्सा का पुनरुद्धार एक निरंतर और विज्ञान-आधारित प्रयास रहा है। राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) और भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई) के सहयोग से पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा शुरू की गई ‘टाइगर ऑगमेंटेशन एंड रिकवरी प्रोजेक्ट’ (बाघ संवर्धन और पुनरुद्धार परियोजना) को 2018 से सहयोगात्मक रूप से लागू किया जा रहा है। इसका मुख्य ध्यान आवास सुधार, शिकार आधार (प्री-बेस) के संवर्धन, सुरक्षा और निगरानी को मजबूत करने, वैज्ञानिक मूल्यांकन तथा क्षमता निर्माण के माध्यम से बाघों की बहाली के लिए आवश्यक पारिस्थितिक नींव को पुनर्गठित करने पर रहा है। शिकार आधार को बढ़ाने के लिए 800 से अधिक चीतलों को छोड़ा गया है, जबकि पिछले आठ वर्षों में लगभग 380 हेक्टेयर घास के मैदान को पुनर्स्थापित या परिवर्तित किया गया है। वैज्ञानिक निगरानी ने शिकार की प्रचुरता में सकारात्मक रुझान का संकेत दिया है।

लंबे समय तक की निगरानी से इस इलाके में बाघों की आवाजाही के उत्साहजनक साक्ष्य भी मिले हैं। कैमरा ट्रैप ने 2021, 2023 और 2026 में बाघों की तस्वीरें लीं। खास बात यह है कि 2023 में जिसकी तस्वीर ली गई थी, उसका मिलान असम के मानस बाघ अभ्यारण्य के एक बाघ से हुआ, जिससे आस-पास के बाघ इलाकों के बीच उनकी प्राकृतिक आवाजाही का प्रमाण मिलता है। वर्तमान संवर्धन कार्यक्रम का उद्देश्य सावधानीपूर्वक नियोजित और वैज्ञानिक तरीके से किए गए उपायों के ज़रिए प्राकृतिक बहाली में मदद करना है।

आज बाघिन को छोड़ा जाना एक नियोजित, चरणबद्ध और हालात के अनुसार पुनरुद्धार कार्यक्रम का पहला चरण है। इस बाघिन को वाल्मीकि बाघ अभ्यारण्य (बिहार) से  यहाँ लाया गया था। यह काम संबंधित पारिस्थितिक, पशुचिकित्सा और प्रबंधन मापदंडों के मूल्यांकन के बाद और स्थापित प्रोटोकॉल के अनुसार किया गया। जंगल में छोड़े जाने के बाद, टेलीमेट्री, कैमरा ट्रैपिंग और फील्ड-बेस्ड मॉनिटरिंग के ज़रिए इस बाघिन पर कड़ी नज़र रखी जाएगी, ताकि उसकी गतिविधियों, नए माहौल में ढलने की क्षमता, सेहत और व्यवहार का पता लगाया जा सके।

यह कार्यक्रम केवल बुक्सा में बाघों को वापस लाने तक सीमित नहीं है। इसका उद्देश्य ऐसी स्थितियां बनाना है जिनमें बाघों की आबादी बस सके, प्रजनन कर सके और अंततः व्यवहार्य व आत्मनिर्भर बन सके। आगे जहाँ भी वैज्ञानिक रूप से उचित होगा और बाघ लाने का काम कई चरणों में किया जाएगा। यह काम आवास और शिकार की उपलब्धता, सुरक्षा तैयारियों, आबादी के टिके रहने की क्षमता, निगरानी के परिणामों और विशेषज्ञ सलाह के आधार पर चरणबद्ध तरीके से किया जाएगा।

इस पुनर्वास प्रयास में सामुदायिक भागीदारी  केंद्र में है। इस कार्यक्रम में 64 पर्यावरण-विकास समितियों/संयुक्त वन प्रबंधन समितियों को शामिल किया गया है, जिसमें सामुदायिक संवाद, आजीविका के अवसरों, मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने और संरक्षण से जुड़े लाभों पर जोर दिया गया है। जैसे-जैसे बाघों की बहाली आगे बढ़ेगी, निरंतर सामुदायिक जुड़ाव और सह-अस्तित्व के प्रभावी तंत्र इस कार्यक्रम का एक अभिन्न हिस्सा बने रहेंगे।

बुक्सा में बाघों का पुनर्वास परिदृश्य स्तर पर भी काफी महत्वपूर्ण है। उत्तरी बंगाल, असम और भूटान के साथ इसके पारिस्थितिक जुड़ाव से जंगली जानवरों को एक बड़े और आपस में जुड़े इलाके में आने-जाने और फैलने का मौका मिलता है।  इसलिए, बुक्सा को मजबूत करने का प्रभाव न केवल बाघ संरक्षण पर पड़ेगा, बल्कि वनों, घास के मैदानों, शिकार की प्रजातियों और व्यापक जैव विविधता के संरक्षण पर भी पड़ेगा।

आज बुक्सा में बाघिन को छोड़ना, बाघ संरक्षण की यात्रा में एक नए अध्याय की शुरुआत है। सफलता का पैमाना छोड़े गए बाघों की संख्या नहीं, बल्कि समय के साथ एक ऐसी स्वस्थ, आज़ाद घूमने वाली और खुद को बनाए रखने में सक्षम बाघ आबादी का बनना होगा, जिसे सुरक्षित आवास, पर्याप्त शिकार, प्रभावी  सुरक्षा, पारिस्थितिक जुड़ाव, वैज्ञानिक निगरानी और स्थानीय समुदायों की सार्थक भागीदारी का समर्थन हासिल हो।

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