गौरैया के कान है रडार सिस्टम

संजय कुमार / घरेलू  गौरैया  दिखने  में  छोटी, पर उसका हर अंग एक महत्वपूर्ण है। और, सबसे कमाल का अंग है उसके कान। गौरैया के कान सिर के दोनों तरफ, आंखों के ठीक पीछे होते हैं। और वो बारीक पंखों की एक परत से हमेशा ढके रहते हैं। इसीलिए हमें बाहर से गौरैया का कान…

संजय कुमार / घरेलू  गौरैया  दिखने  में  छोटी, पर उसका हर अंग एक महत्वपूर्ण है। और, सबसे कमाल का अंग है उसके कान। गौरैया के कान सिर के दोनों तरफ, आंखों के ठीक पीछे होते हैं। और वो बारीक पंखों की एक परत से हमेशा ढके रहते हैं। इसीलिए हमें बाहर से गौरैया का कान कभी दिखता ही नहीं। ये पंखों का ढक्कन धूल, हवा, बारिश और ठंड से कान को बचाता है। साथ ही रडार सिस्टम की तरह काम करता है उसके सुनने के रेंज में आने वाले हर खतरे को भांप लेती हैं।

गौरैया 20 Hz से 20 kHz तक की आवाज साफ़ सुन लेती है। जितना  इंसान सुन सकता है, गौरैया भी उतना सुन सकती है। लेकिन फर्क  ये है कि गौरैया के कान बहुत हल्की सी आवाज भी पकड़ लेती है। पत्ते का सरसराना, कीड़े का रेंगना, बाज के पंख की फड़फड़ाहट आदि महीन आवाज को पकड़ लेती है। अगर फ्रीक्वेंसी रेंज देखें तो इंसान का रेंज 20 Hz – 20 kHz है।  गौरैया का भी 20 Hz – 20 kHz  हालाँकि कुत्ता का 40 Hz – 60 kHz  होता है। 

गौरैया बहुत ही छोटी चिड़ियाँ है और कान उसके सुरक्षा कवच हैं।  कान के सहारे आने वाले खतरे को भांप लेती है। हालाँकि, आँखों से भी खतरे हो देख लेती है। लेकिन, रात में आहट को सुन खतरे से अपना बचाव करती है। 

गौरैया को बिल्ली की चहलकदमी और  कौआ- शिकरा के आने से पहले उसके पंखों की आवाज से उसे पता चल जाता है। लेकिन, कभी-कभी बिल्ली अपने शांत क़दमों से आकर गौरैया को पकड़ लेती है। गौरैया झुंड में हो या दो -तीन साथी के साथ जैसे ही हल्की आवाज होती है, सुन चीं-चीं कर फुर्र हो जाती है ।

गौरैया अपने कान से सिर्फ खतरे को ही नहीं भांपती बल्कि आवाज से आहार भी ढूंढ लेती है। घास में कीड़े की आहट की आवाज सुनकर चोंच मार पकड़ लेती है। सुनने में सभी गौरैया की आवाज एक जैसी होती है लेकिन  अपने साथी से बात करनी हो तो आवाज देती है और साथी गौरैया सुनकर आ जाता है। जब घोंसला में बच्च गौरैया को भूख लगती है तो माँ -पिता को आवाज देता है कई घोंसलों के बीच में अपने चूजों की आवाज सुन – पहचान गौरैया आ जाती है।

हालाँकि, शहरों में ध्वनि प्रदूषण ने गौरैया के प्रजनन को प्रभावित किया है। मेटिंग के समय नर गौरैया या मादा गौरैया एक दूसरे को आवाज देते हैं और मौके पर ट्रैफिक का शोर, लाउडस्पीकर, कंस्ट्रक्शन का शोर के बीच एक दूसरे की आवाज नहीं पहुँच पाती है, ऐसे में सृजन प्रभावित हो जाता है।  

गौरैया के कान पर पंख का ढक्कन हवा और ठंड से उसे बचाता है। दोनों कान से दिशा का पता भी चलता है। दाएं कान में पहले आवाज आई तो खतरा दाएं से है। अंधेरे में आंख कम काम करती, तब कान ही उसका सहारा बनता है। गौरैया के कान छोटे हैं पर काम बहुत बड़े काम के है ।

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संयोजक

 हमारी गौरैया और इनवारमेंट वैरियर्स

Hamari Gauraiya and Environment Warriors

*सम्पादक -डॉ .लीना

*सहायक सम्पादक -निशांत रंजन

उद्देश्य

विश्व गौरैया दिवस: एक साझा संकल्प

20 मार्च 2010 को जब विश्व गौरैया दिवस की शुरुआत हुई, तो मकसद साफ था—इस नन्हीं जान को लुप्त होने से बचाना। इस मुहिम को मजबूती देते हुए दिल्ली सरकार ने 15 अगस्त 2012 और बिहार सरकार ने 16 अप्रैल 2013 को गौरैया को अपना राजकीय पक्षी घोषित किया। तब से लेकर आज तक, सरकारी संस्थाओं और निजी संगठनों के साझा प्रयासों से गौरैया की ‘घर वापसी’ का अभियान निरंतर जारी है।

घर-आँगन, खेत-खलिहान में चहकने-फुदकने वाली गौरैया की घटती संख्या को रोकना और उनकी आबादी को बढ़ाने के लिए एक सुरक्षित और अनुकूल वातावरण सुनिश्चित करना। उद्देश्य है सभी गौरैया संरक्षकों का …इसमें हमारी गौरैया और पर्यावरण योद्धा(Hamari Gauraiya and Environment Warriors) भी शामिल है।

प्रधानमंत्री द्वारा गौरैया को संरक्षित करने को लेकर ‘मन की बात’ में कई बार सन्देश दिया गया हैं :- “विश्व गौरैया दिवस (20 मार्च) पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नन्हीं गौरैया को हमारे पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए उनके संरक्षण पर जोर दिया है। उन्होंने कहा कि शहरीकरण और प्रदूषण के कारण घटती इनकी संख्या पर्यावरण असंतुलन का संकेत है, इसलिए घरों में दाना-पानी रखकर और घोंसले बनाकर इनके प्रति स्नेह और जिम्मेदारी निभाएं।

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