वन्यजीव सप्ताह : प्रकृति के साथ जीने का संकल्प

2 से 8 अक्टूबर : वन्यजीवों के संरक्षण के साथ अपने भविष्य की रक्षा का अवसर संजय कुमार /जंगल में बाघ की दहाड़, नदी में डॉल्फिन की छलांग, आकाश में उड़ते गिद्ध, पेड़ों पर चहचहाते गौरैया सहित दूसरे पक्षी और घास के मैदानों में विचरण करते हिरण-ये केवल प्रकृति की सुंदर तस्वीरें नहीं हैं। बल्कि…

2 से 8 अक्टूबर : वन्यजीवों के संरक्षण के साथ अपने भविष्य की रक्षा का अवसर

संजय कुमार /जंगल में बाघ की दहाड़, नदी में डॉल्फिन की छलांग, आकाश में उड़ते गिद्ध, पेड़ों पर चहचहाते गौरैया सहित दूसरे पक्षी और घास के मैदानों में विचरण करते हिरण-ये केवल प्रकृति की सुंदर तस्वीरें नहीं हैं। बल्कि उस जटिल प्राकृतिक व्यवस्था का हिस्सा हैं, जिसके सहारे इन्सान का जीवन भी चलता है। वन्यजीवों की दुनिया जितनी समृद्ध होगी, हमारी प्रकृति उतनी ही संतुलित और सुरक्षित रहेगी।

हर वर्ष 2 से 8 अक्टूबर तक वन्यजीव सप्ताह मनाया जाता है। इसका उद्देश्य वन्यजीवों और उनके आवासों के संरक्षण के प्रति समाज में जागरूकता पैदा करना तथा लोगों को प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझाना है। वन्यजीव सप्ताह केवल जंगल और वहां रहने वाले बड़े जानवरों तक सीमित नहीं है। इसमें हर वह जीव शामिल है जो हमारे पारिस्थितिक तंत्र का हिस्सा है। गौरैया जैसी छोटी चिड़िया से लेकर हाथी, गैंडा, बाघ, तेंदुआ, गिद्ध और डॉल्फिन तक, हर प्रजाति प्रकृति की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। किसी एक कड़ी के कमजोर होने का असर पूरी व्यवस्था पर पड़ सकता है।

वन्यजीव हैं तो प्रकृति है

प्रकृति में कोई भी जीव अनावश्यक नहीं है। गिद्ध मृत पशुओं के अवशेषों को साफ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। कीटभक्षी पक्षी फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले अनेक कीटों की संख्या नियंत्रित करते हैं। मधुमक्खियां और अनेक अन्य परागणकर्ता पौधों के प्रजनन में सहायता करते हैं। हाथी जैसे बड़े वन्यजीव जंगल में बीजों के प्रसार में योगदान देते हैं। नदियों और आर्द्रभूमियों में रहने वाले जीव जलीय पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य से जुड़े हैं। इसीलिए वन्यजीव संरक्षण का अर्थ केवल किसी दुर्लभ जानवर को बचाना नहीं है। इसका अर्थ उन जंगलों, नदियों, घासभूमियों, आर्द्रभूमियों और दूसरे प्राकृतिक आवासों को बचाना भी है, जिनमें ये जीव रहते हैं।

संकट केवल जंगल के भीतर नहीं

आज वन्यजीवों के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में प्राकृतिक आवासों का सिकुड़ना, जंगलों का विखंडन, प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन, अवैध शिकार और वन्यजीवों की तस्करी शामिल हैं। सड़कों, रेल लाइनों, बिजली की लाइनों और अन्य आधारभूत ढांचों का विस्तार भी कई क्षेत्रों में वन्यजीवों की आवाजाही को प्रभावित करता है।जब जंगल छोटे-छोटे हिस्सों में बंटते हैं तो जानवरों के पारंपरिक मार्ग बाधित होते हैं। इसका परिणाम कई बार मानव और वन्यजीवों के बीच टकराव के रूप में सामने आता है। हाथी खेतों में पहुंचते हैं, तेंदुए आबादी वाले क्षेत्रों में दिखाई देते हैं और कई अन्य वन्यजीव भोजन या पानी की तलाश में मानव बस्तियों के करीब पहुंच जाते हैं। इसलिए मानव-वन्यजीव संघर्ष का समाधान केवल वन्यजीवों को पकड़कर दूसरी जगह छोड़ देना नहीं हो सकता। इसके लिए उनके आवास, प्राकृतिक गलियारों, पानी और भोजन की उपलब्धता तथा स्थानीय समुदायों की जरूरतों को साथ लेकर काम करना आवश्यक है।

संरक्षण में स्थानीय लोगों की भूमिका

वन्यजीव संरक्षण की सफलता स्थानीय समुदायों की भागीदारी के बिना संभव नहीं है। जंगलों के आसपास रहने वाले लोग वन्यजीवों की गतिविधियों और उनके आवास को सबसे करीब से देखते हैं। यदि उन्हें संरक्षण की प्रक्रिया में भागीदार बनाया जाए तो वे वन्यजीवों के महत्वपूर्ण संरक्षक बन सकते हैं। भारत में संरक्षण से जुड़े अनेक प्रयासों में स्थानीय लोगों की भागीदारी को महत्व दिया जा रहा है। 2025 के वन्यजीव सप्ताह के दौरान भी मानव-वन्यजीव सहअस्तित्व को प्रमुखता दी गई और समुदाय आधारित संरक्षण की भूमिका पर जोर दिया गया। वन्यजीवों के संरक्षण में केवल वन विभाग या वैज्ञानिकों की जिम्मेदारी नहीं है। किसान, विद्यार्थी, शिक्षक, पत्रकार, सामाजिक संगठन, पर्यटक और आम नागरिक भी इसमें अपनी भूमिका निभा सकते हैं।

बाघ से गौरैया तक सबका संरक्षण जरूरी

वन्यजीव संरक्षण की चर्चा अक्सर बाघ, शेर, हाथी या गैंडे जैसे बड़े जानवरों तक सीमित रह जाती है। लेकिन किसी जंगल या पर्यावरण का स्वास्थ्य केवल बड़े जानवरों की संख्या से नहीं मापा जा सकता। गौरैया, गिद्ध, उल्लू, कठफोड़वा, तितलियां, मधुमक्खियां, मेंढक और अनेक छोटे जीव भी पारिस्थितिकी तंत्र के लिए उतने ही महत्वपूर्ण हैं। इनकी संख्या में गिरावट पर्यावरण में हो रहे बदलावों का संकेत हो सकती है। इसलिए संरक्षण की सोच में छोटे और आम जीवों को भी बराबर महत्व देना होगा। हमारे घरों और आसपास दिखाई देने वाली गौरैया भी जैव विविधता का हिस्सा है। खेतों, बगीचों, तालाबों और शहरों में छोटे-छोटे प्राकृतिक स्थानों को बचाना भी वन्यजीव संरक्षण का ही हिस्सा है।

संरक्षण में नई तकनीक की भूमिका

आज वन्यजीवों की निगरानी में कैमरा ट्रैप, जीपीएस, ड्रोन, डीएनए आधारित अध्ययन और अन्य आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल बढ़ रहा है। इनसे वन्यजीवों की संख्या, उनके आवास और गतिविधियों को समझने में सहायता मिलती है। प्रजाति आधारित संरक्षण कार्यक्रमों में भी वैज्ञानिक निगरानी को बढ़ावा दिया जा रहा है। 2025 के वन्यजीव सप्ताह में नदी डॉल्फिन, बाघ, हिम तेंदुआ और गोडावण जैसी प्रजातियों की आबादी के आकलन और निगरानी के लिए राष्ट्रीय स्तर के कार्ययोजनाएं और फील्ड गाइड जारी किए गए थे। साथ ही डॉल्फिन, स्लॉथ बियर और घड़ियाल के संरक्षण से जुड़े राष्ट्रीय स्तर के कार्यक्रम शुरू किए गए। यह बदलाव बताता है कि आधुनिक वन्यजीव संरक्षण केवल भावनाओं पर नहीं, बल्कि वैज्ञानिक आंकड़ों, निरंतर निगरानी और क्षेत्रीय अध्ययन पर भी आधारित हो रहा है।

नदियों और वन्यजीवों का रिश्ता

भारत की नदियां भी वन्यजीवों का महत्वपूर्ण आवास हैं। गंगा की डॉल्फिन इसका प्रमुख उदाहरण है। नदी में डॉल्फिन की मौजूदगी केवल एक जीव की उपस्थिति नहीं, बल्कि नदी के पारिस्थितिक स्वास्थ्य से जुड़ा संकेत है। 2021 से 2023 के बीच किए गए देशव्यापी आकलन में भारत की नदीय डॉल्फिनों की संख्या 6,327 अनुमानित की गई थी। जनवरी 2026 में डॉल्फिन के दूसरे व्यापक आकलन की शुरुआत की गई, जिसमें गंगा के साथ अन्य नदी प्रणालियों को भी शामिल किया गया। इससे स्पष्ट है कि वन्यजीव संरक्षण जंगल तक सीमित विषय नहीं है। नदी, समुद्र, आर्द्रभूमि, घासभूमि और पहाड़, सभी इसके महत्वपूर्ण हिस्से हैं।

कानून के साथ संवेदना भी जरूरी

वन्यजीवों की रक्षा के लिए कानून और संरक्षित क्षेत्र जरूरी हैं, लेकिन केवल कानून से प्रकृति को नहीं बचाया जा सकता। इसके लिए समाज की सोच में भी बदलाव जरूरी है। जंगल में घूमते समय शोर न करना, वन्यजीवों को भोजन न देना, उनके करीब जाकर तस्वीर लेने से बचना, प्लास्टिक और कचरा न फैलाना, घायल पक्षी या वन्यजीव मिलने पर विशेषज्ञों अथवा वन विभाग को सूचना देना और वन्यजीवों से जुड़े अवैध कारोबार की जानकारी मिलने पर संबंधित एजेंसियों को बताना,ये छोटे कदम बड़े बदलाव ला सकते हैं। शहरों में भी पेड़, छोटे जलाशय, हरित क्षेत्र और पक्षियों के लिए सुरक्षित स्थान बचाकर वन्यजीव संरक्षण में योगदान दिया जा सकता है।

पीढ़ियों के लिए विरासत

वन्यजीव सप्ताह हमें यह सोचने का अवसर देता है कि हम आने वाली पीढ़ियों को कैसी धरती देना चाहते हैं। यदि जंगल होंगे लेकिन उनमें वन्यजीव नहीं होंगे, नदियां होंगी लेकिन उनमें जलीय जीवन नहीं होगा और शहर होंगे लेकिन उनमें पक्षियों के लिए जगह नहीं होगी, तो ऐसी विकास यात्रा अधूरी होगी। वन्यजीवों को बचाना वास्तव में मनुष्य के भविष्य को बचाना है। स्वस्थ जंगल पानी को सुरक्षित रखते हैं, मिट्टी का संरक्षण करते हैं, जलवायु को संतुलित करने में योगदान देते हैं और असंख्य जीवों को आश्रय देते हैं। जैव विविधता का संरक्षण इसलिए प्रकृति प्रेम भर नहीं, बल्कि मानव जीवन की सुरक्षा से जुड़ा विषय है।

वन्यजीव सप्ताह के सात दिन केवल कार्यक्रमों, गोष्ठियों और नारों तक सीमित न रहें। यह सप्ताह हमें वर्ष के बाकी दिनों के लिए भी एक संकल्प दे, प्रकृति पर अपना अधिकार समझने के बजाय उसके साथ जिम्मेदारी से जीने का संकल्प।बाघ की दहाड़ हो या गौरैया की चहचहाहट, जंगल में हाथियों की चाल हो या नदी में डॉल्फिन की छलांग—इन सभी आवाजों में हमारी धरती के स्वस्थ होने का संदेश छिपा है। इन आवाजों को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना ही वन्यजीव संरक्षण की सबसे बड़ी सफलता होगी।

वन्यजीव सप्ताह शुरुआत

हर साल 2 से 8 अक्टूबर तक पूरे भारत में वन्यजीव सप्ताह मनाया जाता है और इनके संरक्षण का संकल्प लिया जाता है। इसकी शुरुआत …1952 में भारतीय वन्यजीव बोर्ड ने वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए एक दीर्घकालीन योजना बनाई। 1955 में पहला वन्यजीव दिवस मनाया गया, जिसे 1957 से बढ़ाकर पूरे एक सप्ताह 2 अक्टूबर गांधी जयंती से 8 अक्टूबर तक मनाया जाने लगा। इसका मकसद सिर्फ एक दिन नहीं, बल्कि पूरे सप्ताह जागरूकता, शिक्षा और संरक्षण की ठोस पहल करना है।प्रकृति में सभी पशु-पक्षी वन्यजीव में आते हैं -वन्यजीव का अर्थ सिर्फ शेर, बाघ या हाथी नहीं है। हमारे आसपास की गौरैया, कौआ, गिलहरी, तितली, मधुमक्खी, केंचुआ, सांप, मेंढक -क्योंकि सभी वन्यजीव हैं।

-प्रकृति का हर जीव एक कड़ी है, एक कड़ी टूटी तो पूरा जाल बिखर जाता है।कई पशु-पक्षियों की स्थिति अच्छी नहीं है -यह चिंता का सबसे बड़ा कारण है:

1. अति संकटग्रस्त (Critically Endangered): ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (सोन चिड़िया) – अब 150 से भी कम बची हैं, घड़ियाल, हिम तेंदुआ।

2. संकटग्रस्त (Endangered): बाघ – संरक्षण से बढ़कर 3,600 हुए हैं पर अभी भी खतरे में, एशियाई शेर, लाल पांडा, जंगली जल भैंसा।

3. घर के पास के संकट: आपकी प्रिय गौरैया की संख्या पिछले 20 साल में शहरों में 60-80% तक घट गई है।

गिद्ध 99% तक खत्म हो चुके हैं। मधुमक्खियों और तितलियों की संख्या कीटनाशकों से तेजी से घट रही है। कारण वही हैं जिन पर आप लिखते हैं:आवास (Habitat) का नष्ट होना – पेड़ों की कटाई, कंक्रीट के जंगल खेतों में अंधाधुंध कीटनाशक और रसायन और प्रदूषण, अवैध शिकार और वन्यजीव तस्करी ,जलवायु परिवर्तन और जल स्रोतों का सूखना …इस वन्यजीव सप्ताह हम क्या संकल्प ले सकते हैं. एक पेड़ लगाना जो पक्षियों को बसेरा दे अपने घर में गौरैया के लिए पानी और घोंसले की जगह रखना कीटनाशक का कम से कम उपयोग और जैविक खेती को बढ़ावा… वन्यजीवों को कैद नहीं, आजाद देखने की आदत डालना वन्यजीव हैं तो हम हैं, यही प्रकृति का सत्य है।

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संयोजक

 हमारी गौरैया और इनवारमेंट वैरियर्स

Hamari Gauraiya and Environment Warriors

*सम्पादक -डॉ .लीना

*सहायक सम्पादक -निशांत रंजन

उद्देश्य

विश्व गौरैया दिवस: एक साझा संकल्प

20 मार्च 2010 को जब विश्व गौरैया दिवस की शुरुआत हुई, तो मकसद साफ था—इस नन्हीं जान को लुप्त होने से बचाना। इस मुहिम को मजबूती देते हुए दिल्ली सरकार ने 15 अगस्त 2012 और बिहार सरकार ने 16 अप्रैल 2013 को गौरैया को अपना राजकीय पक्षी घोषित किया। तब से लेकर आज तक, सरकारी संस्थाओं और निजी संगठनों के साझा प्रयासों से गौरैया की ‘घर वापसी’ का अभियान निरंतर जारी है।

घर-आँगन, खेत-खलिहान में चहकने-फुदकने वाली गौरैया की घटती संख्या को रोकना और उनकी आबादी को बढ़ाने के लिए एक सुरक्षित और अनुकूल वातावरण सुनिश्चित करना। उद्देश्य है सभी गौरैया संरक्षकों का …इसमें हमारी गौरैया और पर्यावरण योद्धा(Hamari Gauraiya and Environment Warriors) भी शामिल है।

प्रधानमंत्री द्वारा गौरैया को संरक्षित करने को लेकर ‘मन की बात’ में कई बार सन्देश दिया गया हैं :- “विश्व गौरैया दिवस (20 मार्च) पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नन्हीं गौरैया को हमारे पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए उनके संरक्षण पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि शहरीकरण और प्रदूषण के कारण घटती इनकी संख्या पर्यावरण असंतुलन का संकेत है, इसलिए घरों में दाना-पानी रखकर और घोंसले बनाकर इनके प्रति स्नेह और जिम्मेदारी निभाएं।“

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