संजय कुमार / गौरैया को देखकर शायद ही किसी के मन में यह विचार आता हो कि छोटी-सी नन्ही चिड़िया हजारों वर्ष पुरानी धार्मिक और साहित्यिक परंपराओं का भी हिस्सा रही है। घर-आंगन, मुंडेर, खिड़की, छज्जे और पेड़ों के बीच चहकने फुदकने वाली गौरैया लंबे समय से इंसान की जिंदगी के बेहद करीब रही है। इन्सान ने भी इसे अपने साथ रखा और प्यार-सम्मान दिया। यही वजह है कि प्राचीन काल में समाज ने भी अपने से जोड़ा और उसकी मौजूदगी को अपने साहित्य और धार्मिक ग्रंथों में जगह दी। आज के दौर में साहित्य-संस्कृति-फिल्म आदि में गौरैया की ख़ास पहचान है।
आज गौरैया के अस्तित्व पर संकट की चर्चा होती है, वहीँ पुराने ग्रंथों को पढ़ने और आंकलन करने से पर पता चलता है कि कभी यह पक्षी मानव बस्तियों का इतना सामान्य हिस्सा था कि धार्मिक उपदेशों और साहित्यिक उपमाओं में भी उसका इस्तेमाल सहज रूप से किया जाता था। गौरैया का रिश्ता केवल पश्चिमी धार्मिक परंपराओं तक सीमित नहीं है। भारतीय साहित्य और संस्कृत परंपरा में भी छोटे पक्षियों के अनेक नाम और वर्णन मिलते हैं।

संस्कृत साहित्य में ‘चटक’ नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। पक्षियों से संबंधित संस्कृत साहित्य के अध्ययनों में चटक को गौरैया या गौरैया जैसे छोटे पक्षी से जोड़ा गया है। भारतीय परंपरा में पक्षियों की पहचान केवल आधुनिक वैज्ञानिक नामों से नहीं होती थी। उनके रंग, आवाज, आकार, उड़ान, व्यवहार और निवास के आधार पर अलग-अलग नाम प्रचलित थे। इसलिए किसी प्राचीन ग्रंथ में ‘चटक’ शब्द मिलना उस पक्षी के आधुनिक वैज्ञानिक वर्गीकरण की सीधी पुष्टि नहीं करता, लेकिन यह जरूर बताता है कि छोटे चहचहाते पक्षी भारतीय साहित्यिक परंपरा में पहचाने और वर्णित किए जाते थे। कुछ संस्कृत स्रोतों में ‘गृहकुलिङ्ग’ जैसे नामों का संबंध भी घरों के आसपास रहने वाले छोटे पक्षियों से जोड़ा गया है। पक्षी-साहित्य के आधुनिक अध्ययनों में ऐसे कई प्राचीन नामों की पहचान आधुनिक पक्षी प्रजातियों से करने का प्रयास किया गया है।
गौरैया की सबसे खास विशेषताओं में से एक है उसका मनुष्य के आसपास रहना। जंगल के भीतर रहने के बजाय वह गांवों, कस्बों और शहरों में मनुष्य के साथ रहने के लिए अनुकूलित हुई। पुराने समय में जब घर मिट्टी, लकड़ी, पत्थर और खपरैल से बने होते थे, उनमें असंख्य छोटी दरारें और खाली जगहें होती थीं। यही जगहें गौरैया के लिए घोंसला बनाने की सुरक्षित जगह बन जाती थीं। घर के बाहर अनाज सुखाया जाता था। आंगन में अनाज के दाने गिरते थे। पशुओं के चारे के आसपास भी भोजन उपलब्ध रहता था। ऐसे वातावरण में गौरैया का मनुष्य की बस्ती में रहना आसान था। इसलिए प्राचीन ग्रंथों में गौरैया का घर, घोंसला और मनुष्य के आसपास उसका दिखाई देना केवल धार्मिक कल्पना नहीं, बल्कि उस समय के वास्तविक सामाजिक और प्राकृतिक परिवेश का प्रतिबिंब भी माना जा सकता है।
वहीँ पश्चिमी धार्मिक परंपराओं में गौरैया का सबसे चर्चित उल्लेख बाइबल के नए नियम में मिलता है। मत्ती रचित सुसमाचार में यीशु अपने शिष्यों को समझाते हुए गौरैया का उदाहरण देते हैं। वहां बताया गया है कि दो गौरैयां बहुत कम मूल्य में बिकती हैं, फिर भी उनमें से एक भी ईश्वर की जानकारी और देखभाल से बाहर नहीं है। इसके आगे मनुष्य को सांत्वना देते हुए कहा गया है कि यदि ईश्वर इतनी छोटी और कम मूल्य वाली चिड़िया का भी ध्यान रखता है तो मनुष्य उसके लिए कितना अधिक महत्वपूर्ण होगा। इस प्रसंग में गौरैया केवल एक पक्षी नहीं रह जाती। वह ईश्वर की करुणा, संरक्षण और सृष्टि के प्रत्येक जीव के महत्व का प्रतीक बन जाती है। लूका रचित सुसमाचार में भी गौरैया का उल्लेख मिलता है। वहां पांच गौरैयों के बहुत कम मूल्य में बिकने की बात कही गई है और फिर यह भाव सामने आता है कि इतनी साधारण समझी जाने वाली चिड़िया भी ईश्वर की दृष्टि से अनदेखी नहीं है। इससे उस समय के सामाजिक जीवन की एक झलक भी मिलती है।
पुराने नियम की भजन संहिता में भी गौरैया का उल्लेख मिलता है। भजन संहिता 84:3 में गौरैया के घर और पक्षी के घोंसले का उल्लेख करते हुए ईश्वर की वेदी के आसपास सुरक्षित स्थान की कल्पना की गई है। यह उल्लेख इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें गौरैया को उसके प्राकृतिक व्यवहार—घर बनाने और बच्चों के लिए घोंसला तैयार करने—के साथ देखा गया है। गौरैया का जीवन मनुष्य के घर से भी जुड़ा रहा है। वह दीवारों की दरारों, छतों, रोशनदानों और भवनों के छोटे-छोटे सुरक्षित हिस्सों में घोंसला बना लेती है। इसलिए प्राचीन समाजों में घर और गौरैया का रिश्ता स्वाभाविक रहा होगा।
प्राचीन ग्रंथों में पक्षियों के उल्लेख को आज के वैज्ञानिक वर्गीकरण से जोड़ते समय थोड़ी सावधानी जरुरी है। बाइबल के पुराने नियम की मूल हिब्रू भाषा में छोटे पक्षियों के लिए ‘Tsippor जैसे शब्द मिलते हैं। इनका अर्थ हर स्थान पर केवल आधुनिक घरेलू गौरैया नहीं माना जा सकता। कई संदर्भों में इनका व्यापक अर्थ छोटे पक्षी या चहचहाने वाले पक्षी के रूप में लिया जाता है। इसी तरह नए नियम की मूल यूनानी भाषा में Strouthion शब्द मिलता है, जिसका संबंध छोटे पक्षी और विशेष रूप से गौरैया से जोड़ा जाता है। इसलिए यह कहना अधिक सही होगा कि बाइबल में गौरैया और छोटे पक्षियों के अनेक उल्लेख मिलते हैं, लेकिन प्राचीन शब्दों को आज की वैज्ञानिक प्रजाति हाउस स्पैरो के साथ हर जगह शत-प्रतिशत समान मान लेना उचित नहीं है।
बाइबल में गौरैया के उल्लेख की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि वह एक बहुत छोटे और सामान्य जीव के माध्यम से बड़ा संदेश देती है। गौरैया महंगी या दुर्लभ चिड़िया नहीं थी। इसके बावजूद उसे धार्मिक शिक्षा के केंद्र में रखा गया। संदेश साफ था—किसी जीव का छोटा होना उसके महत्व को कम नहीं करता। आज जब जैव विविधता और वन्यजीव संरक्षण की बात की जाती है तो यह विचार और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। किसी प्रजाति का पारिस्थितिक महत्व केवल उसके आकार या आर्थिक उपयोग से तय नहीं होता। प्रकृति में हर जीव की अपनी भूमिका होती है।
गौरैया भले ही बाघ, हाथी या गैंडे जैसी बड़ी और आकर्षक वन्यजीव प्रजाति नहीं है, लेकिन मानव बस्तियों के पारिस्थितिक तंत्र का यह एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। जिस गौरैया को कभी घर-आंगन की सामान्य चिड़िया माना जाता था, आज कई शहरों में उसका दिखाई देना पहले जैसा सामान्य नहीं रहा। शहरीकरण, पुराने भवनों का बदलता स्वरूप, घोंसला बनाने की जगहों में कमी, भोजन की उपलब्धता में बदलाव, कीटनाशकों का इस्तेमाल और बदलता पर्यावरण—इन सभी कारणों को गौरैया और दूसरे शहरी पक्षियों के लिए चिंता के विषयों के रूप में देखा जाता है। बाइबल से लेकर भारतीय संस्कृत साहित्य तक गौरैया या छोटे पक्षियों के उल्लेख हमें एक महत्वपूर्ण बात याद दिलाते हैं, मानव सभ्यता और पक्षियों का रिश्ता बहुत पुराना है। आज जब गौरैया के संरक्षण की जरूरत महसूस हो रही है, तब इन पुराने संदर्भों को केवल धार्मिक या साहित्यिक इतिहास के रूप में पढ़ना पर्याप्त नहीं होगा। वे हमें यह भी याद दिलाते हैं कि मनुष्य के आसपास रहने वाले छोटे जीव भी हमारी सभ्यता और संस्कृति के लंबे इतिहास का हिस्सा रहे हैं।
प्राचीन ग्रंथों में प्रयुक्त पक्षियों के नामों का आधुनिक वैज्ञानिक प्रजातियों से मिलान हमेशा निश्चित नहीं होता। इसलिए ‘चटक’, ‘त्सिप्पोर’ या अन्य प्राचीन नामों को हर संदर्भ में सीधे घरेलू गौरैया (पैसर डोमेस्टिकस) मानने के बजाय ‘गौरैया/छोटा पक्षी’ के संदर्भ में समझना अधिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण है। बाइबल के मत्ती 10:29-31, लूका 12:6-7 और भजन संहिता 84:3 जैसे संदर्भ गौरैया के उल्लेख के प्रमुख उदाहरण हैं।
संदर्भ:- (Bible Gateway), (JW.ORG), (Wikisource),अंतरजाल















