शाडू मिट्टी से भगवान गणेश की मूर्तियों का निर्माण पर्यावरण संरक्षण का सन्देश

महाराष्ट्र के जालना जिले में पांच हजार 348 लोगों ने एक साथ पर्यावरण अनुकूल शाडू मिट्टी से भगवान गणेश की मूर्तियों का निर्माण कर उल्लेखनीय विश्व कीर्तिमान बनाया है। इस उपलब्धि को गिनीज विश्व रिकॉर्ड और लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में दर्ज किया गया है। यह आयोजन जालना में जे.ई.एस महाविद्यालय में आयोजित किया गया।…

महाराष्ट्र के जालना जिले में पांच हजार 348 लोगों ने एक साथ पर्यावरण अनुकूल शाडू मिट्टी से भगवान गणेश की मूर्तियों का निर्माण कर उल्लेखनीय विश्व कीर्तिमान बनाया है। इस उपलब्धि को गिनीज विश्व रिकॉर्ड और लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में दर्ज किया गया है। यह आयोजन जालना में जे.ई.एस महाविद्यालय में आयोजित किया गया। इससे पहले बैंगलूरू में अगस्त 2022 में 3 हजार 308 प्रतिभागियों ने मूर्ति निर्माण का रिकॉर्ड बनाया था। यह आयोजन जालना की जिलाधिकारी अशीमा मित्तल के नेतृत्व में जिला कलेक्ट्रेट, जिला परिषद, शिक्षा विभाग और एडविक क्लब के सहयोग से किया गया। इसका प्रमुख उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देने और नागरिकों को शाडू मिट्टी से पर्यावरण अनुकूल गणेश मूर्तियों बनाने के लिए प्रेरित करना था।

गणेशोत्सव भारत के सबसे लोकप्रिय और उत्साहपूर्ण पर्वों में से एक है। भगवान गणेश की आराधना, घर-घर में होने वाली पूजा, सजावट और सांस्कृतिक कार्यक्रम इस पर्व को खास बनाते हैं। हालांकि, बदलते समय के साथ गणेशोत्सव को पर्यावरण संरक्षण से जोड़ने की जरूरत भी महसूस की जा रही है। उधर इसी दिशा में महाराष्ट्र के जालना जिले के संस्कार प्रबोधिनी माध्यमिक विद्यालय के विद्यार्थियों ने एक प्रेरणादायी पहल की है।विद्यालय में पिछले 18 वर्षों से शाडू मिट्टी से पर्यावरण-अनुकूल गणेश प्रतिमाएं बनाने का उपक्रम लगातार चलाया जा रहा है। इसका उद्देश्य विद्यार्थियों में धार्मिक आस्था के साथ-साथ पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी और संवेदनशीलता विकसित करना है।

विद्यार्थियों ने खुद बनाई गणेश प्रतिमाएं

इस वर्ष विद्यालय के करीब 100 विद्यार्थियों ने अपने हाथों से शाडू मिट्टी की गणेश प्रतिमाएं तैयार की हैं। विद्यार्थियों को प्रतिमा निर्माण की प्रक्रिया से परिचित कराया गया और उन्होंने पूरी रुचि एवं उत्साह के साथ गणेश प्रतिमाओं को आकार दिया। मिट्टी को गूंथने से लेकर गणेशजी की प्रतिमा को अंतिम रूप देने तक विद्यार्थियों ने स्वयं भाग लिया। इस दौरान उन्हें पारंपरिक कला के साथ-साथ पर्यावरण-अनुकूल तरीके से त्योहार मनाने का संदेश भी मिला। यह पहल केवल गणेश प्रतिमा बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि विद्यार्थियों को यह समझाने का प्रयास भी है कि हमारी धार्मिक परंपराएं प्रकृति के संरक्षण के साथ आगे बढ़ सकती हैं।

शाडू मिट्टी क्यों है महत्वपूर्ण?

गणेश प्रतिमाओं के लिए शाडू मिट्टी को पर्यावरण-अनुकूल विकल्प माना जाता है। प्राकृतिक मिट्टी से बनी प्रतिमाएं उचित परिस्थितियों में पानी में अपेक्षाकृत आसानी से घुल सकती हैं। इसके विपरीत कुछ अन्य सामग्रियों से बनी प्रतिमाओं के विसर्जन से जल निकायों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। इसीलिए आज कई स्थानों पर मिट्टी की छोटी प्रतिमाओं, प्राकृतिक रंगों और प्रतीकात्मक या घरेलू विसर्जन जैसे विकल्पों को बढ़ावा दिया जा रहा है।

अपने घर में ही करेंगे स्थापना और विसर्जन

इस पहल की एक और खास बात यह है कि विद्यार्थियों द्वारा बनाई गई गणेश प्रतिमाओं की स्थापना और विसर्जन भी विद्यार्थी अपने-अपने घरों में ही करेंगे। इससे विद्यार्थियों को प्रतिमा निर्माण से लेकर पूजा और विसर्जन तक पूरे गणेशोत्सव की प्रक्रिया को पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी के साथ समझने का अवसर मिलेगा। घरेलू स्तर पर विसर्जन करने से सार्वजनिक जलस्रोतों पर पड़ने वाले दबाव को कम करने में भी मदद मिल सकती है, खासकर तब जब विसर्जन के लिए प्राकृतिक जलस्रोतों के बजाय उपयुक्त घरेलू व्यवस्था अपनाई जाए।

18 वर्षों से जारी है परंपरा

संस्कार प्रबोधिनी माध्यमिक विद्यालय की यह पहल इसलिए भी उल्लेखनीय है क्योंकि यह कोई एक वर्ष का अभियान नहीं है। विद्यालय पिछले 18 वर्षों से लगातार विद्यार्थियों को पर्यावरण-अनुकूल गणेश प्रतिमा निर्माण से जोड़ रहा है। लंबे समय से चल रहे इस उपक्रम ने धार्मिक उत्सव को शिक्षा और पर्यावरण जागरूकता से जोड़ने का अवसर दिया है। विद्यार्थी केवल किताबों के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण की बातें नहीं सीख रहे, बल्कि स्वयं गतिविधि में भाग लेकर उसका महत्व समझ रहे हैं।

भक्ति के साथ प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी

गणेशोत्सव में भगवान गणेश को बुद्धि और विवेक का प्रतीक माना जाता है। ऐसे में पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार तरीके से त्योहार मनाने की पहल इसी भावना को व्यवहार में उतारने का माध्यम बन सकती है। जालना के इन विद्यार्थियों की पहल यह संदेश देती है कि त्योहारों की खुशियां और पर्यावरण संरक्षण एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। थोड़ी जागरूकता और जिम्मेदारी के साथ परंपराओं को प्रकृति के अनुकूल बनाया जा सकता है। करीब 100 विद्यार्थियों का अपने हाथों से गणेश प्रतिमाएं बनाना केवल एक रचनात्मक गतिविधि नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ी में पर्यावरणीय चेतना विकसित करने का प्रयास भी है। यानी गणेशोत्सव में आस्था भी, कला भी और पर्यावरण की जिम्मेदारी भी।

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संयोजक

 हमारी गौरैया और इनवारमेंट वैरियर्स

Hamari Gauraiya and Environment Warriors

*सम्पादक -डॉ .लीना

*सहायक सम्पादक -निशांत रंजन

उद्देश्य

विश्व गौरैया दिवस: एक साझा संकल्प

20 मार्च 2010 को जब विश्व गौरैया दिवस की शुरुआत हुई, तो मकसद साफ था—इस नन्हीं जान को लुप्त होने से बचाना। इस मुहिम को मजबूती देते हुए दिल्ली सरकार ने 15 अगस्त 2012 और बिहार सरकार ने 16 अप्रैल 2013 को गौरैया को अपना राजकीय पक्षी घोषित किया। तब से लेकर आज तक, सरकारी संस्थाओं और निजी संगठनों के साझा प्रयासों से गौरैया की ‘घर वापसी’ का अभियान निरंतर जारी है।

घर-आँगन, खेत-खलिहान में चहकने-फुदकने वाली गौरैया की घटती संख्या को रोकना और उनकी आबादी को बढ़ाने के लिए एक सुरक्षित और अनुकूल वातावरण सुनिश्चित करना। उद्देश्य है सभी गौरैया संरक्षकों का …इसमें हमारी गौरैया और पर्यावरण योद्धा(Hamari Gauraiya and Environment Warriors) भी शामिल है।

प्रधानमंत्री द्वारा गौरैया को संरक्षित करने को लेकर ‘मन की बात’ में कई बार सन्देश दिया गया हैं :- “विश्व गौरैया दिवस (20 मार्च) पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नन्हीं गौरैया को हमारे पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए उनके संरक्षण पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि शहरीकरण और प्रदूषण के कारण घटती इनकी संख्या पर्यावरण असंतुलन का संकेत है, इसलिए घरों में दाना-पानी रखकर और घोंसले बनाकर इनके प्रति स्नेह और जिम्मेदारी निभाएं।

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