गावं के लिए जानकी तांती ने कुआं को ए.टी.एम तो तालाब को बैंक बनाया

संजय कुमार / बिहार का जमुई जिला का केडिया गाँव के ग्रामीण कुआं को अपना ए.टी.एम और तालाब को अपना बैंक मानते हुये इसका जल संरक्षण करते हैं। गाँव को पानी की समस्या से उबारने और जल संचय-संरक्षण के लिए संघर्षरत केडिया के ग्रामीण जानकी बाबा से चर्चित जानकी तांती ने ग्रामीणों की मदद से…

संजय कुमार / बिहार का जमुई जिला का केडिया गाँव के ग्रामीण कुआं को अपना ए.टी.एम और तालाब को अपना बैंक मानते हुये इसका जल संरक्षण करते हैं। गाँव को पानी की समस्या से उबारने और जल संचय-संरक्षण के लिए संघर्षरत केडिया के ग्रामीण जानकी बाबा से चर्चित जानकी तांती ने ग्रामीणों की मदद से दर्जनों कुआं  खोद डाला। प्रकृति पुत्र जानकी तांती का मकसद साफ रहा, वे छोटे-छोटे प्रयासों से, अपनी धरती को बचने के लिए सदैव तत्पर रहते है।

केडिया गांव बिहार के अन्य गांव के समान ही है लेकिन इसकी खास विशेषता है जो इसको अन्य गांव से अलग बनाता है, पहाड़ी के तलहटी में बसा यह गांव बिहार का पहला ऑर्गेनिक विलेज की उपाधि बटोरे हुए है। यहां के सभी खेतों में जैविक कृषि किया जाता है।

जानकी तांती का जन्म 1945 के आसपास में जमुई जिले में हुआ था। इनके पिता तेतर तांती थे जो पेशे से छोटे किसान थे तथा माता मनकवा देवी  जो गृहणी थी। सात  भाई-बहनों में जानकी तांती तीसरे  स्थान पर हैं । इनका मुख्य कार्य खेती  है।

जानकी तांती बताते हैं कि उनके पूर्वज कहते थे कि पहले उनलोगों का गांव, इस स्थान पर नहीं था, यहां से एक  कोस  दूर पाड़े के दूसरी दिशा में स्थित था। वर्तमान स्थल पर उनलोगों का बथान था, जहां वे लोग अपने मवेशियों को रखते थे और यहां बहुत पुराना कुआं था, जहां से 20 से अधिक गांव के लोग प्रतिदिन बैलगाड़ी से आ कर पानी भर कर ले जाया करते थे, यहां तक कि आसपास के जंगलों में रहने वाले आदिवासी लोग भी यहां पानी भरने आते थे। इस कुएं के अलावा आसपास के तीन कोस में पानी का कोई साधन न था, पूरे क्षेत्र में पानी की भारी  कमी थी।

इसी बीच 1934 में भूकंप आया था, जो इस क्षेत्र  के लिए वरदान साबित हुआ। भूकंप के कंपन से यहां भी जगह -जगह पर पहाड़ों में दरारें पड़ गई और एक चमत्कार सा हुआ। धरती के कोख में छिपा पानी ऊपर आ गया। जिससे यहां पर कृषि कार्य शुरू हुआ और धीरे-धीरे लोग बसना शुरू कर दिए।

जानकी तांती बताते हैं कि उनके पूर्वजों ने बताया था कि यहां पानी की बहुत किल्लत थी, इसलिए सोच समझ कर प्रयोग करना सीखे,बर्बाद बिल्कुल नहीं करना और ताउम्र इस पानी के संरक्षण के लिए ठान लिया गाँव वालों ने भी मदद की ।

जानकी तांती बताते हैं बचपन से ही कुआं खोदने एवं बांधने का कार्य करते आ रहे हैं। गांव  में शुरू से ही लोग मिलजुल के ही कुआं आदि खोदने, घर बनाने  का कार्य करते है। वे जब अलग -अलग क्षेत्र में जाते थे तो उन्होंने पाया कि जहां जहाँ  चापकल या स्टेट बोरिंग का निर्माण किया गया है वहां के ज़्यादातर कुएं सुख गए और चपकल तथा बोरिंग से भी सही ढंग से पानी नहीं आता है। यह बात से उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि अगर वे लोग भी अपने गांव में बोरिंग करवायेगा तो उनके यहां भी पानी की समस्या आ जाएगी। फिर उन्होंने घूम-घूम कर गांव वालों को अपने विचार से अवगत कराया और सभी लोगों को इसके लिए तैयार किया की कोई भी व्यक्ति अपने घर में निजी बोरिंग नहीं करेगा। अगर कोई करता है तो उसका सामाजिक बहिष्कार किया जाएगा। उनके बाद गांव के लोगों के साथ मिलकर जानकी तांती ने पूरे गाँव  में 30 से अधिक कुआं खोदा ताकि सिंचाई और पेयजल के लिए जल उपलब्धता बनी रह सके।

2013 में जब केडिया को बिहार का  पहला जैविक कृषि ग्राम घोषित किया गया तो पूरे राज्य का ध्यान इस ओर आकर्षित हुआ। कृषि सचिव द्वारा गांव के लोगों के साथ बैठक कर  और सरकार की  तरफ से हर संभव मदद देने का  वादा किया गया। इस बैठक में उन्होंने सबसे पहले खेतों के सिंचाई के लिए स्टेट बोरिंग के निर्माण की बात की, जिसका जानकी तांती ने तुरंत विरोध किया और इसके स्थान पर उन्होंने गांव के लिए 15 कुआं और तीन तालाब की मांग की, पूरे गांव वालों ने भी एक स्वर में जानकी तांती की मांग का समर्थन किया,जिसे सचिव द्वारा सहज स्वीकार कर लिया गया। स्टेट बोरिंग को नकारने पर उठे सवाल के जवाब में जानकी तांती ने कहा था कि कुआं मेरा ए.टी.एम है और तालाब मेरा बैंक।

सरकार के द्वारा गांव में 17 कुआं और तीन तालाब बनवाया गया, जिससे वर्तमान में गांव में 65 से अधिक कुआं और सात  तालाब हो चुके हैं । आज गांव में ज्यादातर कार्य जैसे खेत पटवन, पेयजल के रूप में इन्हीं कुओं के जल का उपयोग से किया जाता है।

इस विषय में पटना विश्वविद्यालय के भूगर्भशस्त्र विभाग के सहायक प्राचार्य तथा जल-विज्ञान के विशेषज्ञ डॉ भावुक शर्मा बताते है कि जमुई जिला के पहाड़ प्री- कैम्ब्रियन युग की है जो बहुत प्राचीन है। इस क्षेत्र के भूतकाल में धरती में हुई हलचल के कारण पहाड़ में कई प्रकार की दरारें बनी हुई है। इन्हीं दरारों से वर्षा का जल धरती के अंदर जाता है और भूजल का स्तर सुधारता है। इस पूरे क्षेत्र में भू जल का स्तर काफी नीचे है और यदि अत्यधिक भूजल निकाला जाएगा तो यहां पानी का संकट और बढ़ जाएगा।

जानकी तांती बताते है कि गर्मी के दिनों जहां पूरा क्षेत्र पानी के लिए तरसता है, वही हमारे गांव में 10-12 फिट में ही पानी उपलब्ध रहता है, जबकि बरसात  के दिनों में यह 4-6 फिट तक चला आता है और हमलोगों को जितना जरूरत होता है, उतना स्वच्छ और पीने- योग्य जल मिल जाता है।

आज के कुछ युवा पीने के लिए निजी बोरिंग को प्राथमिकता दे रहे है, क्योंकि आज एक साधारण कुआं खोदने में जहां 4-5 लाख का खर्च हो रहा है, जबकि बोरिंग में केवल 50 हज़ार खर्च हो रहा है। इस  स्थिति को देख कर केवल हृदय द्रवित नहीं बल्कि व्याकुल भी हो जाता है कि इसी तरह चलता है, तो इस गांव को कही फिर से पानी के  लिए दिक्कत का सामना न करना पर जाए।

इसके अलावे जानकी तांती अपने गांव के युवाओं के बीच चैता और फगुआ जैसे गानों की संस्कृति को भी स्थानांतरण करने में लगे हुए है, इसलिए पूरे गांव के लोग उन्हें प्यार और सम्मान से “जानकी दादा” पुकारते  हैं।

उनका सपना है कि जिस तरह उनके गांव के लोग पानी की एक बूंद को बचाने के लिए काम करते हैं उसी तरह  हर व्यक्ति को पानी बचाना चाहिए।

बड़े ही बेवकी से तालाब को बैंक, जहां बारिश से पानी एकत्र  हो जाता हो और भूजल की पूर्ति होती हो और कुआं को एटीएम, जहां  से जब मन पानी निकल सकने की बात बताने वाले, इस व्यक्ति की सोच कितना महान और दूरदर्शी है समझा जा सकता है।

मिट्टी के घर में रहने वाले, बेहद गरीब परिवार से आने वाले, कर्मयोगी, बिना विद्यालय ज्ञान के अनुभव के आधार पर गांव भविष्य के लिए सोचने वाले, इतना सब करके आपने क्या पाया पूछने पर, वे मुस्कुरा कर जबाव देते है कि गांव के बच्चा बुतरु के पानी के दिक्कत नई होय छै। आज उनके प्रभाव से गांव में 65 से अधिक कुआं स्थित है जिसमें से अधिकतर की खुदाई इन्होंने ग्रामीणों की मदद से की है। सरकार के द्वारा बनाए गए 17 कुआं की भी खुदाई में इन्होंने अपना पूरा योगदान दिया है। कुआं खोदना का कार्य इन्होंने केवल अपने लिए नहीं किया है बल्कि अपने ग्रामीण वासी और समाज के लिए किया है, ताकि किसी को भी पानी की कमी ना हो।

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20 मार्च 2010 को जब विश्व गौरैया दिवस की शुरुआत हुई, तो मकसद साफ था—इस नन्हीं जान को लुप्त होने से बचाना। इस मुहिम को मजबूती देते हुए दिल्ली सरकार ने 15 अगस्त 2012 और बिहार सरकार ने 16 अप्रैल 2013 को गौरैया को अपना राजकीय पक्षी घोषित किया। तब से लेकर आज तक, सरकारी संस्थाओं और निजी संगठनों के साझा प्रयासों से गौरैया की ‘घर वापसी’ का अभियान निरंतर जारी है।

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