संग्रहालयों में भी सुरक्षित है गौरैया

संजय कुमार / कभी क्रिकेट मैदान की घटना की गवाह बनी गौरैया, तो कभी महान पक्षी विज्ञानी सालिम अली के जीवन की दिशा बदलने वाली चिड़िया। गौरैया हमारे घर-आंगन, खिड़कियों और छतों पर चहचहाने वाली बेहद परिचित चिड़िया है। लेकिन गौरैया की कहानी केवल हमारे आसपास तक सीमित नहीं है। दुनिया के कई संग्रहालयों में…

संजय कुमार / कभी क्रिकेट मैदान की घटना की गवाह बनी गौरैया, तो कभी महान पक्षी विज्ञानी सालिम अली के जीवन की दिशा बदलने वाली चिड़िया। गौरैया हमारे घर-आंगन, खिड़कियों और छतों पर चहचहाने वाली बेहद परिचित चिड़िया है। लेकिन गौरैया की कहानी केवल हमारे आसपास तक सीमित नहीं है। दुनिया के कई संग्रहालयों में गौरैया के नमूने, मॉडल और उससे जुड़ी ऐतिहासिक व सांस्कृतिक वस्तुएं आज भी सुरक्षित हैं। इन संग्रहों में कहीं गौरैया क्रिकेट इतिहास की अनोखी घटना की याद दिलाती है, तो कहीं वह पक्षी-विज्ञान के इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा बनकर मौजूद है।

लॉर्ड्स में सुरक्षित है ‘स्पैरो ऑफ लॉर्ड्स’

गौरैया से जुड़ी सबसे अनोखी घटनाओं में से एक इंग्लैंड के प्रसिद्ध लॉर्ड्स क्रिकेट मैदान से जुड़ी है। वर्ष 1936 में एक क्रिकेट मैच के दौरान भारतीय तेज गेंदबाज जहांगीर खान की गेंद एक गौरैया से जा टकराई। टक्कर से गौरैया की मौत हो गई। बाद में इस गौरैया को संरक्षित किया गया और उसे उसी क्रिकेट गेंद के साथ प्रदर्शित किया गया, जिससे वह टकराई थी। यह अनोखी स्मृति मैरीलेबोन क्रिकेट क्लब (MCC) म्यूज़ियम (Marylebone Cricket Club (MCC) Museum) में सुरक्षित है और इसे ‘भगवान की गौरैया’ (‘Sparrow of Lord’s’)  के नाम से जाना जाता है। इस तरह एक छोटी-सी गौरैया क्रिकेट इतिहास का भी हिस्सा बन गई।

सालिम अली के जीवन की दिशा बदलने वाली गौरैया

भारत में गौरैया से जुड़ी सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक महान पक्षी विज्ञानी डॉ. सालिम अली के बचपन से जुड़ी है। लगभग दस वर्ष की उम्र में सालिम अली ने मुंबई में एक छोटी चिड़िया को एयरगन से मार दिया था। इस पक्षी के गले के नीचे पीले रंग का निशान था। वे इसे अपने मामा अमीरुद्दीन तैयबजी के पास लेकर गए। मामा ने उन्हें बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी (BNHS) के तत्कालीन मानद सचिव डब्ल्यू. एस. मिलार्ड के पास भेजा। मिलार्ड ने उस पक्षी की पहचान पीली गले वाली गौरैया (Yellow-throated Sparrow) के रूप में की। इसका वर्तमान प्रचलित अंग्रेजी नाम चेस्टनट-शोल्डर्ड पेट्रोनिया (Chestnut-shouldered Petronia) और वैज्ञानिक नाम जिमनोरिस ज़ैंथोकोलिस (Gymnoris xanthocolli) है। मिलार्ड ने बालक सालिम अली को केवल उस पक्षी के बारे में जानकारी ही नहीं दी, बल्कि उन्हें बीएनएचएस के पक्षी संग्रह भी दिखाए। वहां सुरक्षित पक्षियों के नमूनों को देखकर सालिम अली की पक्षियों के प्रति जिज्ञासा और बढ़ी। यही घटना आगे चलकर उन्हें भारत के महान पक्षी वैज्ञानिकों में शामिल करने वाली यात्रा की शुरुआत बनी।

प्राकृतिक इतिहास के संग्रहों में गौरैया

भारत में पक्षियों के अध्ययन के लिए बनाए गए प्राकृतिक इतिहास संग्रहों में गौरैया और उससे संबंधित प्रजातियों के नमूने भी सुरक्षित रहे हैं। ऐसे संग्रह वैज्ञानिकों को पक्षियों की पहचान, उनके आकार-प्रकार, भौगोलिक वितरण और समय के साथ होने वाले बदलावों का अध्ययन करने में मदद करते हैं।

बिहार संग्रहालय, पटना में भी गौरैया को विशेष स्थान दिया गया है। संग्रहालय की बाल दीर्घा में एक नर गौरैया को अंडे के साथ बिहार के राज्य पक्षी के रूप में प्रस्तुत किया गया है।  इस तरह संग्रहालय में गौरैया केवल एक प्रदर्शित पक्षी नहीं है, बल्कि बच्चों और आम लोगों को प्रकृति संरक्षण का संदेश देने का माध्यम भी है।

ए. ओ. ह्यूम का विशाल पक्षी संग्रह

गौरैया के संग्रहालयी इतिहास को भारत में पक्षी-विज्ञान के शुरुआती दौर से भी जोड़कर देखा जा सकता है। प्रसिद्ध प्रकृतिविद और पक्षी-अध्येता एलन ऑक्टेवियन ह्यूम (A. O. Hume) ने भारत में पक्षियों का विशाल संग्रह तैयार किया था।

ह्यूम के संग्रह में भारत से एकत्र किए गए 63 हजार से अधिक पक्षियों की खालें, लगभग 18,500 अंडे और करीब 500 घोंसले शामिल थे। बाद में इस विशाल संग्रह का बड़ा हिस्सा ब्रिटेन पहुंचा और आज उसके महत्वपूर्ण हिस्से  नेचुरल हिस्ट्री म्यूजियम (Natural History Museum) के ट्रिंग  स्थित पक्षी संग्रह में सुरक्षित हैं। इस तरह के संग्रह में गौरैया सहित अनेक पक्षी प्रजातियों के नमूने भी शामिल रहे हैं। ये नमूने आज केवल पुराने पक्षियों की याद नहीं हैं, बल्कि वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए महत्वपूर्ण दस्तावेज हैं।

ऑस्ट्रेलिया में भी गौरैया का इतिहास

गौरैया का संग्रहालयों में सुरक्षित इतिहास उसके प्राकृतिक जीवन तक ही सीमित नहीं है। वह मानव द्वारा एक देश से दूसरे देश में प्रजातियों को ले जाने की कहानी से भी जुड़ी है। ऑस्ट्रेलियाई संग्रहालय के अनुसार, घरेलू गौरैया (पैसर डोमेस्टिकस) को ब्रिटेन से ऑस्ट्रेलिया लाया गया था। 1860 के दशक में इसे वहां बसाने के प्रयास किए गए और बाद में यह विभिन्न क्षेत्रों में फैल गई। यह घटना बताती है कि मनुष्य किस तरह अनजाने या जानबूझकर किसी प्रजाति को उसके प्राकृतिक क्षेत्र से दूर ले जा सकता है। नई जगह पर पहुंचने के बाद ऐसी प्रजातियों का पर्यावरण पर अलग प्रभाव भी पड़ सकता है।

लोककथाओं में भी गौरैया

गौरैया का महत्व केवल विज्ञान और इतिहास तक सीमित नहीं है। दुनिया की कई संस्कृतियों की लोककथाओं में भी इसका उल्लेख मिलता है। जापान की प्रसिद्ध लोककथा ‘जीभ कटी गौरैया’ (‘The Tongue-Cut Sparrow’)  इसका उदाहरण है। इसमें एक बूढ़े व्यक्ति और गौरैया की कहानी के माध्यम से दया, लालच और उसके परिणामों का संदेश दिया गया है।

इस लोककथा से जुड़ी कलाकृतियां और पुस्तकें भी विभिन्न संग्रहालयों में सुरक्षित हैं। इससे पता चलता है कि गौरैया सदियों से केवल प्रकृति का हिस्सा नहीं रही, बल्कि मानव संस्कृति और लोकजीवन में भी उसकी अपनी जगह रही है।

संग्रहालयों में सुरक्षित गौरैया के नमूने हमें उसके अतीत से परिचित कराते हैं। जो गौरैया कभी हर घर का हिस्सा हुआ करती थी, कहीं ऐसा न हो कि आने वाली पीढ़ियां उसे केवल संग्रहालयों में सुरक्षित नमूनों के रूप में देखें। इसलिए संग्रहालयों में संरक्षित गौरैया हमें केवल अतीत की कहानी नहीं सुनाती, बल्कि वर्तमान में उसके संरक्षण की जिम्मेदारी का भी एहसास कराती है।

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संयोजक

 हमारी गौरैया और इनवारमेंट वैरियर्स

Hamari Gauraiya and Environment Warriors

*सम्पादक -डॉ .लीना

*सहायक सम्पादक -निशांत रंजन

उद्देश्य

विश्व गौरैया दिवस: एक साझा संकल्प

20 मार्च 2010 को जब विश्व गौरैया दिवस की शुरुआत हुई, तो मकसद साफ था—इस नन्हीं जान को लुप्त होने से बचाना। इस मुहिम को मजबूती देते हुए दिल्ली सरकार ने 15 अगस्त 2012 और बिहार सरकार ने 16 अप्रैल 2013 को गौरैया को अपना राजकीय पक्षी घोषित किया। तब से लेकर आज तक, सरकारी संस्थाओं और निजी संगठनों के साझा प्रयासों से गौरैया की ‘घर वापसी’ का अभियान निरंतर जारी है।

घर-आँगन, खेत-खलिहान में चहकने-फुदकने वाली गौरैया की घटती संख्या को रोकना और उनकी आबादी को बढ़ाने के लिए एक सुरक्षित और अनुकूल वातावरण सुनिश्चित करना। उद्देश्य है सभी गौरैया संरक्षकों का …इसमें हमारी गौरैया और पर्यावरण योद्धा(Hamari Gauraiya and Environment Warriors) भी शामिल है।

प्रधानमंत्री द्वारा गौरैया को संरक्षित करने को लेकर ‘मन की बात’ में कई बार सन्देश दिया गया हैं :- “विश्व गौरैया दिवस (20 मार्च) पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नन्हीं गौरैया को हमारे पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए उनके संरक्षण पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि शहरीकरण और प्रदूषण के कारण घटती इनकी संख्या पर्यावरण असंतुलन का संकेत है, इसलिए घरों में दाना-पानी रखकर और घोंसले बनाकर इनके प्रति स्नेह और जिम्मेदारी निभाएं।

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