
कहानी / आशा प्रसाद : बहुत समय पहले की बात है। हरे-भरे एक गाँव में दो चिड़ियाँ रहती थीं—चुनिया और मुनिया। दोनों बहनें थीं और हमेशा साथ-साथ रहतीं। सुबह सूरज की किरणों के साथ उड़ान भरतीं, खेतों में दाना चुगतीं, तालाब के किनारे पानी पीतीं और शाम को अपने छोटे-से मिट्टी और खपरैल वाले घर में लौट आतीं। लेकिन धीरे-धीरे गाँव बदलने लगा। खेतों में अब पहले जितना दाना नहीं मिलता था। तालाब भी सूखने लगे। कई चिड़ियाँ और उनके परिवार शहर की ओर उड़ गए, ताकि उन्हें खाने-पीने की कमी न हो। चुनिया और मुनिया भी मजबूरी में शहर की ओर निकल पड़ीं। शहर बहुत बड़ा था-ऊँचे-ऊँचे मकान, शोर-शराबा और बहुत सारे लोग। यह सब मुनिया को नया और थोड़ा डरावना लगता, लेकिन चुनिया उसे हमेशा हिम्मत देती। एक दिन अचानक बहुत तेज़ बारिश शुरू हो गई। आसमान काला हो गया और हवा जोर-जोर से चलने लगी। बारिश इतनी तेज़ थी कि दोनों बहनें बिछड़ गईं। मुनिया एक घर की छज्जी पर आकर बैठ गई। उसके छोटे-छोटे पंख भीग चुके थे और दिल डर से काँप रहा था। उसे बार-बार चुनिया की याद आ रही थी। “काश, मेरी बहन कहीं पास होती…” मुनिया सोचने लगी और धीरे-धीरे रोते-रोते सो गई।
सुबह हुई तो सूरज की हल्की-सी किरण छज्जी पर आकर पड़ी। मुनिया ने आँखें खोलीं। उसे भूख लगी थी, क्योंकि पिछली शाम वह ठीक से दाना नहीं चुग पाई थी। उसने उड़ान भरी और दाना चुगनेलगी। चुगते-चुगते वह बार-बार आवाज़ देती रही- “चुनिया… चुनिया… कहाँ हो तुम?” लेकिन चुनिया का कोई जवाब नहीं आया। बारिश अब भी थम नहीं रही थी। मुनिया भीगती रही और आसमान में उसे कहीं भी अपनी बहन दिखाई नहीं दी। तभी उसकी नज़र एक ऊँचे घर पर पड़ी। उस घर की बालकनी में ढेर सारेहरे-भरेपौधेलगेहुए थे।पास में दाना और पानी भी रखा हुआ था। मुनिया थक चुकी थी, इसलिए वह बालकनी में उतर आई। उसने थोड़ी देर दाना चुगा और कोने में जाकर बैठ गई।फिर भी उसका मन खाली था। वह अपनी बहन चुनिया को बहुत याद कर रही थी। उसने धीरे से फिर आवाज़ लगाई- “चुनिया… सुनो न…”
अचानक उसे हल्की-सी चहचहाहट सुनाई दी। मुनिया ने इधर-उधर देखा। तभी बालकनी के एक कोने में लकड़ी के छोटे-से घोंसले से कोई बाहर आया।वह चुनिया थी! चुनिया भी बारिश से बचने के लिए वहीं छिपी हुई थी। बहन की आवाज़ सुनते ही वह बाहर आ गई। दोनों बहनें एक-दूसरे को देखकर खुशी से फूली न समाईं। वे इधर-उधर उड़ने लगीं, चहचहाने लगीं और पंख फड़फड़ा कर खेलने लगीं। दोनों ने साथ मिलकर धान चुगा और पानी पिया।
अब मुनिया बिल्कुल भी अकेली नहीं थी। उसे समझ आ गया कि चाहे हालात जैसे भी हों—आँधी हो, बारिश हो या शहर की भीड़—अगर बहन साथ है तो डरने की कोई बात नहीं। उस दिन से चुनिया और मुनिया हमेशा एक-दूसरे का ख़याल रखने लगीं। और जब भी बारिश होती, दोनों पास बैठकर आसमान को देखतीं और मुस्कुरातीं—क्योंकि उन्हें पता था कि वे फिर कभी
अकेली नहीं होंगी।
*लेखिका-गौरैया संरक्षक हैं













