“विश्व शेर दिवस” 10 अगस्त
संजय कुमार/ भारत में कभी जिस शेर की दहाड़ खामोश होने के कगार पर पहुंच चुकी थी, आज तस्वीर बदल रही हैं। दहाड़ अब गूंजने लगी है। 16वें शेर जनसंख्या अनुमान के अनुसार शेरों की आबादी में वृद्धि हुई है, वर्ष 2025 में अनुमानित संख्या 891 है, जबकि वर्ष 2020 में यह 674 और 2010 के 411 ही थी।
गुजरात के जंगलों और उसके आसपास के इलाकों में फिर से शेरों की दहाड़ गूंज रही है। यह सब संरक्षण से संभव हुआ। जिसने दुनिया का ध्यान खींचा है। विश्व शेर दिवस के मौके पर यह उपलब्धि न केवल गर्व का विषय है, बल्कि यह भी बताती है कि गंभीर संकट में पहुंच चुकी किसी वन्यजीव प्रजाति को वैज्ञानिक संरक्षण, स्थानीय भागीदारी और सतत प्रयासों के जरिए कैसे बचाया जा सकता है।
गुजरात में वर्ष 2010 में शेरों की संख्या 411 दर्ज की गई थी। वर्ष 2015 में यह बढ़कर 523 हुई और 2020 में 674 तक पहुंच गई। वर्ष 2025 की ताजा गणना में गुजरात में 891 एशियाई शेर दर्ज किए गए। यानी 2020 के मुकाबले पांच वर्षों में शेरों की संख्या में 32 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई है। वहीं 2010 से 2025 के बीच इनकी संख्या में 70 प्रतिशत से ज्यादा की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। यह वृद्धि केवल आंकड़ों की कहानी नहीं है। यह उस संरक्षण प्रयास की सफलता का संकेत है, जिसने एक समय विलुप्ति के कगार पर पहुंच चुकी प्रजाति को दोबारा मजबूती दी है।
शेरों की कुल संख्या बढ़ने के साथ-साथ वयस्क मादा शेरों की संख्या में हुई वृद्धि भी खास महत्व रखती है। वर्ष 2020 में गुजरात में वयस्क मादा शेरों की संख्या 260 थी, जो 2025 में बढ़कर 330 हो गई। किसी भी वन्यजीव आबादी की दीर्घकालिक स्थिरता के लिए प्रजनन करने वाले वयस्कों की पर्याप्त संख्या बेहद महत्वपूर्ण होती है। इसलिए मादा शेरों की बढ़ती संख्या इस बात का सकारात्मक संकेत है कि एशियाई शेरों की आबादी केवल संख्या के लिहाज से नहीं, बल्कि प्रजनन और प्राकृतिक वृद्धि के लिहाज से भी मजबूत हो रही है। देखा जाये तो भारत में शेर सदियों से संस्कृति, परंपरा और शक्ति के प्रतीक रहे हैं। लेकिन बीसवीं सदी की शुरुआत तक शेरों की संख्या इतनी तेजी से घट चुकी थी कि उनका अस्तित्व खतरे में पड़ गया था। हालात ऐसे बने कि एशियाई शेरों की एकमात्र जंगली आबादी गुजरात के गिर और उसके आसपास के इलाकों तक सीमित रह गई। इस लिहाज से गिर सिर्फ शेरों का घर नहीं था, बल्कि पूरी प्रजाति के अस्तित्व की आखिरी उम्मीद बन गया था।
शेर अब केवल अधिसूचित जंगलों तक सीमित नहीं हैं। सौराष्ट्र के अधिसूचित वन क्षेत्रों के साथ-साथ नदी किनारे के इलाकों, राजस्व भूमि और आसपास के दूसरे क्षेत्रों में भी उनकी मौजूदगी देखी जा रही है। यह विस्तार शेरों की बढ़ती आबादी और उनके नए क्षेत्रों में प्राकृतिक रूप से फैलने की क्षमता को दर्शाता है। इस बदलाव की एक महत्वपूर्ण मिसाल बरडा वन्यजीव अभयारण्य है। जिस इलाके से शेर कभी गायब हो चुके थे, वहां उनकी प्राकृतिक वापसी हुई है। वर्ष 2023 में शेरों के बरडा पहुंचने के बाद 2025 तक यहां उनकी संख्या बढ़कर 17 हो गई। इनमें छह वयस्क शेर और 11 शावक शामिल हैं। यह वापसी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी प्रजाति का अपने ऐतिहासिक आवासों में स्वाभाविक रूप से लौटना संरक्षण की सफलता का महत्वपूर्ण संकेत माना जाता है।
शेरों की बढ़ती संख्या निश्चित रूप से उत्साहजनक है, लेकिन इसके साथ संरक्षण की जिम्मेदारी भी बढ़ गई है। जैसे-जैसे शेरों का प्राकृतिक दायरा बढ़ रहा है, उनका इंसानी बस्तियों, कृषि क्षेत्रों, सड़कों और अन्य मानवीय गतिविधियों वाले इलाकों से संपर्क भी बढ़ सकता है। इसलिए भविष्य की चुनौती सिर्फ शेरों की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि उनके लिए पर्याप्त और सुरक्षित आवास सुनिश्चित करना, मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करना, शिकार और दुर्घटनाओं से उनकी रक्षा करना तथा आबादी के दीर्घकालिक स्वास्थ्य को बनाए रखना है।
एशियाई शेरों की पूरी जंगली आबादी लंबे समय तक एक ही भौगोलिक क्षेत्र पर निर्भर रही है। ऐसे में उनकी आबादी का व्यापक और सुरक्षित विस्तार संरक्षण की दृष्टि से बेहद अहम हो जाता है। 2010 के 411 शेरों से 2025 के 891 शेरों तक का सफर केवल एक प्रजाति की संख्या बढ़ने की कहानी नहीं है। यह उस सामूहिक प्रयास का परिणाम है, जिसने एशियाई शेर को विलुप्ति के खतरे से निकालकर फिर से उसके ऐतिहासिक परिदृश्य में स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बढ़ाया है। कभी गुजरात के गिर तक सीमित रह गई शेरों की दहाड़ अब सौराष्ट्र के नए इलाकों तक सुनाई दे रही है। बरडा में शेरों की प्राकृतिक वापसी इस कहानी का नया अध्याय है।
विश्व शेर दिवस पर एशियाई शेरों की यह उपलब्धि हमें एक महत्वपूर्ण संदेश देती है—संरक्षण केवल किसी प्रजाति को बचाने का प्रयास नहीं, बल्कि उसके प्राकृतिक आवास, पारिस्थितिकी और इंसानों के साथ उसके सह-अस्तित्व को सुरक्षित करने की लंबी प्रक्रिया है। देश में 411 से 891 शेरों तक की यह यात्रा बताती है कि अगर संरक्षण के प्रयास निरंतर और वैज्ञानिक तरीके से किए जाएं, तो विलुप्ति की ओर बढ़ती दहाड़ को फिर से जंगलों की पहचान बनाया जा सकता है।















