संजय कुमार / सभी जीवजंतुओं का अपना -अपना जीवन काल होता है। साथ ही आकस्मिक -प्राकृतिक मौत भी। बात हमारे घर आँगन में चकने फुदकने वाली पबचपन की नन्ही साथी गौरैया की। गौरैया का सामान्य जीवन काल परिस्थितियों के अनुसार लगभग 3 से 7 वर्ष तक माना जाता है। हालांकि, जंगल या प्राकृतिक वातावरण में रहने वाली और मानव बस्तियों के आसपास रहने वाली गौरैया की जीवन-प्रत्याशा भोजन, मौसम, बीमारियों, शिकारियों और सुरक्षित आवास की उपलब्धता के आधार पर अलग-अलग हो सकती है। गौरैया का जीवन छोटा होता है। जबकि गौरैया का प्रजनन चक्र बेहतर होता है।
मादा गौरैया अंडे देने के बाद सामान्यतः लगभग 10 से 14 दिनों तक अंडों को सेती है। इस दौरान नर भी मादा का साथ देता है। बच्चों के निकलते ही दोनों भोजन जुटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। बच्चे शुरू में अनाज नही खाते इसलिए शुरू में कीड़े आहार में दिए जाते हैं। इसे खोजना दोनों की जवाबदेही होती हैं। अंडों से चूजे निकलने के बाद गौरैया के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण चरण शुरू होता है। जन्म के समय बच्चे बहुत छोटे, कमजोर और लगभग पूरी तरह माता-पिता पर निर्भर होते हैं। उनकी आंखें भी शुरू में बंद रहती हैं और शरीर पर पर्याप्त पंख नहीं होते। लेकिन जैसे ही गौरैया आहार लाती सभी बच्चे चोंच खोल सर को ऊपर करते हुए हलकी आवाज निकालते हैं और गौरैया एक- एक कर बच्चों को आहार दे देती है।

अंडे से निकलने के बाद गौरैया के बच्चे को घोंसले में लगभग 15 दिन रहने की जरूरत होती है। इस दौरान नर और मादा दोनों मिलकर बच्चों को भोजन कराते हैं। माता-पिता लगातार घोंसले से बाहर जाकर भोजन की तलाश करते हैं और चोंच में आहार लेकर बच्चों के लिए लेकर आते हैं। छोटे बच्चों को बार-बार भोजन की आवश्यकता पडती है, इसलिए नर-मादा दोनों बारी बारी से आहार लाने में सक्रिय भूमिका निभाते हैं।
बच्चों को आहार में कीड़े (प्रोटीनयुक्त आहार) मिलने से उनका शारीरिक विकास बहुत तेजी से होता है। शरीर पर धीरे-धीरे पंख आने लगते हैं, पंख मजबूत होते हैं और वे घोंसले के भीतर ही अपने पंख फड़फड़ाने तथा संतुलन बनाने का अभ्यास करने लगते हैं। करीब दो सप्ताह के बाद वे घोंसले से बाहर निकलने और छोटी उड़ान भरने की स्थिति में आने लगते हैं। जब कोई बच्चा गौरैया घोंसले से निकल उड़ने लगता है और गिर जाता है या कहीं बैठ जाता है तो उसे अगली उड़ान के लिए उसे उड़ना सिखाते हैं। कभी कभी नीचे से सपोर्ट भी देते हैं एक बार बच्चा गौरैया ने उड़ान भर ली फिर रफ़्तार पकड लेता है। शुरू में नर-मादा गौरैया अपने बच्चों के संग ही रहते हैं ।
हालांकि, घोंसला छोड़ देना यह नहीं बताता कि वे पूरी तरह स्वतंत्र हो गए हैं। शुरुआती दिनों में माता-पिता उन्हें बाहर भी भोजन उपलब्ध कराते रहते हैं और उनकी सुरक्षा में मदद करते हैं। बच्चा गौरैया का घोंसले से बाहर निकलने के बाद भी उसका विकास जारी रहता है। अगले कुछ दिनों और सप्ताहों में वह उड़ान को बेहतर तरीके से नियंत्रित करना, भोजन तलाशना और खतरे से बचना माता -पिता से सीखता है। लगभग 24–25 दिनों के आसपास वह युवा गौरैया के रूप में विकसित होने की दिशा में आगे बढ़ जाता है, हालांकि पूरी तरह स्वतंत्र और वयस्क बनने में इससे अधिक समय लग सकता है। नर-मादा बच्चा गौरैया शुरू के महीनो में एक जैसे दिखते हैं लेकिन जैसे-जैसे युवा होते जाते हैं उनकी पहचान सामने आने लगती है।
गौरैया की विशेषता यह है कि अनुकूल परिस्थितियों में वह एक ही प्रजनन मौसम में एक से अधिक बार प्रजनन कर सकती है। यही कारण है कि गौरैया के परिवार में अलग-अलग उम्र के बच्चे एक ही मौसम में देखने को मिल सकते हैं। भोजन की पर्याप्त उपलब्धता, सुरक्षित घोंसला और अनुकूल मौसम इसके प्रजनन पर सकारात्मक प्रभाव डालते हैं। इस पूरे चक्र में नर और मादा दोनों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। वे मिलकर अंडों की सुरक्षा, भोजन जुटाने और चूजों की परवरिश करते हैं। यही साझेदारी गौरैया के परिवार को तेजी से बढ़ने में मदद करती है।
गौरैया का जीवन काल को देखें तो गौरैया को केवल एक सामान्य घरेलू पक्षी नहीं है। अंडे से चूजे और फिर युवा पक्षी बनने तक उसका जीवन संघर्ष, देखभाल और तेजी से होने वाले विकास की एक अद्भुत प्रक्रिया है। जो, इन्सानी जीवन काल से मिलता जुलता है। लेकिन बदलते परिवेश में आज घोंसले बनाने के स्थानों की कमी, भोजन की उपलब्धता में कमी, प्रदूषण और बदलते शहरी वातावरण के कारण इस छोटे पक्षी के लिए यह प्राकृतिक जीवन चक्र पहले की तुलना में अधिक चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है।















