संजय कुमार / अकसर गौरैया झुण्ड में दिखती है। झुण्ड में इनकी संख्या चार से लेकर सौ तक रहती है। अकेले या इक्का – दुक्का वहीं जाती है जहां वह परिचित होती है। दाना-पानी के लिये एक आती भी है तो दूसरी भी पहुंच जाती है। जून, जुलाई, अगस्त और सितंबर में ये झुण्ड में फुर्र–फुर्र उड़ती रहती है। वजह है गौरैया के परिवार में नये सदस्य जुड़ जाते हैं। दाना चुगना हो या फिर घर आँगन या आसमान में तफ़री करनी हो, बच्चों के साथ गौरैया पूरे समुदाय में रहती हैं। एक पेड़ से दूसरे पर और फिर छत की मुंडेर पर या फिर झुरमुट में छुप जाती है। इस मौसम में गौरैया अपने बच्चों के साथ उड़ते हुये अद्भुत नजारा पेश करती है। मनमोहक दृश्य देख मन प्रफुल्लित हो जाता है।
यों तो गौरैया झुण्ड में रहती है ..लेकिन सृजन के लिये जोड़ा बनाती है। यानी प्रजनन के लिए यह जोड़ा बनाती हैं। मादा गौरैया को रिझाने के लिए यह नर बहुत ही सुरीली आवाज निकालता है और पंख फैला कर नृत्य करता है। बदले में मादा गौरैया धीरे से आवाज निकालती है और उसके आगे पीछे घूमती है। यह सिलसिला कई दिनों तक चलता है। इस बीच नर मादा को लुभाने और सृजन के लिये घोंसला भी बनाता है। घोंसले में उसे लेकर अंदर आता – जाता है। फिर दोनों मिल कर तिनका जमा कर घोंसला बनाते हैं। घोंसला में कई बार शाम में अकेले भी नर रहता है। मैंने अक्सर देखा है कि नर गौरैया तेज और अलग सी तीखी आवाज निकाल कर मादा गौरैया को बुलाता है, जब मादा गौरैया नहीं आती है तो बेचैन हो जाता है और तेजी से अपनी पूंछ को पटकता –फुदकता रहता हैं। जब मादा आ जाती तो…ख़ुशी से नाचने लगता है। घोंसला के अंदर बाहर भी आता-जाता रहता है। साथ ही आसपास में तफ़री करता है। इसी बीच अगर दूसरा नर गौरैया आ जाये तो फिर आपस में भीड़ जाते है और उसे भागा कर रहता है। हवा में लड़ाई होती है। ये प्रजनन क्रीड़ा बड़े ही खास अंदाज में करते हैं। पहले ये जोड़ा बनाते हैं। प्रजनन के समय आते ही कई दिनों तक नर गौरैया मादा के इर्द गिर्द घूमता है। अजीब-अजीब सी आवाज निकाल कर बुलाता / रिझाता है। मादा गौरैया के आने पर यह खुशी से सुरीली आवाज निकालता – नाचता है। फिर ये प्रेम में डूब जाते हैं। दोनों उड़ते हुए एक दूसरे के पीछे भागते हैं। भागते भागते मादा एक जगह देख बैठ जाती है।

नर गौरैया उड़ते हुए ही आता है ऊपर बैठ कर प्रजनन करता है। इस दौरान नर की आंखों में अजीब चमक होती है। 10 से 20 सेकेंड के कई समय चक्र में दोनों प्रजनन करते हैं। इस दौरान मादा नहीं उड़ती है केवल नर उड़ता है और उस पर बैठता है। इस दौरान ये एकांत में रहते हैं आस-पास कोई गौरैया या अन्य चिड़िया नहीं रहती है। इनके घोंसले घास के तिनकों से बने होते हैं और इनमें पंख भरे होते हैं। इनके अंडे अलग-अलग आकार और पहचान के होते हैं। अंडे को मादा गौरैया सेती है। गौरैया की अंडा सेने की अवधि 10-12 दिनों की होती है जो कि सभी चिड़ियों की अंडे सेने की अवधि में सबसे छोटी है। इसकी प्रजनन क्षमता उम्र के साथ बढ़ती है और यह प्रजनन समय में परिवर्तन लाती है।
गौरैया बहुत ही शालीन और शांत स्वभाव वाली छोटी चिड़िया है प्यार करने का इनका अंदाज निराला होता है। नवसृजन के लिए बड़े ही खास अंदाज में ये संपर्क करते है। उड़ते हुये या नृत्य करते करते नर मादा के साथ संबंध बनाने के अलावे कभी कभी एक दूसरे को चोंज से सिर के ऊपरी हिस्से पर सम्पर्क बनाते हैं।
कई बार प्रजनन के बाद अंडे देने का समय नजदीक आते ही तेजी से नर -मादा गौरैया घोंसला बनाने लग जाते हैं। कोमल तिनका लाने में लग जाते हैं। मेरे बालकोनी में लगे बॉक्स और आसपास में यह सब हो चुका है। फिर ये प्रकृति को नायाब तोहफा देने में सक्रिय हो जाते हैं।
गौरैया को प्रकृति को तोहफा और अपनी विलुप्ती को कम करने की प्रक्रिया में जुटे कई बार देखा। सुबह-सुबह गौरैया जोड़ा का प्रजनन कीड़ा ज्यादा दिखा। हालांकि दोपहर और शाम में भी दिखा। मार्च-अप्रैल माह में एक राउंड गौरेया का बच्चा निकल चुका होता है। जुलाई तक यह सिलसिला जारी रहता है। बच्चे जब खुल्ले आसमान में आ जाते हैं तो शुरू में अपने माँ–पिता के साथ रहते हैं। नर या मादा गौरैया दोनों बच्चे को दाना भी खिलाते हैं और उन्हे जीने का रास्ता भी दिखाते हैं। बच्चे को उड़ाना । दाना चुगाना । अपना बचाव करना आदि का प्रशिक्षण देते हैं । शुरू में बच्चों को अकेला नहीं छोड़ते है उनके आस–पास जरूर रहते हैं अगर नर या मादा गौरैया भोजन के लिए बच्चे को छोड़ जाते हैं और बच्चा कहीं चला जाता है तो वे बेचैन हो जाते है। आवाज देकर बच्चे को बुलाते हैं। मानसून के दौरान मौसम का लुत्फ ये खूब उठाते हैं झुंड में रहना उड़ना और हँगामा करना, दृश्य मन को मोह लेता है ।
गौरैया घोंसला बनाने के लिए एक-एक तिनका जोड़ता है। ये ज्यादातर खपरैल घर में या खिड़की या फिर जहाँ भी खोह दिखता है घोंसला बनाती है। सर्दी शुरू होते ही घोसला बनाने लगती है। घोसला के लिए बहुत ही महीन कोमल तिनका चुनती है घोसला में बच्चे के आते ही गौरैया उसका पूरा ध्यान रखती है। अगर मादा घोंसले के अंदर अंडे या बच्चे के साथ होती है तो नर बाहर बैठ कर निगरानी करता रहता हैं। बाथरूम में पाइप के पास खोह में अपने बच्चे को खाना खिलाने से लेकर आसमान में उड़ते तक की जवाबदेही नर-मादा दोनों लेते हैं। एक अगर खाना लाने जाये तो दूसरा पहरेदारी करता है ।
गौरैया, एक जगह से दूसरी जगह पलायन करती है। संख्या सैकड़ों में होती है। धीरे धीरे ये नये इलाकों में चली जाती है। सृजन के समय काल में यह कम दिखती है और बच्चे निकलने के बाद संख्या बढ़ जाती है। होता यह है कि जैसे ही इनकी संख्या क्षेत्र में बढ़ जाती है तो संतुलन बनाने के लिए कुछ नये क्षेत्रों में चली जाती है ताकि नई पौध यानि बच्चों को आवासीय और आहार को लेकर परेशानी न हो। यही वजह है कि कई इलाकों में हर साल बच्चों के आने के बाद कुछ दिनों तक खूब दिखती है और फिर धीरे धीरे संख्या स्थिर हो जाती है।













